27-09-2019 (Newspaper Clippings)

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तालिबान की हिंसा

अफगानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, तालिबान की हिंसा का ग्राफ भी उतनी ही रफ्तार से बढ़ रहा है। पिछले कई दिनों से शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरा हो जब आत्मघाती हमलों से अफगानिस्तान के शहर दहल नहीं रहे हों। अस्पताल, सरकारी इमारतें, पुलिस और सुरक्षा बलों के ठिकाने, यहां तक कि अमेरिकी दूतावास तक पर तालिबान के हमले यह संदेश दे रहे हैं कि इस देश की सत्ता पर फिर से कब्जे के लिए वह पूरी ताकत के साथ लड़ेगा। दूसरी ओर तालिबान को सबक सिखाने के लिए अमेरिकी सेना के हमले भी जारी हैं। दो दिन पहले एक अमेरिकी ड्रोन के हमले में बीस से ज्यादा बेगुनाह मारे गए। अमेरिका और तालिबान को इस बात से तनिक चिंता नहीं है कि इन दोनों के झगड़े में निर्दोष अफगान जनता बुरी तरह पिस रही है।

हाल में अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता टूटने के बाद तो हालात बेकाबू हो गए हैं। तालिबान ने और ज्यादा उग्र रूप धारण कर लिया है। ऐसे में सवाल है कि इस हिंसा के बीच अगले हफ्ते राष्ट्रपति चुनाव कैसे होंगे। अफगानिस्तान के हालात पर चिंता जाहिर करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा है कि सभी अफगान नागरिकों को ‘भय और हिंसा मुक्त’ जीवन जीने का अधिकार है। लेकिन यह कैसे सुनिश्चित हो, इसके उपाय इस वैश्विक निकाय के पास भी नहीं हैं।

अफगानिस्तान में इस वक्त हिंसा का जो दौर चल रहा है उसने पूरे देश को फिर उसी स्थिति में ला खड़ा किया है जो दो दशक पहले बनी हुई थी। इन हालात के लिए क्या तालिबान दोषी है या फिर अमेरिका या अफगानिस्तान की मौजूदासरकार, यह सवाल फिलहाल दब-सा गया है। अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शांति वार्ता तोड़ने जैसा कठोर कदम नहीं उठाते तो शायद आज हालात इतने नहीं बिगड़ते। लेकिन एक अमेरिकी सैनिक की मौत के मामले पर अमेरिका ने पूरे अफगानिस्तान को हिंसा की आग में झोंक डाला।

हालांकि पिछले साल अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने तालिबान को एक राजनीतिक पार्टी की मान्यता देते हुए जेल में बंद उसके लड़ाकों को रिहा करने का बड़ा फैसला लिया था। तालिबान के साथ शांति वार्ता की दिशा में यह बड़ा कदम था। इस बीच कतर में शांति वार्ता के दौर तो चलते रहे लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला था। बाद में मास्को में हुई शांति वार्ता में अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई भी शामिल हुए, लेकिन तब इसमें अफगान सरकार को शामिल नहीं किया गया। तालिबान की शर्त थी कि चुनाव रद्द होने पर ही वह अमेरिका के साथ समझौता करेगा। इस तरह वार्ता राजनीति और अहम की लड़ाई में उलझती रही। तालिबान का अड़ियल रवैया भी इसका एक बड़ा कारण रहा, जिसकी कीमत आज अफगानिस्तान युद्ध के मैदान के रूप में चुका रहा है।

इस वक्त सबसे बड़ी प्राथमिकता अफगान नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होनी चाहिए। यह काम अफगानिस्तान की सरकार, तालिबान और अमेरिका को ही करना है। इसके लिए जरूरी है कि तीनों अपना हठ छोड़ें और खासतौर से अमेरिका अफगानिस्तान में अपने हितों को छोड़े। शांति वार्ता रद्द होने से अफगानिस्तान की सरकार खुश है। दूसरी ओर तालिबान अब अमेरिका को सबक सिखाने पर तुला है। इसीलिए उसने शांति वार्ता टूटने के बाद और ज्यादा अमेरिकियों पर हमले की धमकी दी है। जाहिर है, आने वाले दिन अफगानिस्तान के लिए और संकट भरे होंगे।

हाउडी मोदीविश्व में भारत के लिए गौरव का नया आयाम

किसी घटना के विश्लेषण में तथ्यों को व्यापकता में न देखना अंतिम परिणाम को दुराग्रह से आच्छादित कर देता है। लिहाज़ा यह मानना कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने देश में टेक्सास राज्य के ह्यूस्टन शहर में किसी भारतीय प्रधानमंत्री के लिए आयोजित ‘मेगा शो’ में सिर्फ इसलिए पहुंचे कि देश में रह रहे 50,000 भारतीय-अमेरिकी नागरिकों का वोट मिल जाएगा, अधूरा विश्लेषण माना जा सकता है। ये भारतीय कल ही अमेरिका के मतदाता नहीं बने हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के पहुंचने के कारणों को तभी समझा जा सकता है जब हम मोदी की विश्व-पटल पर स्वीकार्यता समझ सकेंगे। मोदी आज दुनिया में सामूहिक सकारात्मक सक्रियता के मसीहा माने जा रहे हैं। इस पर विवाद हो सकता है कि इसके नकारात्मक पहलू मॉब लिंचिंग को कैसे लिया जाए, लेकिन देश में एक उत्साह है और विदेश में रह रहे भारतीय भी उससे पूरी तरह प्रभावित हैं। लिहाज़ा ट्रंप को अमेरिकी लोगों के वोट इस बात पर भी मिलेंगे कि वह और मोदी समान सोच और एक्शन को प्रतिबिंबित करते हैं। दरअसल मोदी ने अपने भाषण में अमेरिका के 9/11 और मुंबई के 26/11 को जोड़ कर यह संदेश दिया कि हम दोनों नेता एक साथ आतंकवाद ख़त्म कर सकते हैं। अमेरिका भी भारत की तरह आर्थिक संकट से जूझ रहा है, लेकिन मोदी की कविता ‘वो जो मुश्किलों का अम्बार है, वही तो मेरे हौसलों की मीनार है’, 34 करोड़ अमेरिकी लोगों और 15.40 करोड़ मतदाताओं को आश्वासन था कि दोनों देश हालात को बदलने में सक्षम हैं। अमेरिकी अख़बारों ने और टीवी चैनलों ने इसे अप्रतिम कवरेज इसलिए नहीं दिया कि महज 50,000 मतदाता ट्रम्प को जिताने में सक्षम हैं, बल्कि मोदी का ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ का जिक्र करना समूचे अमेरिकी मतदाताओं के लिए एक संदेश था। शायद विश्व में यह पहली घटना है कि भारत का कोई नेता इस काबिल समझा गया कि वह अमेरिका सरीखे देश का चुनाव प्रभावित कर सकता है, न केवल 50,000 भारतीयों के बूते पर बल्कि वहां की मूल जनता पर भी अपने प्रति सकारात्मक स्वीकार्यता के साथ। कहना न होगा कि ‘कटोरा लेकर पी-एल 480 के समझौते’ और ‘एक भारतीय प्रधानमंत्री के 45 मिनट अमेरिकी राष्ट्रपति के ऑफिस के बाहर मुलाकात के लिए इंतज़ार’ से आज हम काफी दूर आ गए हैं और यह किसी एक विकासशील देश के इतिहास का नया मोड़ है।


शौचालय निर्माण पर मनाएं खुशियां पर सावधानी बरतनी भी जरूरी

सुनीता नारायण

निस्संदेह यह बड़ी बात है। गत चार वर्षों में भारत ने अपने छह लाख गांवों में करीब 10 करोड़ और शहरों में करीब 63 लाख शौचालय बनवाए हैं। कुछ साल पहले जो नामुमकिन लगता था अब वह पूरा हो चुका है और देश को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) घोषित किया जा चुका है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक, वर्ष 2019 तक देश के 93 फीसदी से अधिक घरों में शौचालय मौजूद थे, 93 फीसदी से अधिक ग्रामीण लोग खुले में शौच नहीं जाते थे और शौचालय सुविधा से लैस करीब 96 फीसदी लोग इनका इस्तेमाल भी कर रहे थे। यह देश में शौचालयों के उपयोग को लेकर एक बड़ा व्यवहारगत परिवर्तन भी दर्शाता है। करीब 99 फीसदी शौचालयों का रखरखाव ठीक ढंग से हो रहा है, वे साफ-सुथरे हैं और शत-प्रतिशत शौचालय मल-मूत्र का ‘सुरक्षित’ निपटान कर रहे हैं। शौचालय बनने से किसी तरह का प्रदूषण नहीं फैला है और असल में, 95 फीसदी गांवों में पानी इकट्ठा नहीं होता है, कोई अपशिष्ट जल नहीं निकलता और नाममात्र की ही गंदगी होती है। ये आंकड़े आश्चर्यजनक हैं।

हमें इनके बारे में कैसे पता है? पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय ने दो निजी सलाह फर्मों- आईपीई ग्लोबल और कैंटार को देश भर में सर्वेक्षण का जिम्मा सौंपा था ताकि भविष्य में विश्व बैंक से धन हासिल करने के लिए इन आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा सके। राष्ट्रीय वार्षिक ग्रामीण स्वच्छता सर्वेक्षण (एनएआरएसएस) का दूसरा चरण नवंबर 2018 से लेकर फरवरी 2019 के बीच चला था। इस दौरान जमीनी हालात को परखने के लिए 6135 गांवों और 92,411 परिवारों का जायजा लिया गया।

वर्ष 2018-19 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया कि सभी शौचालयों की जियो-टैगिंग की गई है ताकि उनकी पुष्टि की जा सके। सबसे अहम बात, शौचालय निर्माण कार्यक्रम के लाभ स्वास्थ्य संकेतकों में नजर आ रहे हैं। यह सर्वे विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ का हवाला देते हुए कहता है कि अधिक शौचालय उपलब्धता वाले जिलों में पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों में डायरिया और मलेरिया के मामले नाटकीय रूप से कम हुए हैं। इसमें कोई किंतु-परंतु नहीं है, केवल एक और बात है। साक्ष्य कहते हैं कि देश एक नामुमकिन-सा लक्ष्य हासिल करने में सफल रहा है। असल में, भारत की यह उपलब्धि शौचालयों के विस्तार एवं मल-मूत्र के सुरक्षित निपटान संबंधी वैश्विक संवहनीय विकास लक्ष्यों को पूरा करने में एक अहम स्थान रखेगी। हालांकि इस कामयाबी को टिकाऊ बनाने की जरूरत है ताकि यह स्थायी बन सके। यहीं पर बड़ा जोखिम भी है। भले ही हम इस कामयाबी का जश्न मना रहे हैं लेकिन हमें शौचालय चुनौती को तिलांजलि नहीं देनी चाहिए। इसकी वजह यह है कि अभी काफी कुछ किए जाने की जरूरत है और अभी बहुत कुछ गलत होने की गुंजाइश भी है।

पहली बात यह है कि सभी कार्यक्रमों में एक समय के बाद गिरावट आती है। यह कार्यक्रम भी इससे जुदा नहीं होगा। लिहाजा अगर शौचालय बने हैं और लोग उनका इस्तेमाल शुरू कर चुके हैं तब भी यह रुझान बिना देरी के पलट सकता है। जब पाक्षिक पत्रिका ‘डाउन टु अर्थ’ के संवाददाताओं ने शौचालयों का हाल जानने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों का दौरा किया तो उन्हें कुछ अच्छी एवं बुरी बातें पता चलीं। अतीत में शौचालयों की भारी कमी से जूझने वाले उत्तर प्रदेश में परिवर्तन साफ नजर आ रहा था। शौचालयों की मौजूदगी दिखाई दी और खासकर महिलाएं न केवल उनका इस्तेमाल कर रही थीं बल्कि संख्या बढ़ाने की मांग रखी। लेकिन वर्ष 2017 में ही ओडीएफ घोषित किए जा चुके राज्य हरियाणा में लोग एक बार फिर से खुले में शौच की पुरानी आदत अपनाते नजर आए। यह इस लिहाज से भी अहम है कि हरियाणा को लोगों के शौच व्यवहार में बदलाव के लिए खास तौर पर चिह्नित किया गया था। लेकिन शौचालय अब टूटे-फूटे हैं, लोगों के इस्तेमाल लायक नहीं रहे या फिर लोग सदियों पुरानी आदत की तरफ लौटने लगे हैं।

दूसरा, मल-मूत्र के निपटान का मुद्दा है। एनएआरएसएस 2018-19 सर्वेक्षण में सुरक्षित निपटान की अपर्याप्त एवं दोषपूर्ण परिभाषा का उपयोग किया गया है। अगर शौचालय किसी सेप्टिक टैंक, एकल या दोहरे गड्ढों या किसी नाले से जुड़ा है तो उसे सुरक्षित कहा गया है।

सच्चाई यह है कि यह केवल मल-मूत्र का फैलाव रोकने की व्यवस्था है, न कि उसका निपटान। अनुमान है कि ग्रामीण इलाकों में बने करीब 10 करोड़ शौचालयों का बड़ा हिस्सा एकल या दोहरे गड्ढों वाले संडास हैं। लोग एक गड्ढे में मल-मूत्र विसर्जन करते हैं और उसे खाली कर दोबारा इस्तेमाल में लाया जाता है। इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि संडास गड्ढों से यह अवशिष्ट कहां जाता है? पड़ोस के पोखर, तालाब, नाले या फिर खेतों में? यह भी कहा जा सकता है कि शौचालय अभी नए बने हैं लिहाजा शौचालय गड्ढों में इक_ा विष्ठा को ठिकाने लगाने की अभी कोई जरूरत ही नहीं आएगी। लेकिन आने वाले समय में तो ऐसा होगा। साफ है कि अगर इस मल-मूत्र का समुचित निपटान नहीं होता है तो यह लोगों की सेहत पर काफी भारी पड़ेगा। शौचालय न केवल गंदगी फैलने का जरिया बनेंगे बल्कि मिट्टी एवं पानी के दूषित होने से सेहत लाभ भी खत्म होते जाएंगे। तीसरा, शौचालय आकलन की विश्वसनीयता का सवाल भी है। सही रास्ते की जानकारी के लिए यह बेहद जरूरी है। फिलहाल शौचालयों की स्थिति के बारे में सारे अध्ययन परियोजना के धन प्रदाता या मंत्रालय की तरफ से ही कराए गए हैं। इन सर्वेक्षणों के परिणाम या शोध-पद्धति को लेकर संदेह करने की कोई वजह नहीं है। लेकिन यह भी सही है कि भारत में कभी भी कोई चीज इतनी सही या गलत नहीं हो सकती है। ऐसे में कई अन्य संस्थाओं की तरफ से और अलग नजरिये को लेकर इनका आकलन करने की जरूरत है। शौचालय के बारे में अच्छी खबर बताते समय भी हमें यह याद रखना चाहिए कि ‘अगर हम सभी तालियां बजाने वाले बन जाएंगे तो फिर तालियां बजाने के लिए कोई टीम ही नहीं बचेगी’।

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