29-10-2019 (Newspaper Clippings)

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सही तथ्यों के साथ लिखा जाए इतिहास

भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन होना ही चाहिए। हमें ऐसा इतिहास लिखने की जरूरत है, जो तथ्यों से न्याय करे।

. सूर्यप्रकाश , (लेखक प्रसार भारती के चेयरमैन एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

आजादी के बाद छह दशक तक देश में ‘लुटियन समूह का बोलबाला रहा। इसमें नेहरूवादी-मार्क्सवादी और छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों का जमावड़ा रहा जो कुछ असहमतियों के बावजूद वैचारिक सहोदर हैं। उन्होंने स्कूली पाठ्यक्रम से लेकर लोक नीतियों और इतिहास लेखन तक को प्रभावित किया। अपने इस प्रभाव से वे ऐसा झूठा विमर्श खड़ा करने में सफल रहे, जिसने भारतीय सभ्यता पर प्रहार करते हुए उसे लगातार कमजोर किया, ताकि वह समय के साथ विस्मृत होती जाए। इससे वे स्वतंत्रता के बाद जन्मीं भारत की तीन पीढ़ियों को उनकी स्वर्णिम विरासत से दूर रखने में सफल रहे। इस मोर्चे पर सबसे ज्यादा नुकसान वामपंथी नेताओं, नौकरशाहों व अकादमिक तबके ने किया। उन्होंने स्कूली किताबों से लेकर इतिहास के उच्च अध्ययन पाठ्यक्रमों की विषयवस्तु को विकृत किया। साथ ही ऐसे विधायी कदम उठाए और सरकारी नीतियां बनाईं, जिससे आम जनमानस अपनी खुद की संस्कृति व परंपराओं से परहेज करने लगा।

चूंकि देश की बहुसंख्यक आबादी हिंदू थी और सदियों से भारत की सभ्यतागत पहचान भी हिंदुत्व से जुड़ी थी तो इस छद्म धर्मनिरपेक्ष तबके की व्यापक योजना हिंदू विरोध ही बन गई। उसने हिंदुत्व से जुड़ी चीजों के प्रति नकारात्मकता और हिंदू विरोधी बातों को प्रोत्साहन देने का काम किया। नफरत और विरोध की इस आग का दायरा कई क्षेत्रों तक फैलता गया जिसमें वेदों, रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों का उपहास उड़ाना, योग और आयुर्वेद को खारिज करना और सभी भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत की लानत-मलामत करना शामिल था। यह तबका 67 वर्षों तक अपनी इस मुहिम में सफल रहा। इसमें 1998-2004 के बीच राजग सरकार के छह साल का कार्यकाल भी शामिल है। सत्ता की कमान नरेंद्र मोदी के हाथों में आने के बाद ही वे अपनी नियति को प्राप्त हुए, जब 2014 में भारतीय जनता उनसे त्रस्त आ गई और उसने नेहरूवादी-मार्क्सवादी ब्रिगेड को उनके अड्डों से बेदखल करने का फैसला किया। वर्ष 2019 के आम चुनाव में जनता ने अपने उसी जनादेश को दोहराया। इसके साथ ही विमर्श बदलने की प्रक्रिया में निरंतरता का भाव आया और विश्व में प्राचीन भारतीय सभ्यता के अद्भुत योगदान को स्वीकारने और सराहने का सिलसिला शुरू हुआ।

जब भारतीय जनता ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि नेहरूवादी-मार्क्सवादी छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी तबके अब हाशिये पर होंगे, तब राष्ट्रीय गौरव की पुनर्स्थापना प्रक्रिया भी जरूर आरंभ की जानी चाहिए। गृहमंत्री अमित शाह द्वारा इतिहास के पुनर्लेखन के आह्वान को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। शाह ने तमाम उदाहरण गिनाए, मगर उन्होंने वीर सावरकर का विशेष उल्लेख किया, जिन्होंने 1857 को स्वतंत्रता के पहले संग्र्राम की संज्ञा दी थी, जबकि इतिहासकारों ने उसे अंग्र्रेजों के खिलाफ महज एक बगावत माना था।

शाह ने एकदम सही कहा कि हमें ऐसा इतिहास लिखना चाहिए, जो तथ्यों से न्याय करे। उदाहरण के लिए औरंगजेब की मिसाल लें। वर्ष 1669 में उसने अपने सेनापतियों को हिंदू मंदिरों के विध्वंस का आदेश दिया। इनमें काशी विश्वनाथ मंदिर, सोमनाथ मंदिर और मथुरा के बेहद पवित्र मंदिर शामिल थे। उसने मथुरा में मंदिर को ध्वस्त कर एक विशाल मस्जिद बनवाई और भगवान कृष्ण की मूर्ति को मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दफ्न करा दिया, ताकि मुस्लिम श्रेष्ठता कायम हो सके।

औरंगजेब ऐसा शासक था जो हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वालों को सरकारी नौकरियां दिया करता था। सजा में छूट भी एक और लुभावनी पेशकश हुआ करती थी। हिंदुओं द्वारा मंगाई जानी वस्तुओं पर उसने कर सीमा बढ़ा दी और हिंदुओं पर जजिया कर भी थोप दिया। उसने सिख गुरुद्वारों को भी नहीं बख्शा। गुरु तेगबहादुर को गिरफ्तार कर प्रताड़ित किया और इस्लाम अपनाने से इनकार करने पर उनका सिर कलम करवा दिया। गुरु गोविंद सिंह के दौर में भी सिखों पर उसके जुल्म जारी रहे और उसने उनके बेटों की हत्या करा दी। ये औरंगजेब की कुछ करतूतें हैं। फिर भी तमाम इतिहासकारों ने इन तथ्यों की अनदेखी की और उसे एक ‘सेक्युलर छवि वाला व्यक्ति बताया। अगर विकृत इतिहास लेखन के लिए कोई पुरस्कार होता तो ऐसा इतिहास लिखने पर वह शर्तिया मिल जाता। क्या छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी दिल्ली के दिल में एक प्रमुख सड़क का नामकरण ऐसे आततायी के नाम पर करने के पीछे का तर्क बता पाएंगे?

भारत के कई छोटे-बड़े शहरों में तमाम सड़कों का नामकरण इस अपराधी शासक के नाम पर किया गया। ऐसा इसलिए संभव हुआ, क्योंकि हिंदुत्व से नफरत करने वाले ही विमर्श गढ़ने की दिशा को नियंत्रित कर रहे थे। इसी तर्ज पर बाबर, हुमायूं और जहांगीर जैसे बर्बर जुल्म ढाने वालों को भी राष्ट्रीय राजधानी सहित देश के अन्य इलाकों में बहुत सम्मान दिया गया।

ऐसे अपराधियों से जुड़े प्रतीकों को कायम रखकर भारत कब तक सेक्युलर एवं लोकतांत्रिक राष्ट्र बना रह सकता है? यदि हमें संविधान की रक्षा करनी है और हम अपनी धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक परंपराओं को सहेजना चाहते हैं तो इतिहास की पुस्तकों में इस सच को शामिल करना होगा। हमारी लोक नीतियां भी संविधान के बुनियादी मूल्यों के आधार पर बननी चाहिए। इसका अर्थ है कि ऐसी भयावह स्मृतियों के अवशेषों को हमेशा के लिए दफ्न करना होगा। सौभाग्य से नई दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदलकर अब उसे बेहद सम्मानित पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर कर दिया गया है। औरंगजेब की श्रेणी में आने वाले दूसरे नामों के साथ भी यही सुलूक किया जाए। उनके साम्राज्य से जुड़े कड़वे सच और उनकी कट्टरता के किस्से स्कूली पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनने चाहिए। ऐसा करके ही सुनिश्चित किया जा सकता है कि भारत का भविष्य ऐसी कट्टरता में नहीं, बल्कि वास्तविक लोकतंत्र में निहित है जहां समता एवं समानता का सिद्धांत ही मूलमंत्र है।

भारत को बसेरा बनाने वाले फ्रांसीसी पत्रकार फ्रांसुआ गौशिए और बेल्यिजन विद्वान कोनार्ड एल्स्ट ने भारत की जनता को उस भारी धोखेबाजी को लेकर चेताया है जो वामपंथी सोच वाले नेता, अकादमिक और नौकरशाह आजादी के बाद से ही करते आ रहे हैं। गौशिए अरसे से भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की दुहाई दे रहे हैं। वहीं कोनार्ड एल्स्ट ने खासकर उन मार्क्सवादी इतिहासकारों को निशाना बनाया है, जिन्होंने हिंदू प्रतीकों को मिटाने की मुहिम चलाई और जिन्हें वामपंथी सोच वाले कथित सेक्युलर नेताओं, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का साथ मिला। भारतीय राज्य ने भी इस मुहिम में सहयोग दिया। एल्स्ट का कहना है कि भारतीय अंग्र्रेजीदां अभिजात्य वर्ग के लिए भारतीय सभ्यता को तिलांजलि देना ही फैशन बन गया। गृहमंत्री की बातों का सार भी कुछ यही है।

स्रोत –  नई दुनिया

सोशल मीडिया पर लगाम

फेसबुक सरीखी नामी कंपनी ने डाटा चोरी के मामले में कितनी बार मिथ्या जानकारी देकर लोगों को भरमाने की कोशिश की है।

यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए विभिन्न उच्च न्यायालयों में दायर याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर लिया। अब इन सभी याचिकाओं की सुनवाई वह स्वयं करेगा। इन याचिकाओं के संदर्भ में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि उसकी ओर से अगले तीन माह में सोशल मीडिया संबंधी नियम तैयार कर लिए जाएंगे। इन नियमों के बारे में अभी कुछ कहना कठिन है, लेकिन ऐसे सवाल उठ खड़े होना स्वाभाविक है कि आखिर सरकार को ऐसे कोई नियम क्यों तैयार करने चाहिए? यह अंदेशा भी प्रकट किया जा रहा है कि कहीं नियम बनाकर सरकार सोशल मीडिया की निगरानी तो नहीं करने लगेगी? ऐसे सवाल और संदेह के बीच इस सच की अनदेखी नहीं की जा सकती कि पूरी दुनिया के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग एक गंभीर समस्या बना गया है। यह समस्या इसलिए और विकट हो गई है, क्योंकि सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग रोकने के लिए कोई कारगर व्यवस्था नहीं कर रही हैैं। जब उनसे इसकी अपेक्षा की जाती है तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित करने का शोर मचने लगता है। यह शोर सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सोशल मीडिया के नियमन की कोई जरूरत नहीं। सच तो यह है कि इसकी जरूरत कहीं अधिक बढ़ गई है। इसका कारण यही है कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग सभ्य समाज के समक्ष गंभीर संकट पैदा कर रहा है।

सरकारों के साथ उसकी एजेंसियों के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग रोकना कठिन हो रहा है। सरकारी एजेंसियों की ओर से सोशल मीडिया के बेजा इस्तेमाल को रोकने के जो थोड़े-बहुत उपाय किए गए हैैं वे इसलिए बेअसर साबित हो रहे हैैं, क्योंकि फर्जी एवं अधकचरी खबरों के जरिये दुष्प्रचार अभियान चलाने और सामाजिक ताने-बाने को क्षति पहुंचाने अथवा किसी को बदनाम करने वाला एक संगठित उद्योग खड़ा हो चुका है। यह एक ऐसा उद्योग है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा बन रहा है। आखिर कौन भूल सकता है कैंब्रिज एनालिटिका नामक कंपनी की उस कारस्तानी को जिसने फेसबुक का डाटा चोरी कर कई देशों के चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की थी? ऐसे व्यापक छल-कपट को देखते हुए यह आशा करना व्यर्थ है कि सरकारें सोशल मीडिया का नियमन करने के कोई उपाय न करें। नियमन की जरूरत इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि सोशल मीडिया कंपनियां अपनी जिम्मेदारी समझने के लिए तैयार नहीं। इसकी गिनती करना कठिन है कि फेसबुक सरीखी नामी कंपनी ने डाटा चोरी के मामले में कितनी बार मिथ्या जानकारी देकर लोगों को भरमाने की कोशिश की है।

स्रोत –  नई दुनिया

इतिहास की फिक्र का वक्त

कृष्ण प्रताप सिंह

गत सोलह अक्टूबर को देश के सबसे बड़े न्यायालय ने देश के सबसे संवेदनशील रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की सुनवाई पूरी की तो वह उसके इतिहास की दूसरी सबसे लंबी चलने वाली सुनवाई बन चुकी थी। वह चल रही थी तो न्यायालय ने खुद के मध्यस्थता पैनल के नाकाम रहने के बावजूद पक्षकारों को आपसी सुलह-समझौते के प्रयास जारी रखने की छूट दे रखी थी। अलबत्ता, उनके प्रयासों के लिए सुनवाई रोकना गवारा नहीं किया था।

अब, सुनवाई खत्म हो जाने के बाद भी पक्षों के बीच दावेदारी छोड़ने और सुलह-समझौते के प्रस्तावों को लेकर आ रही खबरें यह जताने के लिए पर्याप्त हैं कि विवाद के ऊंट को इस या उस करवट बैठाने के लिए परदे के आगे-पीछे अभी भी बहुत कुछ चल रहा है। ऐसे में न्यायालय द्वारा सुरक्षित फैसले के, कई लोग जिसके 17 नवम्बर से पूर्व ही सुना दिए जाने की उम्मीद कर रहे हैं, इंतजार में बहुत संयम और समझदारी बरतने की जरूरत है। इसके कारण और भी हैं कि हम, भारत के आम लोग, लंबे अरसे से ऐसी सरकारों के दौर में हैं, जो ऐसे संयमों और समझदारियों पर अपने राजनीतिक फायदों वाली कार्रवाइयों को तरजीह देती हैं। ऐसा नहीं होता तो न अयोध्या का सर्वथा स्थानीय स्तर का यह विवाद समय के साथ विकराल होकर देश और उसकी व्यवस्था के लिए नासूर में बदलता और न उसकी हैसियत इतनी बढ़ती कि वह आधुनिक भारत के इतिहास का एक ऐसा पृष्ठ बन जाए, जो देश के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिंक माहौल के साथ उसकी बुनियादी लिखावट तक को बदल डाले।

अयोध्या का अतीत गवाह है कि वोटों के लिए धार्मिंक और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों में कोई सीमा न मानने वाली राजनीति 1986 में इस विवाद के खात्मे के लिए उसके नागरिकों में हुई सर्वसम्मति के आड़े नहीं आती तो हम इसकी आड़ में ‘‘हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई’ और ‘‘ईर-अल्ला तेरो नाम’ जैसी सदियों के अनुभवों से बनी सामाजिक मान्यताओं को लगातार संकटग्रस्त देखने को अभिशप्त नहीं होते। प्रसंगवश, 1986 में जिला न्यायालय के आदेश पर विवादित ढांचे में लगे ताले खोले जाने के बाद दोनों समुदायों के अयोध्यावासियों ने मिलकर इस विवाद को नासूर बनने से रोकने के लिए उसका ‘‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ वाला समाधान निकाल लिया था, लेकिन तब जिन्हें हिन्दुओं में आई चेतना का अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल करना और उसके बूते देश की सत्ता में आना था, उन्होंने इस समाधान को विफल करने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी। फिर तो आज की तारीख में किसे नहीं मालूम कि धर्मो और सम्प्रदायों का इस्तेमाल करने वाली उनकी राजनीति ने धर्मप्रधान कहे जाने वाले इस देश में कट्टरता के ऐसे बीज बोए कि ‘‘धर्म’ शब्द ही संदिग्ध लगने लगा। इतना ही नहीं, इस बहुधर्मी देश में एक धर्म को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने और बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक जैसे विभाजनों को बढ़ाने वालों के मंसूबे भी फूलने-फलने लगे। धर्म को सबको साथ लेकर चलने का नाम बताने वालों को किनारे लगा दिया गया, सो अलग।

इन हालात में विवाद के न्यायिक फैसले को लेकर उत्सुकता बेहद स्वाभाविक है, लेकिन हमें नागरिकों के तौर पर उसके राजनीतिक और सामाजिक असर को लेकर भी सचेत रहने की जरूरत है। अच्छी बात यह है कि अयोध्या ने इसे लेकर हमेशा ही असीम धैर्य का परिचय दिया है। छह दिसम्बर, 1992 के ध्वंस को ही धर्म बना देने वाली कोशिशों को लेकर भी उसने आपा नहीं ही खोया। इस बार एक अच्छी बात यह भी हुई है कि अयोध्या की पुलिस फैसले के बाद अमन-चैन बनाए रखने को लेकर समय रहते सचेत हो गई है। उसके आला अधिकारी जिले के कस्बों और गांवों में चौपालों और गोष्ठियों में लोगों को समझा रहे हैं कि देश में कोई अदालत सर्वोच्च न्यायालय से बड़ी नहीं है। इसलिए उसका फैसला कुछ भी और किसी के भी पक्ष या विपक्ष में हो, सभी को उसका सम्मान करना है। लगे हाथ वे ये हिदायतें भी दे रहे हैं कि इस सिलसिले में किसी भी शरारत को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

और इस सिलसिले में पुलिस के पास एक बड़ी सुविधा यह है कि जो जमातें कभी यह कहती थीं कि यह कानूनी नहीं, आस्था का विवाद है, और इस कारण अदालतें इसका फैसला ही नहीं कर सकतीं, वे भी आज सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को मानने की बात कह रही हैं। विवाद के पक्षकार तो खैर उसे न्यायालय ले ही इसीलिए गए हैं कि सर्वोच्च अदालत लंबे समय से चले आ रहे इस विवाद का एक बार में ही निपटारा कर दे। कह सकते हैं कि इस विवाद में सिर्फ अयोध्या ही कसौटी पर नहीं है। शेष देश से भी, जो पहले ही ऐसे मामलों के दूध से जला हुआ है, छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीने की अपेक्षा है। इस तय के मद्देनजर और भी कि छह दिसम्बर, 1992 को विवादित स्थल पर खड़े सैकड़ों साल पुराने ऐतिहासिक ढांचे को योजनाबद्ध अभियान चलाकर तोड़ डालने वालों को अभी तक दंड नहीं मिल पाया है। इस ढांचे के ध्वंस के कारण हमारा देश, दुनिया में कितना बदनाम हुआ, पिछड़ा और हमारे समाज के भीतर की दरारें कितनी गहरी हो गई, इसे इस फैसले की घड़ी में भी याद रखा जाना आवश्यक है।

इस कारण और भी कि अयोध्या विवाद पर आने वाले फैसले पर अपने देश की ही नहीं, बल्कि दुनिया भर की नजर भी रहेगी। वह न सिर्फ चुपचाप देखेगी, बल्कि अपने इतिहास में दर्ज करेगी कि भारत के बहुभाषी, बहुधर्मी समाज ने इस फैसले को किस तरह ग्रहण किया। किस तरह अपनी सर्वोच्च अदालत द्वारा दिए गए फैसले को शिरोधार्य किया। सोचिए जरा, कि इसके बावजूद हमने संयम नहीं बरता तो इतिहास में हमें कहां, कितनी और कैसी जगह मिल पाएगी? यकीनन, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की इस घड़ी में हमारे सामने अपने भावी इतिहास की फिक्र करने का वक्त आ खड़ा हुआ है। यह जताने का भी कि तमाम असहमतियों के बावजूद हम अपनी संवैधानिक संस्थाओं और उनके फैसलों का कितना सम्मान करते हैं।

स्रोत –  राष्ट्रीय सहारा

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