Lecture – 2

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1858 का भारत शासन अधिनियम

भारत के शासन को अच्छा बनाने वाला अधिनियम नाम से प्रसिद्ध इस कानून ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को समाप्त कर दिया और गवर्नरों, क्षेत्रों और राजस्व संबंधी शक्तियां ब्रिटिश राजशाही को हस्तान्तरित कर दी।

इसके तहत भारत का शासन सीधे महारानी विक्टोरिया के अधीन चला गया। गवर्नर जनरल का पदनाम बदलकर भारत का वायसराय कर दिया गया। वायसराय भारत में ब्रिटिश ताज का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि बन गया। 

लार्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।

इस अधिनियम ने निंयत्रण बोर्ड और निदेशक कोर्ट को समाप्त कर दिया।

एक नए पद, भारत के राज्य सचिव, का सृजन किया गया, जिसमें भारतीय प्रशासन पर सम्पूर्ण नियंत्रण की शक्ति निहित थी। यह सचिव ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य था। 

1861 का भारत परिषद अधिनियम

इस अधिनियम ने गवर्नर जनरल को अपनी विस्तारित परिषद में भारतीय जनता के प्रतिनिधियों को शामिल करके उन्हे विधायी कार्य से सम्बद्ध करने का अधिकार प्रदान किया।

इसने गवर्नर जनरल की परिषद की विधायी शक्तियों का विकेन्द्रीकरण कर दिया, जिससे बम्बई और मद्रास की सरकारों को भी विधायी शक्ति प्रदान की गयी।

लार्ड कैनिंग द्वारा 1859 में प्रारम्भ की गयी पोर्टफोलियों प्रणाली को मान्यता दी।

        भारत शासन अधिनियम 1909

इस अधिनियम को मार्ले-मिंटो सुधार के नाम से भी जाना जाता है।

उस समय लार्ड मार्ले इंग्लैड में भारत के राज्य सचिव थे और लार्ड मिंटो भारत में वायसराय थे।

इसने केन्द्रीय प्रान्तीय विधान परिषदों के आकार में काफी वृद्धि की। केन्द्रीय परिषद में इनकी संख्या 16 से 60 हो गयी।

इस अधिनियम के अन्तर्गत पहली बार किसी भारतीय को वायसराय और गवर्नर की कार्यपरिषद के साथ एसोसिएशन बनाने का प्रावधान किया गया।

इस अधिनियम ने पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया। इस अधिनियम ने साम्प्रदायिकता को वैधानिकता प्रदान की और लार्ड मिन्टो को “साम्प्रदायिक निर्वाचन के जनक” के रुप में जाना गया।

भारत शासन अधिनियम, 1919

इस कानून को मांटेग-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है (मांटेग भारत के राज्य सचिव थे, जबकि चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय थे)।

                अधिनियम की विशेषताएं

    (1) केंद्रीय और प्रांतीय विषयों की सूची की पहचान कर एवं उन्हे पृथक् राज्यों पर केंद्रीय नियंत्रण कम किया गया। केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों को, अपनी सूचियों के विषयों पर विधान बनाने का अधिकार प्रदान किया गया। लेकिन सरकार का ढांचा केंद्रीय और एकात्मक ही बना रहा। 

(2) इसने प्रांतीय विषयों को पुनः दो भागों में विभक्त किया-हस्तांतरित और आरक्षित। हस्तांतरित विषयों पर गवर्नर का शासन होता था और इस कार्य में वह उन मंत्रियों की सहायता लेता था, जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी थे। दूसरी ओर आरक्षित विषयों पर गवर्नर कार्यपालिका परिषद के प्रति उत्तरदायी नहीं थी। शासन की इस दोहरी व्यवस्था को द्वैध (यूनानी शब्द डाई-आर्की से व्युत्पन्न) शासन व्यवस्था कहा गया।

(3) इस अधिनियम ने पहली बार देश में द्विसदनीय व्यवस्था और प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था प्रारंभ की।

(4) इसने सांप्रदायिक आधार पर सिखों, भारतीय ईसाईयों, आंग्ल-भारतीयों और यूरोपियों के लिए भी पृथक् निर्वाचन के सिद्धांत को विस्तारित कर दिया।

(5) इस कानून ने लंदन में भारत के उच्चायुक्त के कार्यालय का सृजन किया और अब तक भारत सचिव द्वारा किए जा रहे कुछ कार्यों को उच्चायुक्त को स्थानांतरित कर दिया गया। 

(6) 1926 में सिविल सेवकों की भर्ती के लिए केंद्रीय लोक सेवा आयोग का गठन किया गया।

 (7) इसने पहली बार केंद्रीय बजट को राज्यों के बजट से अलग कर दिया और राज्य विधानसभाओं को अपना बजट स्वयं बनाने के लिए अधिकृत कर दिया।

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