29-09-2019 (Newspaper Clippings)

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सोशल मीडिया की फिक्र

सोशल मीडिया के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सरकार को कुछ करना ही होगा कि आखिर वह कोई दिशा-निर्देश लागू क्यों नहीं कर रही है? कहना कठिन है कि भारत सरकार सोशल मीडिया का दुरुपयोग रोकने के लिए क्या और कैसे दिशा-निर्देश तैयार करती है और वे किस हद तक प्रभावी होते है, लेकिन इसमें दोराय नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मनमाना इस्तेमाल हो रहा है। ऐसा केवल भारत में ही नहीं, दुनिया के अन्य देशों में भी हो रहा है। इसी कारण सोशल मीडिया का दुरुपयोग पूरी दुनिया के लिए एक समस्या बन गया है।

सोशल मीडिया का दुरुपयोग केवल ट्र्रोंलग के रूप में ही नहीं हो रहा है। एक बड़ी समस्या यह है कि सोशल मीडिया के माध्यम से वैमनस्य के साथ झूठी खबरें फैलाने का काम भी किया जा रहा है। कई बार तो यह काम सुनियोजित तरीके से किया जाता है और इसी क्रम में जनमत को भी प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। इस सिलसिले में कैंब्रिज एनालिटिका नामक कंपनी पर लगे इस सनसनीखेज आरोप की अनदेखी नहीं की जा सकती कि उसने फेसबुक का डाटा चोरी कर अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने का काम किया।

नि:संदेह उन घटनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती जो वाट्सएप के जरिये फैलाई गई अफवाहों के नतीजे में घटीं। ऐसी कई घटनाएं भारत में भी घटीं। इन घटनाओं के बाद वाट्सएप ने फर्जी खबरों पर लगाम लगाने के कुछ उपाय अवश्य किए, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि सोशल मीडिया के जरिये कि फर्जी खबरें फैलाने का काम बंद हो चुका है। अगर ऐसा नहीं हुआ है तो इसकी एक वजह यह है कि सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्म ट्र्रोंलग और फर्जी खबरों को रोकने के लिए प्रभावी उपाय नहीं कर सके हैैं।

बेहतर हो कि सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफार्म का गलत इस्तेमाल रोकने के लिए सरकारों का सहयोग करें। उनके सहयोग से ही सरकार ऐसे दिशा-निर्देश बना सकती है जो सोशल मीडिया के दुरुपयोग रोकने में प्रभावी सिद्ध हों। ऐसे दिशा-निर्देश चाहे जब बनें, यह आवश्यक है कि सोशल मीडिया में सक्रिय लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की महत्ता और साथ ही उसकी गरिमा को भी समझें।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह मतलब नहीं हो सकता कि जिसके मन में जो आए वह कहे। यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ नहीं किया जाएगा तो उपयोगी माना जाने वाला सोशल मीडिया बदनामी का शिकार होकर अपनी महत्ता खो सकता है। ऐसा न हो, इसके लिए सभी को सजग-सक्रिय होकर इसके लिए अतिरिक्त कोशिश करनी चाहिए कि सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म संवाद का उपयोगी मंच बनें।


निजी रेल का मुश्किल सफर

भारतीय रेल यात्रियों को जल्द ही निजी रेल की यात्रा करने का अवसर मिल सकता है। इस संभावना ने इस क्षेत्र पर नजर रखने वाले अनेक पर्यवेक्षकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। खबरों के मुताबिक भारतीय रेल, ट्रेनों के परिचालन के लिए निजी-सार्वजनिक भागीदारी का खाका तैयार कर चुका है और अगले वर्ष के आरंभ में संभावित मार्गों की बोली प्रक्रिया आरंभ हो जाएगी। यह समय सीमा उचित प्रतीत होती है क्योंकि माल ढुलाई कॉरिडोर अगले दो वर्ष में शुरू हो जाएंगे। इससे दिल्ली, कोलकाता और मुंबई के बीच मौजूदा मिश्रित उपयोग वाले कॉरिडार की क्षमता काफी हद तक मुक्त हो जाएगी। अगले तीन से चार साल में ऐसे नए मार्गों पर भी अनुमति दी जा सकती है जहां ट्रेनों की अधिकतम गति 160 किलोमीटर प्रति घंटे तक होगी। रेलवे को उम्मीद है कि करीब 150 मार्ग निजी सेवा प्रदाताओं को दिए जा सकते हैं जो अपने कोच-इंजन और चालकों के साथ सेवा शुरू करेंगे। इन्हें रेलवे द्वारा प्रमाणित किया जाएगा। यदि सबकुछ योजना के मुताबिक चला और विदेशी निवेशक मसलन यूरोप की बड़ी रेल कंपनियां इसमें रुचि दिखाती हैं तो रेलवे को इससे ढेर सारे संसाधन हासिल होंगे।

इसकी प्रेरणा तो समझी जा सकती है लेकिन यह विचार आप में गलत है। इस विषय पर ढेरों सवाल खड़े हो सकते हैं और कुछ सवाल तो ऐसे हैं जो इस पूरी योजना को ही खारिज करने की स्थिति तैयार कर सकते हैं। उदाहरण के लिए निजी क्षेत्र को परिचालन के लिए कौन से मार्ग और कौन सा समय आवंटित किया जाएगा? अगर सबसे लाभकारी मार्ग और समय दिए जाएंगे तो क्या इसका सीधा असर रेलवे के संसाधनों पर नहीं पड़ेगा? दूसरा, क्या कंपनियों को मूल्य तय करने का अधिकार भी होगा? एक स्वतंत्र नियामक गठित करने का वादा किया गया है लेकिन किराये की सीमा तय करने की भी चर्चा है। अगर संबंधित अनुबंध लंबी अवधि के लिए किए गए तो यकीनन मूल्य तय करने का अधिकार निजी परिचालकों को होगा, वरना उनका जोखिम बहुत अधिक बढ़ जाएगा जो स्वीकार्य नहीं होगा। स्वतंत्र नियामक ही विवाद भी हल करेगा। परंतु हमारे देश में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के विवाद अंतहीन होते हैं। इन्हें हल करना बहुत मुश्किल होता है। इस मामले में शायद हर मिनट विवाद खड़ा हो क्योंकि रेलें स्टेशन पर जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी या भीड़ वाले मार्ग में पहुंच को लेकर प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होगी। किसी भीड़ भरे स्टेशन के बाहर किसे प्राथमिकता मिलेगी भारतीय रेल की उपनगरीय टे्रन को या निजी परिचालक की ट्रेन को? यदि भारतीय रेल अपनी ट्रेन के पक्ष में निर्णय करती है तो क्या इस निर्णय के खिलाफ अपील हो सकती है, और अपील का बिंदु क्या होगा क्योंकि यह मुद्दा तो मिनटों में निपटाना होगा। इस परिदृश्य में कुछ ही निवेशक रुचि दिखाएंगे।

अगर निजी परिचालकों को ध्यान में रखना है तो भारतीय रेल और रेलवे बोर्ड में भी सुधार जरूरी हैं। संभवत: इन्हें अलग भी करना होगा। यदि नेटवर्क की मालिक भी बतौर सेवा प्रदाता निजी परिचालकों के साथ प्रतिस्पर्धा करेगी तो विवाद और भ्रष्टाचार के अंतहीन अवसर उत्पन्न होंगे। तार्किक ढंग से देखा जाए तो निजी क्षेत्र की रेल और सरकारी नेटवर्क को एक दूसरे से पूरी तरह अलग करना होगा। परंतु तब ब्रिटेन की तरह नेटवर्क में निवेश की कमी की समस्या उत्पन्न हो सकती है। निजी ट्रेन का विचार अच्छा लग सकता है लेकिन रेलवे में आमूलचूल सुधार का कोई विकल्प नहीं है। इसकी शुरुआत विभिन्न विभागों के बीच की दीवार खत्म कर कॉर्पोरेट शैली में एकीकृत ढांचा तैयार करके करनी होगी।


आर्थिक मोर्चे पर क्या कुछ किए जाने की है जरूरत?

टीसीए श्रीनिवासराघवन

बीते करीब दो महीनों से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को कठोर आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़े सार्वजनिक होने के बाद इनकी प्रकृति भी और अधिक क्रूर हो गई है। यह उनकी गलती नहीं थी। उन्होंने जो बजट प्रस्तुत किया था वह उन्हें तैयार करके दिया गया था। बजट की गलतियों के लिए व्यापक तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय में पदस्थ वित्त सचिव और संयुक्त सचिव जवाबदेह थे। अब दोनों ही पद पर नहीं हैं। वित्त सचिव ने तो विरोध स्वरूप अपना पद छोड़ा।

बीते एक महीने में वित्त मंत्रालय को संसाधनों की काफी कमी का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद वह अपने स्तर पर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का प्रयास कर रहा है। मंत्रालय अव्यवहार्य होने पर भी विभिन्न प्रकार की रियायतों की घोषणा करता रहा। हाल ही में कॉर्पोरेट कर में जो कटौती की गई है वह अपने आप में बहुत बहादुरी भरा कदम है क्योंकि इससे राजकोष को करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान सहन करना होगा। चूंकि इसका अप्रत्यक्ष कर राजस्व पर सीधा असर होगा, ऐसे में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3 फीसदी तक सीमित रखने की बात अब इतिहास की बात हो चुकी है।

सवाल यह है कि अब इसके आगे क्या? नकदी डालने के निष्प्रभावी कदम और जरूरी कर सुधारों (जिसे अब अंजाम दिया जा चुका है) के अलावा सरकार को क्या कुछ करने की आवश्यकता है? अर्थव्यवस्था दोबारा पटरी पर कैसे आ सकती है? इसका जवाब पांच बातों में निहित है।

पहली बात, मोदी को यह स्वीकार करना होगा कि वह गलत थे। उन्हें वित्त मंत्रालय को यह निर्देश देना होगा कि 90 फीसदी वस्तुओं को शून्य दर के दायरे में लाए। इसी प्रकार 5 फीसदी से ऊपर की तमाम दरों को 18 फीसदी की एकल दर में समाहित कर दिया जाना चाहिए।

दूसरी बात, व्यक्तिगत आय कर की दरों को भी अगले बजट में 20 और 30 फीसदी के दो स्लैब में सीमित कर दिया जाना चाहिए। इसके अलावा कर लगाने की सीमा को बढ़ाकर 18 लाख कर दिया जाना चाहिए। यानी अगर कोई व्यक्ति मासिक 1.5 लाख रुपये या इससे कम कमाता है तो उस पर कोई कर नहीं लगाना चाहिए। यह काफी अधिक लग सकता है लेकिन मध्यवर्गीय व्यक्ति को जिस तरह के खर्च का सामना करना पड़ता है, उसे देखते हुए इतनी रियायत बहुत ज्यादा नहीं है। मैंने कुछ सप्ताह पहले इस बारे में लिखा भी था। इसके लिए काफी हद तक शहरी क्षेत्रों में परिवार की बदलती स्थिति से भी है।

तीसरी बात है परिसंपत्ति के निस्तारण की। एकमात्र परिसंपत्ति जिसे बिना मजदूर संगठनों और सुरक्षा के मसलों के बिना बेचा जा सकता है, वह है जमीन। सरकार को इस प्रक्रिया की शुरुआत अपने सामाजिक कार्यक्रमों के वित्त पोषण के लिए करनी चाहिए। तब कोई शिकायत नहीं करेगा।

चौथा, राजस्व में अस्थायी रूप से आने वाली कमी की फंडिंग का भी सवाल है। मैं बीते एक वर्ष से अधिक समय से इस विषय पर लिख रहा हूं कि अब वक्त आ गया है कि तदर्थ बिलों को एक बदले हुए स्वरूप में नया जीवन प्रदान किया जाए। ऐसा करना नई नकदी छापने के समान ही है और यह एक बड़ा संसाधन होगा।

यहां मुद्दा यह है कि महज इसलिए क्योंकि राजीव गांधी ने सन 1986 से 1989 तक राजीव गांधी ने इन्हें प्रमुखता दी और सन 1990 में हमें इनका खमियाजा उठाना पड़ा तो इसका यह मतलब नहीं है कि ये एकदम बेकार ही हैं। सच्चाई तो यही है कि इन्होंने हमारी एक अहम जरूरत को पूरा किया। अब जरूरत यह है कि इनकी मौजूदा सीमा को बढ़ाया जाए। 100,000 करोड़ रुपये की मौजूदा सीमा बहुत कम है। इसका निर्धारण भी दो दशक पहले किया गया था।

पांचवीं और सबसे अहम बात यह है कि इस अवधारणा को त्यागना होगा कि सरकार व्यय चाहती है और इसे हासिल करने के लिए राजस्व में इजाफा करना जरूरी है। कर और व्यय हमेशा व्यय और कर के समान नहीं होते। ऐसे में एक ओर जहां आम जनता की मांग यही है कि सरकार को व्यय में इजाफा करना चाहिए, वहीं जरूरत इस बात की है कि व्यय पर भारी अंकुश लगाया जाए। निजी तौर पर मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी में यह करने की पूरी क्षमता है। आगामी पांच वर्ष में 15 फीसदी की कटौती से काम हो जाएगा। इससे पहले सन 1967, 1974, 1981 और 1991 में ऐसा किया जा चुका है।

सन 2014 में मोदी के सत्ता में आने के तत्काल बाद ही विमल जालान समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने कई उपयोगी विचार प्रस्तुत किए। लब्बोलुआब यह है कि व्यय में बदलाव लाया जाए और ऐसे सेवानिवृत्त लोगों को भुगतान बंद किया जाए जिनके पास पेंशन के अलावा आय के अन्य स्रोत हैं। प्रधानमंत्री ने सन 2014 में अपने कार्यकाल की शुरुआत संकट के दौर से की थी और वर्ष 2019 में एक बार फिर ऐसा ही हुआ। पहले अवसर पर वह इससे निजात पाने में कामयाब रहे थे। उन्हें लगा कि अकेले सेवा आपूर्ति का सुधार पर्याप्त रहेगा। यह नरसिंह राव-मनमोहन सिंह के सुधारों के उलट था जो मानते थे कि वृहद आर्थिक सुधार ही पर्याप्त हैं। मोदी की खुशकिस्मती है कि उनके पास एक बार फिर यह सुनहरा अवसर है कि वह एक बड़े सुधारक केे रूप में सामने आएं। उनके पास साढ़े चार वर्ष का समय है। देखना होगा कि वह इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं।


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