31-10-2019 (Newspaper Clippings)

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गुटनिरपेक्षता और हम

शुक्रवार को अजरबैजान में शुरू हो रहे गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में इस बार भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं जा रहे हैं। इस सम्मेलन में जो भारतीय प्रतिनिधिमंडल जा रहा है, उसकी अगुवाई उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू करेंगे। यही पिछली बार 2016 के वेनेजुएला सम्मेलन में भी हुआ था। उस समय भी प्रधानमंत्री नहीं गए थे और उनकी जगह प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने किया था। यह खबर महत्वपूर्ण इसलिए है कि भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक रहा है और नई दिल्ली में चाहे किसी भी दल की सरकार हो, प्रधानमंत्री के वहां जाने की रवायत हमेशा बनी रही। इसके पहले तक एक ही अपवाद था, जब चौधरी चरण सिंह गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में नहीं गए थे, क्योंकि उनकी सरकार गिर चुकी थी और वह तब कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर पद का दायित्व निभा रहे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार दो बार गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में न जाना इसी लिहाज से बड़ी खबर है और अगले कुछ समय तक इसकी तरह-तरह से व्याख्या चलती रहेगी।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन का जन्म तब हुआ था, जब दुनिया पूरी तरह से अमेरिकी और सोवियत खेमे में बंटी थी। पर बहुत से ऐसे देश थे, जो इनमें से किसी भी गुट में शामिल होने को तैयार नहीं थे। ऐसे में, भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल नासिर और यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिब ब्रोज टीटो ने ऐसे देशों का संगठन खड़ा किया, जो अपने को किसी भी गुट से जोड़कर नहीं देखते थे और इसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नाम दिया गया। कुछ ही साल में यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण संगठन बन गया, जब तीसरी दुनिया के ज्यादातर देश इसमें शामिल हो गए थे। लेकिन बाद में जब सोवियत संघ खत्म हुआ और इसके चलते अमेरिकी गुट बेमतलब हो गया, तो गुटनिरपेक्ष आंदोलन के बने रहने पर भी सवाल उठने लगे। इस सम्मेलन ने तीसरी दुनिया का पैरोकार बनने की लगातार कोशिश की, जिसमें वह काफी हद तक कामयाब भी रहा। लेकिन फिर भी ध्रुवीकरण के खात्मे ने उसके सामने पहचान का एक संकट तो खड़ा कर ही दिया था।

हालांकि इस तरह के संकट दूसरे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सामने भी आते रहे हैं। मसलन, जी-7 संगठन का गठन जिस उद्देश्य से हुआ था, वह कुछ ही समय में खत्म हो गया था, लेकिन विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने अपने इस संगठन के लिए एक नई भूमिका तलाश ली थी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन को इस भूमिका की अभी भी तलाश है। एक उम्मीद थी कि जैसे इस संगठन ने रंगभेद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था, वैसे ही अब यह आतंकवाद के खिलाफ खड़ा हो सकता है, पर ऐसा नहीं हुआ।

यह भी कहा जा सकता है कि भारत की गुटनिरपेक्ष प्रतिबद्धता उस नेहरू युग की नीति है, जिससे भारतीय विदेश नीति अब दूर जा रही है। लेकिन सच यही है कि भारत ने इससे किनारा नहीं किया है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल अभी भी वहां जा रहा है और तीसरी दुनिया के उस बड़े मंच से दूरी बनाने की बात सोची भी नहीं जा सकती, जिसमें भारत की हमेशा बड़ी भूमिका रही हो। पर यह भी सच है कि पिछले कुछ साल में दुनिया जिस तेजी से बदली है, उसमें भारत की प्राथमिकताएं बदल गई हैं, लेकिन इसे नीति का बदलना शायद अभी नहीं कहा जा सकता।

स्रोत –  हिंदुस्तान

जब उन्हें भारत रत्न दिया जाएगा

गोपालकृष्ण गांधी, (पूर्व राज्यपाल)

क्या विनायक दामोदर सावरकर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा? बहुत संभव है, हां। हमारे समय की हर चीज इसी ओर संकेत कर रही है। क्या उन्हें यह सम्मान मिलना चाहिए? आइए, यह सवाल हम गांधी अर्थात मोहनदास करमचंद गांधी के सामने ही रखते हैं। गांधी इस पर क्या कह सकते हैं? वह तो अब नहीं हैं, क्या वह अब भी हैं? हां, वह अब भी हैं, लेकिन अपने लिखित शब्दों के साथ। उनके बोल आज भी बहुत हद तक जिंदा हैं। और ये शब्द ठीक वैसे ही बोले जा रहे हैं, जैसे गांधी आज ही और अभी बोल रहे हों। उनके शब्द यह देखने में हमारी मदद करेंगे कि सावरकर को भारत रत्न देना अच्छा है या नहीं।

गांधी ने लगभग 100 साल पहले 26 मई, 1920 को यंग इंडिया में लिखा था, उनका वह संक्षिप्त लेख उन राजनीतिक आरोपियों पर था, जिन्हें उस समय शाही क्षमादान का लाभ मिला था। हालांकि अंगरेजों के अनुग्रह का यह व्यवहार सभी के लिए नहीं था। गांधी ने दो ऐसे लोगों का मामला उठाया, जो कैद से छोडे़ नहीं गए थे- गणेश दामोदर सावरकर और उनके छोटे भाई विनायक दामोदर सावरकर। इसके लिए एर्क हिंसक क्रोध या उनके द्वारा हिंसक वारदात की आशंका को कारण बताया गया था।

गांधी को पता चल गया था कि वे दोनों भाई हैं। गांधी बहुत पहले 1909 में उनसे लंदन में मिले थे। गांधी का यह कहना था कि गणेश सावरकर ने कोई हिंसा नहीं की थी। गांधी ने जो लिखा है, उससे छोटे सावरकर की जीवनी संबंधी झांकी हमें मिल जाती है। गांधी ने जुलाई 1910 में मार्सिलेस की एक नाव से भगोड़े अपराधियों के अधिनियम के तहत भारत भेजे जाने के दौरान सावरकर के भागने के नाटकीय और साहसी प्रकरण पर प्रकाश डाला। गांधी ने 1920 में विनायक दामोदर सावरकर के बारे में जो वर्णन किया है, उसका एक अंश है, ‘भाई का जन्म 1884 में हुआ था और लंदन में अपने करियर के लिए उन्हें बेहतर जाना जाता है। पुलिस की हिरासत से बच निकलने की उनकी सनसनीखेज कोशिश और एक पोर्टहोल के जरिए फ्रांसीसी खाड़ी में कूदने के कारण अभी भी लोगों के दिमाग में उनकी याद ताजा है। उन्होंने फग्र्यूसन कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की, लंदन में पढ़ाई पूरी की और बैरिस्टर बन गए। वह 1857 के सिपाही विद्रोह के अवैध करार दिए गए इतिहास के लेखक हैं। उन पर 1910 में मुकदमा चलाया गया था और उन्हें 24 दिसंबर, 1910 को उनके भाई के समान ही सजा मिली। 1911 में उन पर हत्या का आरोप भी लगाया गया था। हालांकि उनके खिलाफ किसी भी तरह की हिंसक गतिविधि साबित नहीं हुई।’

इस लेख के उत्तराद्र्ध में गांधी अपनी सटीक समझदारी के साथ उल्लेख करते हैं, सावरकर बंधुओं ने बता दिया है कि वे किसी क्रांतिकारी विचार की सेवा नहीं करते हैं, अगर वे छूटेंगे, तो भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत ही काम करना चाहेंगे। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी ने उनके सम्मान या उनकी ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाए हैं। यदि आज गृह मंत्रालय सावरकर को भारत रत्न देने के पक्ष में माहौल बनाना चाहता है, तो गांधी के उपरोक्त कथन के इस्तेमाल से बेहतर और कुछ हो नहीं सकता। उस कथन में सावरकर के जन्म के वर्ष से लेकर प्रत्येक मुख्य बिंदु का उल्लेख किया गया है, एक चर्चित घटना भी सुनाई गई है। लेखकीय विवरण पेश हैं, आचरण और चरित्र भी प्रमाणित है।

जिस सावरकर का गांधी ने 1920 में बखान किया था, वह भारत रत्न प्राप्त उन अन्य विभूतियों से कतई कम योग्य नहीं, जिन्हें उनकी असाधारण सेवा, सर्वोच्च प्रदर्शन के अलावा अन्य कारणों से भारत रत्न मिला है। लेकिन मुझे यह भी कहना होगा कि एक और सावरकर भी हैं, जिन्हें भारत रत्न का तमगा देना कई सवाल पैदा करेगा। क्या वह गांधी हत्याकांड के आरोपी नहीं थे, जो सुबूतों के अभाव में बरी हो गए थे? नहीं, यह वह सावरकर नहीं हैं। बरी होना तो बरी होना ही होता है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी खुद सावरकर को अदालत से बरी करने की बुद्धिमत्ता या निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाते। साक्ष्य कानून में न्याय का अभिन्न अंग है, एक अमूल्य और अपूरणीय सिद्धांत। तो आइए, हम सावरकर के बरी होने पर सवाल न करें। हमें विश्वास है कि जब एक अदालत ने पाया कि सावरकर का महात्मा गांधी की हत्या से कोई लेना-देना नहीं था, तब उनका वास्तव में इससे कोई लेना-देना नहीं था, इस पर शक का औचित्य नहीं है।

लेकिन हमें एक अन्य ऐतिहासिक तथ्य पर संदेह नहीं करना चाहिए। यह एक असंगत संदेह है कि वह उन लोगों के लिए एक प्रेरणा थे, जो यह सोचते हैं कि हत्यारों ने जो किया, सही किया। जो बहुमत के अधिकार के प्रबल होने में विश्वास करते हैं। यह चर्चा हमें एक बड़े प्रति-ऐतिहासिक, विडंबनापूर्ण सत्य की ओर ले जाती है। यदि सावरकर को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा जाता है, तो इससे महात्मा गांधी कमतर नहीं होंगे। इसके उलट मानवता की वेदी पर उनकी शहादत और चमक जाएगी, दुनिया भर में और मजबूत हो जाएगी। यह एक सुसज्जित राष्ट्रवादी और एक पदकहीन मानवतावादी के बीच का विरोधाभास है। इससे उन लोगों को अप्रत्याशित प्रतिशोध मिलेगा, जिन्होंने घृणा-मुक्त, सत्य से भय-मुक्त प्रेम, अथाह क्षमाशीलता वाले गांधी की विरासत को हंसी के साथ, बुरा-भला कहा है। अभिषेक के समय तालियां बजेंगी, किसी ऊंची जगह पर, एक हाथ सम्मान करने के लिए आगे बढ़ेगा और नए भारत रत्न के कंधे पर विराम लेगा, और बेआवाज बात होगी, ‘हम सच्चाई जानते हैं, तुम और मैं, क्या हम नहीं जानते?’

स्रोत –  हिंदुस्तान

छोटे उद्योगों की भी सुध लें

हाल ही में 22 अक्टूबर को केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने कहा है कि सरकार सूक्ष्म, लघु एवं मझौले उद्योगों (एमएसएमई) की मुश्किलें कम करने के लिए शीघ्र ही राहत की घोषणा करने जा रही है। वस्तुत: इस समय आर्थिक सुस्ती से मुश्किलों का सामना कर रहे छोटे उद्योग-कारोबार क्षेत्र के द्वारा कारोबार सुधार की नई जरूरत अनुभव की जा रही है। छोटे उद्यमी-कारोबारी चाहते हैं कि उन्हें जीएसटी संबंधी मुश्किलों से राहत मिले साथ ही तकनीकी विकास और नवाचार का भी उन्हें लाभ मिले। खासतौर से ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी छोटे उद्यमी और कारोबारी बड़ी राहत की अपेक्षा कर रहे हैं। ऐसा किए जाने से देश के छोटे उद्योग कारोबार को नई मुस्कराहट मिल सकेगी।

निसंदेह देश के बड़े उद्योग-कारोबार करने वालों की तुलना में छोटे-उद्योग कारोबार करने वाले अधिक कारोबार सरलता की अपेक्षा कर रहे हैं क्योंकि छोटे-उद्योग-कारोबार करने वालों के पास संसाधन की कमी है। स्थिति यह है कि कारोबार सुगमता संबंधी अधिकांश रैंकिंग में देश के छोटे उद्योग-कारोबार के विश्लेषण कम ही शामिल होते हैं। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंकिंग में भी छोटे उद्योग-कारोबार की सहभागिता दिखाई नहीं देती है। गौरतलब है कि पिछले दिनों विश्व बैंक के द्वारा ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के परिप्रेक्ष्य में तैयार की गई टॉप-20 परफॉर्मर्स सूची में भारत को भी शामिल किया गया है। ऐसे में भारत दुनिया के उन 20 देशों की सूची में शामिल हो गया है, जिन्होंने कारोबार सुगमता के क्षेत्र में सबसे अधिक सुधार किए हैं। इसमें मई 2019 को समाप्त हुए 12 महीने की अवधि के दौरान भारत के प्रदर्शन का मूल्यांकन किया गया है।

भारत ने जिन चार क्षेत्रों में बड़े सुधार किए हैं वे हैं। एक-बिजेनस शुरू करना; दो-दिवालियापन का समाधान करना; तीन-सीमा पार व्यापार को बढ़ाना और चार-कंस्ट्रक्शन परमिट्स में तेजी लाना। यद्यपि देश नवाचार और प्रतिस्पर्धा में अपनी रैंकिंग को सुधारता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन छोटे उद्योगों को नवाचार और प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ाना जरूरी है। हाल ही में प्रकाशित बौद्धिक सम्पदा, नवाचार, प्रतिस्पर्धा और कारोबार सुगमता से संबंधित नियंतण्र रिपोटरे में भी भारत के सुधरते हुए प्रस्तुतिकरण की बात कही जा रही है। यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में घोषित विभिन्न प्रमुख कारोबार सूचकांकों के तहत प्रतिस्पर्धा, कारोबार एवं निवेश में सुधार का परिदृश्य भी दिखाई दे रहा है। आईएमडी विश्व प्रतिस्पर्धिता रैंकिंग 2019 के अनुसार, वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तेज वृद्धि, कंपनी कानून में सुधार और शिक्षा पर खर्च बढ़ने के कारण भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा है। इस रैकिंग में भारत 43वें स्थान पर आ गया है। पिछले साल भारत 44वें स्थान पर था। इन विभिन्न क्षेत्रों में भारत के ऊंचाई पर पहुंचने से भारत में विदेशी निवेश बढ़ेगा, भारत में नियंतण्र कंपनियों का प्रवाह बढ़ेगा ।

यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि छोटे उद्योगों को भी बौद्धिक सम्पदा के मद्देनजर आगे बढ़ाना जरूरी है। बौद्धिक सम्पदा एवं नवाचार में भारत के आगे बढ़ने का आभास इसी वर्ष 2019 में नवाचार, प्रतिस्पर्धा और बौद्धिक सम्पदा से संबंधित जो नियंतण्र सूचकांक और अध्ययन रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं, उनमें भारत आगे बढ़ता हुआ बताया जा सकता है। हाल ही में प्रकाशित नियंतण्र नवोन्मुखी सूचकांक यानी ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स (जीआईआई) 2019 रिपोर्ट का प्रकाशन विश्वविख्यात कोरनेट यूनिर्वसटिी, आईएनएसईएडी और संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआईपीओ) द्वारा किया गया है। जीआईआई के कारण विभिन्न देशों को सार्वजनिक नीति बनाने से लेकर दीर्घावधि आउटपुट, वृद्धि को प्रोत्साहन देने, उत्पादकता में सुधार और नवोन्मेष के माध्यम से नौकरियों में वृद्धि में सहायता मिली है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस समय जब कारोबार में बढ़ती अनुकूलताओं के कारण भारत के शहरों में ख्याति प्राप्त नियंतण्र फाइनेंस और कॉमर्स कंपनियां अपने कदम तेजी से बढ़ा रही हैं, तब भारत के शहरों में छोटे और कुटीर उद्योगों के लिए सुविधाएं बढ़ाई जानी चाहिए। भारत से कई विकसित और विकासशील देशों के लिए कई काम बड़े पैमाने पर आउटसोर्सिग पर हो रहे हैं।

भारत में स्थित नियंतण्र फाइनेंशियल फर्मो के दफ्तर ग्लोबल सुविधाओं से सुसज्जित हैं। इन नियंतण्र फर्मो में बड़े पैमाने पर प्रतिभाशाली भारतीय युवाओं की नियुक्तियां हो रही है। बेंगलुरू में गोल्डमैन सॉक्स का नया कैम्पस लगभग 1800 करोड़ रुपये में बना है और यह कैम्पस न्यूयॉर्क स्थित मुख्यालय जैसा है। यहां पर कर्मचारियों की संख्या 5000 से अधिक है। दुनिया की दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनी एमेजॉन ने हैदराबाद में 30 लाख वर्ग फुट के क्षेत्र में जो इमारत बनाई है, वह हैदराबाद की सबसे बड़ी इमारत है। इसमें 15 हजार कर्मचारी हैं। देश के नवाचार, कारोबार एवं प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने के पीछे एक प्रमुख कारण यह है कि वर्ष 2018-19 में भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था, घरेलू कारोबार, स्टार्टअप, विदेशी निवेश, रिसर्च एंड डेवलपमेंट को प्रोत्साहन मिला है। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां नई प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारतीय आईटी प्रतिभाओं के माध्यम से नवाचार को बढ़ावा देने के लिए भारत में अपने ग्लोबल इन हाउस सेंटर (जीआईसी) तेजी से बढ़ाते हुए दिखाई दे रही हैं।

इंटरनेट ऑफ थिंग्स, कृत्रिम बुद्धिमता और डेटा एनालिटिक्स जैसे क्षेत्रों में शोध और विकास को बढ़ावा देने के लिए लागत और प्रतिभा के अलावा नई प्रोद्यौगिकी पर इनोवेशन और जबरदस्त स्टार्टअप माहौल के चलते दुनिया की कंपनियां भारत का रुख कर रही हैं। निसंदेह अभी हमें छोटे उद्योग और कारोबार के मद्देनजर कारोबार सुगमता, नवाचार एवं प्रतिस्पर्धा के वर्तमान स्तर एवं विभिन्न नियंतण्र रैंकिंग में आगे बढ़ते कदमों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। अभी इन विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक सुधार की जरूरत है। निश्चित रूप से देश में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) पर खर्च बढ़ाया जाना होगा। भारत में आरएंडडी पर जितनी राशि खर्च होती है उसमें इंडस्ट्री का योगदान काफी कम है, जबकि अमेरिका, इस्रइल और चीन में यह काफी अधिक है। आरएंडडी पर पर्याप्त निवेश के अभाव के चलते भारतीय प्रोडक्ट्स ग्लोबल ट्रेड में पहचान नहीं बना पा रहे हैं।

स्रोत –  राष्ट्रीय सहारा

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