30-10-2019 (Newspaper Clippings)

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सही निर्णय लेने में बाधक है स्टूडियो में होने वाली जंग

भारत और पड़ोसी पाकिस्तान के बीच तनाव है, बढ़ रहा है संभव है शांति लाने के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सभी प्रयास असफल हो जाएं और परिणाम अकल्पनीय हो। लेकिन ऐसे में भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जिस तरह पाकिस्तान के दो लोगों को और भारत के चार लोगों (अधिकांश रिटायर्ड फौजी) को स्टूडियो में लेकर एक अपेक्षाकृत कम जानकारी रखने वाला एंकर चीख-चीखकर पाकिस्तानी पक्ष को अपमानित करता है और उसकी शह पर भारतीय प्रतिभागी भी उसी भाव में बताते हैं कि अब समय आ गया है जब शत्रु को नेस्तनाबूत कर दिया जाए। उससे जनता में एक भाव पैदा होता है, जिससे सरकार भी दबाव में आती है और सही निर्णय और सही समय का चुनाव नहीं हो पाता। याद करें कंधार हाई-जैकिंग। मीडिया ने सुबकते परिवार वालों और उतनी ही चीखती जनता को दिन-रात दिखा-दिखाकर सरकार पर इतना दबाव बनाया कि पाकिस्तान में बैठे आतंकी सरगना को लगा कि भारत किसी भी कीमत पर झुकेगा। मनोवैज्ञानिक युद्ध के हमारे सारे प्रयास ठंडे हो गए इस जन-दबाव के आगे। टीवी चैनलों के न्यूज़ रूम और प्रोडक्शन कंट्रोल रूम (पीसीआर) के अपरिपक्व युवाकर्मी यही चर्चा करते हैं कि किस वक्ता ने ‘फोड़ दो’,‘फाड़ दो,’ ‘घुसकर मारो’ या ‘हमेशा के लिए यह झंझट ख़त्म कर दो’ के स्वर में भारत-पाक समस्या का निदान गला फाड़ते हुए बताया। ‘ये टीआरपी लाएगा’ या ‘यह बिकता है’ यह आम जुमला है उस वर्ग का। नतीजा यह होता है कि सेना ही नहीं सरकार पर भी दबाव पड़ने लगता है। कम से कम इन मुद्दों पर जिन पर लोगों की वास्तविक जानकारी बहुत कम होती है (आयुध को लेकर, भौगोलिक स्थिति के बारे में या अंतरराष्ट्रीय हालात के मद्देनज़र) या सामान्यजन का सीमित सरोकार होता है, फैसला सरकार और सेना पर छोड़ देना चाहिए। टीवी संपादकों को इन मुद्दों पर टीआरपी की तलाश की जगह पत्रकारिता में अपेक्षित शालीनता और सावधानी बरतनी चाहिए। एसी कमरे में बैठकर उग्र राष्ट्रवाद के लिए बुलंद आवाज में एंकरों और मेहमानों से पाकिस्तान को मच्छर की तरह मसलने की बात पर लोग गुस्से में तो आ सकते हैं पर इससे मोर्चे पर बम नहीं चला करते, न ही परमाणु-संपन्न पाकिस्तान मच्छर बन जाता है न ही शक्तिशाली भारत कांपने लगता है। हां, इतना जरूर होता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मानसिक दिवालिएपन का मुजाहरा हो जाता है।

स्रोत –  दैनिक भास्कर

व्यवहार को सही दिशा देता अर्थशास्त्र

कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यन , (लेखक वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में मामल्लपुरम के समुद्र तट पर साफ-सफाई करके एक बड़ा संदेश दिया। इसे प्रेरक पहल से जुड़े व्यावहारिक अर्थशास्त्र की एक और अनूठी मिसाल कहा जा सकता है, जो भारत में व्यावहारिक बदलाव लाने से जुड़ी है। वर्ष 2018-19 की आर्थिक समीक्षा में इस पर व्यापक दृष्टि डाली गई है कि प्रेरक पहल के माध्यम से कैसे व्यवहारगत बदलावों को मूर्त रूप दिया जा सकता है। चूंकि तमाम नीतियां राज्यों के स्तर पर लागू होती हैं, इसलिए राज्यों के नीति-निर्माताओं को चाहिए कि वे आम लोगों को प्रेरित करने वाले तौर-तरीकों की अहमियत समझें। यदि कोई प्रेरक पहल की संभावनाओं को समझना चाहते हैं तो उस वक्त को याद कीजिए जब आपने जागने के लिए सुबह छह बजे का अलार्म लगाया हो और उसके बजने पर चिड़चिड़ाकर उसे बंद करके फिर से सोने लगे हों? प्रेरक पहल के माध्यम से व्यावहारिक बदलाव के लिहाज से यह क्यों महत्वपूर्ण है? यह इसलिए अहम है, क्योंकि परंपरागत अर्थशास्त्र के सिद्धांत हमें इंसानी ताकत और कमजोरियों से मुक्त रोबोट जैसा मानते हैं, लेकिन अर्थशास्त्र की एक शाखा- व्यावहारिक अर्थशास्त्र ऐसी भी है जो हमें हमारे अनूठेपन के साथ मानव के रूप में ही देखती है। मानव व्यवहार, व्यावहारिक अर्थशास्त्र हमें इस बात की परख कराते हैं कि वांछित व्यवहार की दिशा में लोगों को नेक पहल के माध्यम से कैसे प्रेरित किया जाए।

भारत में जहां सामाजिक एवं सांस्कृतिक मानक लोगों के व्यवहार को प्रभावित करने में अहम भूमिका अदा करते हैं, वहां हमारे व्यवहार में लाभदायक परिवर्तन लाने के लिहाज से व्यावहारिक अर्थशास्त्र एक महत्वपूर्ण माध्यम साबित हो सकता है। मिसाल के तौर पर लाभदायक सामाजिक मानकों को सकारात्मक पहल द्वारा और विस्तार दिया जा सकता है। इनमें हमारे दोस्त और पड़ोसी या वे लोग आदर्श होते हैं, जिन्हें हम खुद से जोड़कर देख सकते हैं। दूसरा, विकल्प चुनते समय हम सभी व्यापक निष्क्रियता के वशीभूत होकर अक्सर यथास्थितिवाद वाले विकल्प को पकड़े रहते हैं। इस निष्क्रियता से बाहर निकलने और बदलाव लाने में बमुश्किल ही कोई खर्च आता है। ऐसे में अपने विकल्पों को प्रभावित किए बिना ही वांछित व्यवहार को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। तीसरा, अक्सर हमारे लिए अच्छी आदतों को निरंतर बनाए रखना मुश्किल होता है। ऐसे में प्रेरक वचन और पहले किए गए अच्छे कामों को याद करने से व्यवहार में बदलाव को निरंतरता देने में मदद मिलती है।

बीते पांच वर्षों के दौरान सरकार पहले ही सफल व्यावहारिक बदलावों को मूर्त रूप दे चुकी है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसी पहल से बालिका जन्म दर में आशातीत बढ़ोतरी हुई है। इसी तरह बेटी को परिवार पर बोझ के बजाय पिता का गौरव बताने के मकसद से शुरू किए गए ‘सेल्फी विद डॉटर जैसे अभियान ने भी मानवीय भावनाओं की शक्ति को रेखांकित करते हुए व्यावहारिक बदलावों को दिशा दी है। अपने सत्याग्र्रह से अंग्र्रेजों के छक्के छुड़ा देने वाले गांधी जी की जयंती पर शुरू किए गए स्वच्छ भारत अभियान के तहत स्वच्छाग्र्रहियों की अवधारणा भी व्यावहारिक बदलाव लाने में प्रेरक पहल के सिद्धांत की उम्दा मिसाल है। ऐसी तमाम पहल हुई हैं और उनसे मिली सीख के साथ लैंगिक समानता, स्वस्थ भारत और कर अनुपालन के जरिए सामाजिक बदलाव के महत्वाकांक्षी एजेंडे को सिरे चढ़ाया जा सकता है। जहां बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान से बहुत मदद मिली है, वहीं लैंगिक असमानता के लिए क्रांतिकारी अभियान की दरकार है। हमारे धर्मग्रंथों में महिलाओं को देवी माना गया है और उनमें स्पष्ट उल्लेख है कि जिन समाजों में स्त्री का सम्मान होता है, वहां समृद्धि का वास होता है। इस संदेश की महत्ता को देखते हुए अभियान का जोर सांस्कृतिक एवं सामजिक मानकों पर होना चाहिए, क्योंकि वे भारत में व्यवहार को बहुत निर्णायक तरीके से प्रभावित करते हैं। इस अभियान को बेटी आपकी धन लक्ष्मी-विजय लक्ष्मी का नाम दिया जा सकता है। इसमें धन लक्ष्मी से संपन्‍नता की देवी लक्ष्मी और विजय लक्ष्मी से जीत की देवी का आभास होता है। खासतौर से महिला के लक्ष्मी रूप से जुड़े संदेश पर विशेष जोर देने की जरूरत है।

अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में सरकारों ने व्यावहारिक पहलुओं पर गौर करने के लिए विशेष इकाइयां बना रखी हैं। उनसे संकेत लेकर प्रभावी नीतियां बनाई जाती हैं। तमाम अभिभावक स्कूल में अपने बच्चे की एक साल और पढ़ाई पर प्रतिफल को कम महत्व देते हैं। वे बच्चे के हाईस्कूल में पहुंचने तक स्कूली पढ़ाई को निरर्थक मानते हैं। तमाम लोग ऐसे भी हैं, जो अपने बच्चों को कुछ साल के लिए घर बैठा लेते हैं, जबकि वे पढ़ाई का खर्च उठाने में सक्षम होते हैं। मेडागास्कर में कम शिक्षित अभिभावकों को यहां तक बताया जाता है कि बच्चे की एक और साल तक स्कूली पढ़ाई का उनकी औसत आमदनी के साथ क्या समीकरण बन सकता है? इसी कड़ी में अमेरिका में एक साधारण से बदलाव ने लोगों की बचत में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी करा दी। दरअसल लोग खर्च पर पर्याप्त नियंत्रण न होने के कारण उतनी बचत नहीं कर पाते, जितनी वे करना चाहते हैं। लोगों को ऐसे विशेष खातों की पेशकश की गई जिसमें बचत के एक निश्चित लक्ष्य तक पहुंचने से पहले धन निकासी का विकल्प नहीं था। तकरीबन 30 प्रतिशत ने इस विकल्प को अपना लिया। एक साल में ही बचत अधिशेष 74 प्रतिशत चढ़ गया। लोग अपनी निष्क्रियता और सकारात्मक प्रेरणा के अभाव में ही अपेक्षित बचत नहीं कर पाते। लोगों को बचत से जुड़े उनके लक्ष्यों को याद दिलाने के लिए नियमित रूप से प्रेरक संदेश भेजे गए। केवल इन्हीं संदेशों के दम पर बचत राशि में छह प्रतिशत बढ़ोतरी हो गई।

निष्क्रियता-अकर्मण्यता लोगों को अनिर्णय का शिकार बनाती है, जिसमें वे यह जानते हुए भी फैसलों को टालते रहते हैं कि इसके कितने खराब परिणाम हो सकते हैं? उर्वरकों की खरीद में किसानों की टालमटोल से निपटने के लिए अफ्रीका में उर्वरक की होम डिलीवरी का प्रयास हुआ। इससे उर्वरक प्रयोग 70 प्रतिशत बढ़ गया। यह प्रभाव कुछ ऐसा था मानो पचास प्रतिशत मूल्य सबसिडी को अंजाम दिया गया हो। ये सभी उदाहरण प्रेरक पहल के अहम फायदों को दर्शाते हैं कि वे कैसे व्यावहारिक बदलाव लाने में सहायक हो सकते हैं। हमारे राज्यों को भी केंद्र सरकार द्वारा की गई पहल या अन्य देशों में आजमाए जा रहे कुछ अच्छे विचारों को अपनाकर नीतियों को व्यावहारिक अर्थशास्त्र से जोड़ना चाहिए।

स्रोत –  नई दुनिया

होनी चाहिए सर्जिकल स्ट्राइक

अभिषेक कु. सिंह

इसमें शक नहीं कि बीते अरसे में युवा पीढ़ी को गिरफ्त में लेने वाले नशे को लेकर जो बदनामी पंजाब ने झेली है, उसका मुकाबला देश का कोई अन्य राज्य फिलहाल नहीं कर सका है। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में एक के बाद ड्रग्स की बड़ी खेपों की बरामदगी से नीचे से लेकर ऊपर तक बैठे आला अधिकारियों के कान नहीं खड़े हुए तो दिल्ली-एनसीआर को पंजाब बनते देर नहीं लगनी। हकीकत यही है कि पिछले कुछ वर्षो में दिल्ली-एनसीआर नशीले पदार्थो की तस्करी का बड़ा अड्डा बन गया है। यमुना किनारे खुलेआम तो कभी गुपचुप होने वाली रेव पार्टयिों में प्रतिबंधित ड्रग्स का इस्तेमाल बताते हैं कि नौ-दस गुना तक बढ़ गया है।

मादक पदार्थो यानी ड्रग्स के रूप में नशे के बढ़ते चलन की टोह इससे लग जाती है कि हाल के महीनों में ड्रग्स तस्करी के कई बड़े रैकेटों का भंडाफोड़ हुआ है, और एक ही बार में करोड़ों-करोड़ रु पये की आधुनिक नशे की खेपें बरामद हुई हैं। मसलन, हाल में म्यांमार से पहले मणिपुर-बिहार और फिर दिल्ली तक लाई गई 25 किलो हेरोइन की खेप (जिसकी बाजार कीमत 125 करोड़ रु पये है) पकड़े जाने से एक बड़े रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है। पुलिस के मुताबिक हेरोइन की यह खेप दिल्ली-एनसीआर, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान भेजी जानी थी। दावा है कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पिछले दो सालों में 10 बड़े ऑपरेशन अंजाम देकर करीब 24 सौ करोड़ की हेरोइन बरामद की है, और इनमें कभी नाइजीरियाई तो कभी अफगानी नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है। बीते तीन-चार वर्षो में यहां ड्रग्स तस्करों की आवक और गिरफ्तारियां भी बढ़ी हैं। कहा जा रहा है कि दिल्ली में नशीले पदार्थ सबसे ज्यादा अफगानिस्तान और उसके बाद नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के रास्ते पहुंचते हैं, और यहां खपाए जाने के बाद ड्रग्स की ये खेपें दिल्ली से यूरोप, ब्रिटेन और लैटिन अमेरिकी देशों तक में सप्लाई की जाती हैं। इन खेपों में एक से बढ़कर एक प्रतिबंधित ड्रग्स जैसे डायजेपाम, मंड्रेक्स, एफेटेमिन, मॉर्फिन, केटामाइन, मेथमफेटामाइन, एमडीएमए, पेंटाजोकिन, स्यूडोफिड्रिन, म्याऊं-म्याऊं और कॉडिन जैसी ड्रग्स शामिल हैं।

वैसे तो ड्रग्स तस्करी पर काबू पाने वाली सरकारी एजेंसियां मुस्तैदी का दावा करती हैं, इन मामलों में कभी अफगानियों तो कभी नाइजीरियाई नागरिकों की धरपकड़ भी करती हैं, लेकिन कोई बड़ा मामला थोड़ा ठंडा पड़ते ही नशे का कारोबार पहले से भी ज्यादा रफ्तार से दौड़ने-भागने लगता है। सवाल उठता है कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल समेत हमारी सुरक्षा एजेंसियां आखिर क्या कर रही हैं, जो बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार और नेपाल से आने वाली ऐसी खेपों को रोक नहीं पाती हैं। बड़ा सवाल नशा छुड़ाने वाली तकनीकों और इलाज की पद्धतियों का भी है। हमारी सरकार की मौजूदा नीति ड्रग्स एडिक्शन से निपटने के लिए सिंगल कोर्स ट्रीटमेंट देने की है, जिसमें नशे के शिकार शख्स को चार से छह हफ्ते तक वैकल्पिक दवाओं से ट्रीटमेंट दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र नशे के इलाज की इस पद्धति को मान्यता तो देता है, लेकिन मौजूदा संसाधनों में आज के घोषित नशेड़ियों का इलाज शुरू किया जाए तो उन सभी का इलाज करने में दस से बीस साल तो लग ही जाएंगे। एक समस्या यह भी है कि भले ही नशे के आदी युवक को उसके परिजन इलाज दिलाना चाहते हैं, लेकिन अक्सर उन्हें इन चिकित्सा पद्धतियों और इलाज के केंद्र का पता ही नहीं होता।

ऊपर से सरकार का ज्यादा ध्यान सिर्फ पुनर्वास और सुधार केंद्रों पर टिका है, जिससे समस्या का संपूर्ण निराकरण संभव नहीं है। दिक्कत यह भी है कि नशा सिर्फ एक खास इलाके तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि नशे के कारोबारी धीरे-धीरे आसपास के इलाकों में भी अपना जाल फैला लेते हैं। जैसे, नशे की समस्या आज पंजाब तक सीमित नहीं है, बल्कि पड़ोसी राज्य हरियाणा इसकी चपेट में है, दिल्ली के स्कूल-कॉलेजों के सामने भी बच्चों को नशे से दूर रखना चुनौती बन गया है। हालात ये हैं कि राजस्थान का कोटा ड्रग्स का गढ़ माना जाने लगा है, उत्तराखंड के देहरादून में शाम ढलते ही नशे का धुआं और शराब की गंध माहौल में फैलने लगती है। असल में यह सामाजिक समस्या भी है, जो परंपरागत पारिवारिक ढांचों के बिखराव, स्वच्छंद जीवनशैली, सामाजिक अलगाव आदि के हावी होने और नैतिक मूल्यों के पतन के साथ और बढ़ती जा रही है। सरकार और समाज, दोनों को इस समस्या से निपटने के लिए सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई करने की जरूरत है- यह समझ अब तक पैदा हो ही जानी चाहिए थी।

स्रोत –  जनसत्ता

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