28-10-2019 (Newspaper Clippings)

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सबकी अच्छी सेहत का लोक वित्त से वास्ता

यदिकॉमन गुड्स फॉर हेल्थकी अवधारणा पर गंभीरतापूर्वक आगे बढ़ा जाए तो इसका राजकोषीय मोर्चे पर यकीनन सकारात्मक असर देखने को मिलेगा।

अजय शाह

स्वास्थ्य नीति को लेकर पुरातन विचार बचाव और उपचार के बीच का तनाव है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि ‘कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ’ की दिशा में और अधिक कदम उठाए जाएं। यानी जनसंख्या के आकार के मुताबिक हस्तक्षेप किए जाएं जिससे बीमारियों का बोझ कम हो। यह सर्वव्यापी बीमारियों तथा हवा की गुणवत्ता के नए खतरों के रूप में हमारे सामने है। देश में पारंपरिक जन स्वास्थ्य के अधूरे एजेंडे में भी इसे महसूस किया जा सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले व्यय के कारण सरकार के बढ़ते राजकोषीय खर्च को देखते हुए अब यह आवश्यकता आन पड़ी है कि इन व्यापक जन समुदाय से जुड़े हस्तक्षेपों को देखते हुए व्यापक राजकोषीय प्रोत्साहन दिया जाए।

स्वास्थ्य नीति के मूल में बचाव बनाम स्वास्थ्य की बहस है। एक ओर जहां स्वास्थ्य सेवा से जुड़ा समुदाय लोगों के उपचार पर केंद्रित रहता है, वहीं ऐसी तमाम वजह हैं जो उपचार के बजाय बचाव को केंद्र में रखती हैं। आम व्यक्ति की दृष्टि से देखा जाए तो बेहतर यही माना जाता है कि बीमार पड़ा ही न जाए। हाल के वर्षों में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ’ नामक परियोजना शुरू की जिसका लक्ष्य है आबादी आधारित जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में बुनियादी तौर पर नई ऊर्जा का संचार करना। सार्वजनिक आर्थिकी की तकनीकी भाषा में यह सार्वजनिक बेहतरी के क्षेत्र में बाजार की तथा अन्य बाह्य विफलताओं को कवर करता है। ‘कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ’ एक अच्छा कथन है जिसे आसानी से समझा जा सकता है और यह जन स्वास्थ्य से जुड़े लगभग सार्वभौमिकता के भ्रम को समाप्त करता है।

इबोला जैसी वैश्विक महामारियों, देश में हवा की खराब गुणवत्ता अथवा जलवायु परिवर्तन के कारण पर्यावरण में आ रही गिरावट के दुष्परिणामों पर विचार कीजिए। ये सभी अपने आप में बेहद बड़ी समस्याओं में शामिल हैं। ये लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाली हैं। अगर हम केवल स्वास्थ्य सेवाओं पर केंद्रित रहे तो यह प्रतिक्रिया अपर्याप्त मानी जाएगी। हम इबोला जैसी महामारी या उत्तर भारत में हवा की खराब गुणवत्ता के शिकार लोगों को केवल इलाज करके ठीक नहीं कर सकते बल्कि हमें आगे बढ़कर इन समस्याओं की जड़ पर प्रहार करना होगा।

इसके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य की बुनियाद मजबूत करनी होगी। उदाहरण के लिए वैश्विक महामारियों से सबसे अच्छा बचाव यह है कि संचारी रोगों से निपटने के लिए जन स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा मजबूत हो। इसमें बीमारियों की निगरानी की व्यवस्था, आपातकालीन प्रतिक्रिया, टीकाकरण आदि शामिल हैं। दुनिया भर में राजनीतिक और शासन तंत्र आपात परिस्थितियों को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में इन बुनियादों की अनदेखी की जाती है। चिकित्सक, राजनेता और पीडि़तों को स्वास्थ्य सेवाओं का मोल नजर आता है जबकि नजर न आने वाले जन स्वास्थ्य के काम सामने नहीं दिखते जिनमें लोगों के बीमार न पडऩे पर जोर दिया जाता है।

भारत में अभी जन स्वास्थ्य के पुराने एजेंडे पर काफी कुछ किया जाना शेष है। इसमें जल और स्वच्छता, संचारी रोगों की निगरानी और महामारियों अथवा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की संस्थागत क्षमता विकसित करना जरूरी है। आज जो परिस्थितियां मौजूद हैं उन पर नए सिरे से दृष्टि डालें तो वायु गुणवत्ता, सड़क सुरक्षा, औषधि सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जल प्रदूषण और जीवाणु प्रतिरोध के रूप में इसमें नए तत्त्व शामिल हो रहे हैं।

कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ और सार्वजनिक वित्त के बीच रोचक संबंध है। सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार से लोगों के बीमार होने में कमी आएगी। इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला व्यय कम होगा और साथ ही सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर पडऩे वाला राजकोषीय दबाव भी सीमित होगा। इससे दुनिया भर की सरकारों द्वारा इसे दी जा रही तवज्जो का औचित्य समझ में आता है। ये सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत अधिक धन व्यय कर रही हैं। सरकार किसी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता को धन दे या बीमा कंपनी को दे लेकिन आखिरकार इस भुगतान का संबंध स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा रहता है। ऐसे में कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ के लिए काम करना इन सेवाओं के लिए वित्तीय सुविधा को मजबूत करने और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की व्यवहार्यता के लिए बुनियाद के पत्थर का काम करेगा।

भारत की बात करें तो देश में सरकार समर्थित कई बीमा योजनाओं के आगमन के बाद सरकार के स्वास्थ्य सेवा खर्च में काफी बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में इस तरह का रुख अपनाकर इस व्यय तथा राजकोषीय जोखिम को कम किया जा सकता है। उक्त एजेंडा कई मंत्रालयों के और एजेंसियों के बीच विस्तारित है। उदाहरण के लिए हवा की गुणवत्ता या सड़क सुरक्षा जैसी समस्याओं का स्वास्थ्य सेवा व्यय पर काफी अधिक असर पड़ता है। जबकि ये समस्याएं स्वास्थ्य मंत्रालय के दायरे में नहीं आतीं। ऐसे में एक समन्वय प्रणाली की आवश्यकता है ताकि इनसे जुड़ी तमाम जवाबदेहियों का मिलजुलकर निर्वहन किया जा सके। यह काफी हद वैसा ही है जैसे बड़ी आपदाओं से निपटा जाता है।

मान लेते हैं कि हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां स्वास्थ्य सेवाएं एकदम दुरुस्त तरीके से काम करती हैं। वहां भी उक्त रुख की आवश्यकता है क्योंकि लोग अगर बीमार ही न पड़ें तो यह उनके लिए अधिक बेहतर है। हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में तमाम चुनौतियां हैं। इसके चलते यहां कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ की जरूरत भी अधिक है। कोई व्यक्ति खराब चिकित्सा प्रणाली में जाए, उससे बेहतर है कि वह बीमार ही नहीं पड़े। अगर लोग बीमार नहीं पड़ेंगे तो सरकार पर पडऩे वाला वित्तीय बोझ भी पहले की तुलना में काफी कम होगा।

वैश्विक स्वास्थ्य नीति की बात की जाए तो अल्पावधि में इसमें कोई बदलाव आता नहीं दिखता। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ‘कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ’ परियोजना की बात करें तो यह यह सही दिशा में उठाया गया कदम है। माना जा सकता है कि यह विश्व व्यापी स्तर पर स्वास्थ्य नीतियों में बदलाव लाने वाला साबित होगा। भारत जैसे देश में जहां पारंपरिक जन स्वास्थ्य एजेंडे पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है और जहां बीमारियों का बोझ बहुत अधिक है, वहां यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

स्रोत –  बिजनेस स्टैंडर्ड

समाज को संयत होकर सच का सामना करना होगा

कुछ अन्तर्जात सत्य को छोड़कर, जैसे शांति व प्रेम का संचरण और क्रोध व घृणा का परित्याग, सभी अन्य सत्य दिक्-काल सापेक्ष होते हैं। सत्य को देखने के अनेक दृष्टिकोण होते हैं और हर कोण से और हर काल में यह सत्य बदला नज़र आता है इसीलिए जरूरत होती है निष्पक्ष अदालतों की और उनके माध्यम से निरपेक्ष सत्य को जानने की। लेकिन चूंकि अदालतें भी मानव-संचालित हैं लिहाजा अक्सर उनका सत्य भी नीचे से ऊपर अदालत-दर-अदालत और बेंच-दर-बेंच बदलता रहता है। फिर भी समाज से अपेक्षित होता है कि अंतिम तौर पर अदालत के फैसले को ही सत्य माने भले ही वह आपके सत्य से इतर हो। अयोध्या विवाद पर आज 135 साल बाद भी अंतिम फैसला नहीं आ सका है। 1886 में फैजाबाद के जिला जज एफईए शैमियर ने फैसले में लिखा था, ‘हिन्दु जिसे अपना पवित्र स्थल मानते हैं उस पर मस्जिद की इमारत बेहद अफसोस की बात है लेकिन, चूंकि इस घटना को 358 साल हो चुके हैं, इसे अब बदला नहीं जा सकता। उस फैसले के बाद आज तक दोनों पक्ष, हिन्दू और मुसलमान अंतिम फैसले के अभाव में लड़ते रहे और अंत में इमारत भी ढहा दी गई। अब जब फैसला कुछ ही दिनों में सामने होगा यह दायित्व होगा सभी पक्षों का और लोगों का कि इसे ईश्वरीय वचन जैसा सम्मान देते हुए शिरोधार्य करें। अगर कोई एक पक्ष जरूरत से ज्यादा खुशी का इजहार करता है तो वह दूसरे पक्ष की ‘हार में घी’ डालने का काम करेगा जो समाज में शांति के अंतर्जात सत्य के खिलाफ होगा। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रजातंत्र में सत्य जानने का अन्य कोई भी माध्यम नहीं है, संसद भी नहीं, क्योंकि केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की बेंच ने संसद की भी सीमा तय की है इस आधारभूत संरचना के सिद्धांत के तहत। कोई भी संसद मात्र बहुमत के सहारे कोई भी कानून बना दे यह धर्मनिरपेक्षता के आधारभूत सिद्धांत के खिलाफ होगा। लिहाजा आज के दौर में एक सभ्य समाज से अपेक्षा होती है कि फैसला आने के बाद दोनों में से भले ही किसी एक पक्ष की जीत हो और दूसरे की हार, लेकिन खुशी और गम के अतिरेक में वह कानूनेतर कदम न उठाए। अगर भारत की संस्कृति और हिन्दू धर्म संयम और वसुधैवकुटुम्बकम के लिए जाने जाते हैं और इस्लाम के मायने ही शांति है तो उनके अनुयायियों की प्रतिबद्धता की परीक्षा भी इसी फैसले के बाद होनी है।

स्रोत –  दैनिक भास्कर

आर्थिक महाशक्ति बनने की बातें बंद करें

जब तक करदाताओं की तुलना में गरीब मतदाता ज्यादा होंगे, तब तक वे ही आर्थिक नीतियों के केंद्र में होने चाहिए

शशि थरूर , पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार ने नीतियों में पलटकर उलटी दिशा में जाने के कई मामलों में उल्लेखनीय है आर्थिक नीति में बदलाव। भाजपा ने 2014 के चुनाव प्रचार में दक्षिण पंथी नीतियों का राग अलापा था, जिसमें ‘लोककल्याणवाद’ की आलोचना की गई। कुछ टिप्पणीकारों ने इसे तो इसे कांग्रेस का ‘गरीबीवाद’ कहा था। तब की नीतियों को गरीबी बढ़ाने वाला बताकर उसकी आलोचना की गई। फिर मोदी खुद महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम (मनरेगा) का तिरस्कार करते थे। वहां से शुरू होकर अब हम ऐसे बिंदु पर पहुंचे हैं जहां मोदी सरकार की आर्थिक ‘उपलब्धियां’ सिर्फ गरीबों के लिए टॉयलेट बनाना, ग्रामीण महिलाओं के लिए गैस सिलेंडर उपलब्ध कराना और उसी मनरेगा के लिए आवंटित राशि बढ़ाना है। जाहिर है आ र्थिक नीति दिशा बदलकर फिर वहीं पहुंच गई है। मुझे इस पर आश्चर्य क्यों नहीं है? कारण सरल-सा है और यह मोदी से भी आगे जाता है फिर चाहे कभी-कभी उन्हें सुनकर ऐसा लगता है जैसे वे मानते हों कि भारतीय आर्थिक विकास का इतिहास उनसे ही शुरू होता है। यह कारण हमारी अर्थव्यवस्था के चरित्र में है, जो इतिहास से उपजा है।

भारत का आर्थिक विकास अनूठा है, क्योंकि हम महत्वपूर्ण आकार की एकमात्र ऐसी अर्थव्यवस्था हैं, जो लोकतंत्र के रूप में एकदम धरातल से विकसित हुई है। लगभग न कुछ से हमने शुरुआत की। हम 1700 में दुनिया में सबसे धनी देश थे, जब वैश्विक जीडीपी में भारत का योगदान 27 फीसदी था। लेकिन जब अंग्रेज 1947 में भारत से गए तो उन्होंने वैश्विक जीडीपी में सिर्फ 3 फीसदी योगदान के साथ हमें तीसरी दुनिया की गरीबी का ‘पोस्टर चाइल्ड’ बनाकर रख दिया था। तब साक्षरता दर मात्र 16 फीसदी (महिलाओं के लिए 8.8 फीसदी), औसत अपेक्षित आयु दयनीय रूप से 27 वर्ष थी और 90 फीसदी आबादी ऐसी दारुण स्थितियों में रहती थी, जिसे हम आज गरीबी रेखा कहेंगे। ऐसी भीषण स्थिति से हमारी अर्थव्यवस्था को विकसित करना ही कोई साधारण काम नहीं था लेकिन, लोकतंत्र के रूप में इसे कर दिखाना तो अद्वितीय यानी असाधारण काम था। जब दारुण गरीबी को देखते हुए तेजी से फैसले लेने की जररूत थी, तब हमने अपेक्षाकृत धीमी निर्णय प्रक्रिया वाली लोकतांत्रिक पद्धति अपनाकर आर्थिक बदलाव लाकर दिखाया। यह अनूठी बात थी।

जब किसी लोकतंत्र में आर्थिक नीति के विकल्प चुने जाते हैं, तो यह याद रखा जाना चाहिए कि उसमें मतदाताओं के हितों का प्रभुत्व होना चाहिए और भारत में हम यह ऐसे लोकतंत्र में करते हैं, जिसमें बहुसंख्यक मतदाता गरीब हैं। आज भी हर लोकसभा सांसद ऐसे मतदाता वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें अधिकांश मतदाता विश्व बैंक की 2 डॉलर (140 रुपए) प्रतिदिन की गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। जाहिर है हमारी आर्थिक नीतियां उनके अनुकूल और गरीबों का दर्जा बढ़ाने की दिशा में होनी चाहिए।

ज्यादातर अन्य लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं ने पहले विकास किया और फिर लोकतंत्र अपनाया। औद्योगिक क्रांति के दौरान जब ज्यादातर पश्चिमी लोकतंत्रों ने फूलना-फलना शुरू किया तो मतदान का सार्वभौमिक अधिकार नहीं था। पहले विश्वयुद्ध के बाद तक पश्चिमी देशों ने महिलाओं को मतदान का अधिकार नहीं दिया। अमेरिका में अश्वेतों और ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के काफी बाद में जब वे विकसित देश के दर्जे पर पहुंच गए तब गरीबों को मतदान का अधिकार दिया गया। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 20वीं सदी के पूर्वार्ध के अन्य औद्योगिक दिग्गज जैसे जर्मनी और जापान जब विकसित हो रहे थे तो वहां लोकतंत्र नहीं था। साफ है कि तीव्र आर्थिक प्रगति और समृद्धि हासिल करने के लिए उन्हें लोकतांत्रिक पद्धति ठीक नहीं लगी और उन्होंने पहले समृद्धि हासिल की, उसके बाद लोकतंत्र को पूरी तरह अपनाया।

ज्यादातर लोकतंत्रों में आर्थिक नीतियां करदाताओं की इच्छाओं से संचालित होती हैं और उनका पैसा कैसे खर्च किया जाए इसमें वे अपनी बात मनवाना चाहते हैं। वैसे भी उन देशों में ज्यादातर मतदाता करदाता होते हैं। हालांकि, भारत में आर्थिक नीतियां मोटेतौर पर करदाता की बजाय गरीबों के हितों के हिसाब से तय होता हैं, क्योंकि करदाता तुलनात्मक रूप से थोड़े (कुल मतदाताओं के 5 फीसदी से कम) ही होते हैं और कर न देने वाले लोगों के पास अधिक वोट होते हैं। लोकतंत्र में राजनेता की जवाबदेही अपरिहार्य रूप से अल्पसंख्यक करदाताओं की बजाय बहुसंख्यक मतदाताओं के प्रति होती है। इस तरह यह फिर भारतीय आर्थिक नीति निर्धारण का विशिष्ट चरित्र है। इसीलिए मोदी को अपनी आर्थिक नीतियां बदलनी पड़ी। उनके नारे और वाक्पटुता देश को कहीं नहीं ले जा रहे हैं। यदि आपको चुनाव जीतना है तो आपकी प्राथमिकता में गरीब होना ही चाहिए।

बेशक, जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था बढ़ेगी और करदाताओं का आधार विस्तार पाएगा, यह स्थिति बदलेगी। भारत के समृद्ध हिस्सों में करदाता आर्थिक नीति निर्धारण पर अधिक प्रभाव डालने में सक्षम होंगे, क्योंकि चुनाव की दृष्टि से उनकी संख्या का महत्व बढ़ जाएगा। लेकिन, वह बहुत लंबे समय की बात है। आज तो आर्थिक महाशक्ति बनने की सारी बातें बंद कर देनी चाहिए। हम अब भी महा-गरीब हैं और यदि हमारी सरकारों को बने रहना है और फिर निर्वाचित होना है तो बेहतर होगा कि वे इस बात को समझें।

स्रोत –  दैनिक भास्कर

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