Lecture – 7

CategoriesIndian polity

मौलिक कर्तव्य

मूल संविधान में मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख नहीं किया गया है। इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश के आधार पर 1976 के 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से आंतरिक आपातकाल (1975-77) के दौरान शामिल किया गया था। 2002 के 86वें संविधान संशोधन ने एक और मौलिक कर्तव्य को जोड़ा।

एक धर्मनिरपेक्ष राज्य

भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। इसलिए यह किसी धर्म विशेष को भारत के धर्म के तौर पर मान्यता नहीं देता। संविधान के निम्नलिखित प्रावधान भारत के धर्मनिरपेक्ष लक्षणों को दर्शाते है:

(1) वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को जोड़ा गया।

(2) प्रस्तावना हर भारतीय नागरिक की आस्था, पूजा-अर्चना व विश्वास की स्वतंत्रता की रक्षा करती है।

(3) धर्म के नाम पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा (अनुच्छेद-15)

(4) हर व्यक्ति को किसी भी धर्म को अपनाने व उसके अनुसार पुजा-अर्चना करने का समान अधिकार है (अनुच्छेद-25)

(5) हर धार्मिक समूह अथवा इसके किसी हिस्से को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार है (अनुच्छेद 26)

(6) किसी भी सरकारी शैक्षिक संस्थान में किसी प्रकार के धार्मिक निर्देश नहीं दिए जाएंगे (28)।

सार्वभौम वयस्क मताधिकार

भारतीय संविधान द्वारा राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव के आधारस्वरूप सार्वभौम वयस्क मताधिकार को अपनाया गया है। हर वह व्यक्ति जिसकी उम्र कम से कम 18 वर्ष है, उसे धर्म, जाति, लिंग, साक्षरता अथवा संपदा इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना मतदान करने का अधिकार है। वर्ष 1986 में 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 के द्वारा मतदान करने की उम्र को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया था।

एकल नागरिकता

यद्यपि भारतीय संविधान फेडरल है और दो लक्षणों (एकल व संघीय) का प्रतिनिधित्व करता है मगर इसमें केवल एकल नागरिकता का प्रावधान है अर्थात भारतीय नागरिकता।

स्वतंत्र निकाय

भारतीय संविधान केवल विधायिका, कार्यपालिका व सरकार (केन्द्र और राज्य) न्यायिक अंग ही उपलब्ध कराता है। बल्कि यह कुछ स्वतंत्र निकायों की स्थापना भी करता है। इन्हें संविधान ने भारत सरकार के लोकतांत्रिक तंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभों के रूप में परिकल्पित किया है।

आपातकालीन प्रावधान

आपातकाल की स्थिति से प्रभावशाली ढंग से निपटने के लिए भारतीय संविधान में राष्ट्रपति के लिए बृहत आपातकालीन प्रावधानों की व्यवस्था है। इन प्रावधानों को संविधान में शामिल करने का उद्देश्य है- देश की संप्रभुता, एकता, अखण्डता और सुरक्षा, संविधान एवं देश के लोकतांत्रिक ढांचे को सुरक्षा प्रदान करना।

संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल की विवेचना की गई है:

   (1) राष्ट्रीय आपातकाल: युद्ध, आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह पैदा हुई राष्ट्रीय अशांति की अवस्था (अनुच्छेद-352)

   (2) राज्य आपातकाल: (राष्ट्रपति शासन): राज्यों में संवैधानिक तंत्र की असफलता (अनुच्छेद-356) या केन्द्र के निदेशों का अनुपालन करने में असफलता (अनुच्छेद-365)

   (3) वित्तीय आपातकाल: भारत की वित्तीय स्थिरता या प्रत्यय संकट में हो (अनुच्छेद-360)

त्रिस्तरीय सरकार

मूल रूप से अन्य संघीय संविधानों की तरह भारतीय संविधान में दो स्तरीय राजव्यवस्था (केन्द्र व राज्य) और संगठन के संबंध में प्रावधान तथा केंद्र एवं राज्यों की शक्तियां अंतर्विष्ट थी। बाद में वर्ष 1992 में 73वें एवं 74वें संविधान संशोधन ने तीन स्तरीय (स्थानीय) सरकार का प्रावधान कीया गया, जो विश्व के किसी और संविधान में नहीं है। 

सहकारी समितियां

97वां संविधान संशोधन अधिनियम 2011 ने सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा और संरक्षण प्रदान किया। इस संदर्भ में निम्न तीन परिवर्तन संविधान में इसने किए-

(1) इसने सहकारी समिति गठित करने के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दिया (अनुच्छेद-19)   

(2) इसने एक नया राज्य का नीति निदेशक तत्व जोड़ा सहकारी समितियों के प्रोत्साहन देने के लिए (अनुच्छेद-43-B)

(3) इसने संविधान में एक नया IX-B भाग जोड़ा- “सहकारी समितियां” शीर्षक से (अनुच्छेद-243 ZHसे लेकर 243-तक)

संविधान की आलोचना

    (1) उधार का संविधान

    (2) 1935 के अधिनियम की कार्बन कॉपी

    (3) अभारतीय अधवा भारतीयता विरोध

    (4) गांधीवाद से दूर संविधान

    (5) महाकाय आकार

    (6) वकीलों का स्वर्ग

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