Lecture – 6

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संविधान की प्रमुख विशेषताए

केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को मिली संवैधानिक शक्ति संविधान के ‘मूल ढांचे’ को बदलने की अनुमति नहीं देती।

संविधान की विशेषताएं

                 सबसे लंबा लिखित संविधान

संविधान को दो वर्गो में विभाजित किया जाता है – लिखित, जैसे- अमेरिकी संविधान, और; अलिखित, जैसे- ब्रिटेन का संविधान। oमूल रूप से (1949) संविधान में एक प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद (22 भागों में विभक्त) और 8 अनुसूचियां थीं। वर्तमान में (2016) इसमें एक प्रस्तावना, 465 अनुच्छेद (25 भागों में विभक्त) और 12 अनुसूचियां हैं।

भारत के संविधान को विस्तृत बनाने के पीछे निम्न चार कारण हैं:

    (अ) भौगोलिक कारण, भारत का विस्तार और विविधता।

    (ब) ऐतिहासिक, इसके उदाहरण के रूप में भारत शासन अधिनियम, 1935 के प्रभाव को देखा जा सकता है। यह अधिनियम बहुत विस्तृत था।

    (स) जम्मू-कश्मीर को छोड़कर केंद्र और राज्यों के लिए एकल संविधान सभा में कानून विशेषज्ञों का प्रभुत्व।

विभिन्न स्रोतों से विहित

संविधान का अधिकांश ढांचागत हिस्सा भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिया गया है। संविधान का दार्शनिक भाग (मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत) क्रमश: अमेरिका और आयरलैंड से प्रेरित है। भारतीय संविधान के राजनीतिक भाग (संघीय सरकार का सिद्धांत और कार्यपालिका और विधायिका के संबंध) का अधिकांश हास्सा ब्रिटेन के संविधान से लिया गया है। भारत के संविधान पर सबसे बड़ा प्रभाव और भौतिक सामग्री का स्रोत भारत सरकार अधिनियम, 1935 रहा है। संघीय व्यवस्था ,

न्यायपालिका, राज्यपाल, आपातकालीन अधिकार, लोक सेवा आयोग और अधिकतर प्रशासनिक विवरण इसी से लिए गए हैं।

              नम्यता एवं अनम्यता का समन्वय

संविधान को नम्यता और अनम्यता की दृष्टि से भी वर्गीकृत किया जाता है। कठोर या अनम्य संविधान उसे माना जाता है, जिसमें संशोधन करने के लिए विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता हो। उदाहरण के लिए अमेरिकी संविधान। लचीला या नम्य संविधान वह कहलाता है, जिसमें संशोधन की प्रक्रिया वही हो, जैसी किसी आम कानूनों के निर्माण की, जैसे- ब्रिटेन का संविधान।

एकात्मक की ओर झुकाव के साथ संघीय व्यवस्था

भारत का संविधान संघीय सरकार की स्थापना करता है। इसमें संघ के सभी आम लक्षण विध्यमान हैं; जैसे- दो सरकार, शक्तियों का विभाजन, लिखित संविधान, संविधान की सर्वोच्चता, संविधान की कठोरता, स्वतंत्र न्यायपालिका एवं द्विसदनीयता आदि।

                  सरकार का संसदीय रूप

भारतीय संविधान ने अमेरिका की अध्यक्षीय प्रणाली की बजाए ब्रिटेन के संसदीय तंत्र को अपनाया है। संसदीय व्यवस्था विधायिका  और  कार्यपालिका के मध्य  समन्वय व सहयोग के सिद्धांत पर आधारित है, जबकि अध्यक्षीय प्रणाली दोनों के बीच शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है।

संसदीय प्रणाली को सरकार के ‘वेस्टमिंस्टर’ रूप, उत्तरदायी सरकार और मंत्रिमंडलीय सरकार के नाम से भी जाना जाता है। संविधान केवल केंद्र में ही नहीं, बल्कि राज्य में भी संसदीय प्रणाली की स्थापना करता है। भारत में संसदीय प्रणाली की विशेषताएं निम्नलिखि हैं: (1) वास्तविक व नाममात्र के कार्यपालकों की उपस्थिति,

(2) बहुमत वाले दल की सत्ता,

(3) विधायिका के समक्ष कार्यपालिका की संयुक्त जवाबदेही,

(4) विधायिका में मंत्रियों की सदस्यता,

(5) प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नेतृत्व,

(6) निचले सदन का विघटन (लोकसभा अथवा विधानसभा)।

संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता में समन्वय

संसद की संप्रभुता की नियम ब्रिटिश संसद से जुड़ा हुआ है, जबकि न्यायपालिका की सर्वोच्चता का सिद्धांत, अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय से लिया गया है। oभारतीय संविधान निर्माताओं ने ब्रिटेन की संसदीय संप्रभुता और अमेरिका की न्यायपालिका सर्वोच्चता के बीच उचित संतुलन बनाने को  प्राथमिकता  दी। एक ओर जहां  सर्वोच्च  न्यायालय  अपनी न्यायिक समीक्षा की शक्तियों के तहत संसदीय कानूनों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है, वहीं दूसरी ओर संसद अपनी संवैधानिक शक्तियों के बल पर संविधान के बड़े भाग को संशोधित कर सकती है।

oसर्वोच्च न्यायालय, संघीय अदालत है। यह शीर्ष न्यायालय है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है और संविधान का संरक्षक है।

                   मौलिक अधिकार

संविधान के तीसरे भाग में छह मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। ये अधिकार हैं:

(1) समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)

(2) स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)

(3) शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)

(4) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)

(5) सांस्कृतिक व शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 29-30)

(6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)।

अनुच्छेद 20-21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छोड़कर राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान इन्हें स्थगित किया जा सकता है।

            राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत

डॉ. बी. आर. अंबेडकर के अनुसार, राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता है। इनका उल्लेख संविधान के चौथे भाग में किया गया है इन्हें मोटे तौर पर तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है – सामाजिक, गांधीवादी तथा उदार-बौद्धिक।

                एकीकृत व स्वतंत्र न्यायपालिका

भारतीय संविधान एक ऐसी न्यायपालिका की स्थापना करता है, जो अपने आप में एकीकृत होने के साथ-साथ स्वतंत्र है। oभारत की न्याय व्यवस्था में सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर है। इसके नीचे राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय हैं। राज्यों में उच्च न्यायालय के नीचे क्रमवार अधीनस्थ न्यायालय हैं, जैसे- जिला अदालत व अन्य निचली अदालतें।

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