27-08-2019 (Newspaper Clippings)

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सरकारी व्यय में कटौती से कुछ योजनाओं पर लगेगा ताला?

के भट्टाचार्य

सरकार के भीतर अब व्यापक स्वीकारोक्ति हो चुकी है कि इसकी वित्तीय स्थिति ठीक नहीं होने से राजकोषीय राहत पैकेज लाने या सरकारी व्यय बढ़ाने की गुंजाइश काफी सीमित रह गई है। यह आभास आने वाले हफ्तों में अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए घोषित किए जाने वाले उपायों पर असर भी डालेगा। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के गैर-अंकेक्षित अनंतिम आंकड़ों से पता चलता है कि इसका सकल कर राजस्व 2018-19 की समान अवधि के मुकाबले केवल 1.3 फीसदी ही बढ़ा है। इस वित्त वर्ष में सकल कर राजस्व में 18 फीसदी की वृद्धि के बजट लक्ष्य को देखते हुए यह वृद्धि काफी कम है। यह तुलना वर्ष 2018-19 में संकलित कर संग्रह के अनंतिम आंकड़ों पर आधारित है, न कि बजट में पेश किए गए संशोधित अनुमानों पर। लिहाजा वृद्धि के ये आंकड़े चालू वित्त वर्ष में किए जाने वाले राजस्व प्रयासों का एक अधिक वाजिब तरीका दिखाते हैं।

इस तरह अप्रैल-जून 2019 तिमाही में कॉर्पोरेट कर संग्रह भी महज छह फीसदी बढ़ा। हालांकि व्यक्तिगत आयकर और सीमा शुल्क से प्राप्त राजस्व में वृद्धि क्रमश: 12 फीसदी और 16 फीसदी रही। पहली तिमाही में संकलित केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (सीजीएसटी) 28 फीसदी की दर से बढ़ा। लेकिन देश में पेट्रोल एवं डीजल के उपभोग यानी आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार का संकेत देने वाला उत्पाद शुल्क संग्रह करीब आठ फीसदी तक गिर गया। यह विरोधाभास हमारे लिए चिंता की वजह है। ऐसे में आश्चर्य की बात नहीं है कि सरकार ने अपने व्यय पर लगाम लगा दी है। चालू वित्त वर्ष के पहले तीन महीनों में भी सरकार का राजस्व व्यय महज छह फीसदी की दर से ही बढ़ा है। यह वृद्धि दर पूरे साल के राजस्व व्यय के लिए अनुमानित 22 फीसदी वृद्धि की तुलना में काफी कम है।

पूंजीगत व्यय की नकेल तो और अधिक कस दी गई है। इसके वर्ष 2019-20 के पूरे साल में करीब 11 फीसदी की दर से बढऩे का अनुमान है। लेकिन अप्रैल-जून की अवधि में पूंजीगत व्यय वर्ष 2018-19 की पहली तिमाही की तुलना में हुए खर्च से 27 फीसदी तक नीचे आ चुका है। अगर वित्त मंत्रालय के मुख्यालय नॉर्थ ब्लॉक का मिजाज ऐसा ही बना रहा तो सरकार विभिन्न मंत्रालयों द्वारा संचालित सभी तरह की योजनाओं एवं परियोजनाओं पर अब करीबी नजर रखेगी। सार्वजनिक वित्त-पोषित योजनाओं एवं परियोजनाओं को मंजूरी एवं उनकी समीक्षा के संबंध में जारी एक पुराने परिपत्र को कुछ हफ्ते पहले ही व्यय विभाग की वेबसाइट पर डाला गया है।

इस अधिसूचना के दो निर्देश खास अहमियत वाले हैं क्योंकि वे किसी खास संदर्भों में उसके निहित मंतव्य को भी उजागर करते हैं। पहला, यह सभी केंद्रीय मंत्रालयों को व्यय विभाग की सैद्धांतिक पूर्वानुमति नहीं मिलने पर कोई भी नई योजना या परियोजना शुरू करने से रोकता है। इस तरह यह निर्देश किसी भी मंत्री या सचिव को अपने क्षेत्राधिकार में कोई भी नई योजना शुरू करने से रोकता है जिससे नया खर्च बढऩे वाला हो। इसी के साथ वित्त मंत्रालय ने केंद्रीय मंत्रालयों को अब बेअसर एवं व्यर्थ हो चुकीं योजनाओं एवं परियोजनाओं के विलय या पुनर्गठन या उन्हें बंद किए जाने पर गंभीरतापूर्वक विचार करने को भी कहा है। यहां पर इस बात का ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए कि एक नई योजना शुरू करने के लिए वित्त मंत्रालय की सैद्धांतिक मंजूरी लेनी होगी, वहीं किसी फालतू योजना को बंद करने या उसके पुनर्गठन की शुरुआत किसी भी केंद्रीय मंत्रालय द्वारा नॉर्थ ब्लॉक की पूर्व-अनुमति के बगैर ही की जा सकती है।

दूसरे निर्देश के कई योजनाओं के भविष्य के लिए अहम निहितार्थ हैं। वर्ष 2016 में केंद्रीय क्षेत्र द्वारा संचालित कुल योजनाएं 300 थीं लेकिन उन्हें सरल एवं कारगर बनाने की कवायद पिछले तीन वर्षों से चल रही है। इसी तरह केंद्र द्वारा प्रायोजित एवं उसकी भागीदारी वाली योजनाओं की संख्या घटाकर केवल 30 पर लाई गई थी। ऐसी योजनाओं के भविष्य पर फैसला करने की पहली समयसीमा मार्च 2017 थी जब बारहवीं पंचवर्षीय योजना का भी समापन हो रहा था। ऐसी समीक्षा की दूसरी एवं अंतिम समयसीमा मार्च 2020 होने वाली है। उसी समय 14वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं के लागू होने की मियाद भी पूरी होगी।

वित्त मंत्रालय के पास यह तय करने के लिए केवल छह महीने ही रह गए हैं कि केंद्र सरकार की बाकी सभी परियोजनाओं एवं केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं की समीक्षा कर उनके निष्प्रभावी या फालतू हो जाने का फैसला किया जाए। दूसरा निर्देश दिखाता है कि मार्च 2020 के बाद भी जारी रखने लायक ऐसी सभी योजनाओं पर समयावधि समीक्षा का प्रावधान लागू होगा। इसके पीछे दलील यह है कि 15वें वित्त आयोग की अनुशंसाएं अप्रैल 2020 से प्रभावी होंगी और केवल वही योजनाएं इस समयावधि समीक्षा से बच सकती हैं जिन्हें फंड उपलब्धता के आधार पर आगे भी जारी रखने को सही ठहराया जा सके।

इस लिहाज से अगले छह महीने ही यह तय करेंगे कि कौन सी केंद्रीय योजना समेट ली जाएगी और किस योजना का वजूद बचा रह जाएगा? ऐसी स्थिति में आने वाले महीनों में हमें इन योजनाओं के पक्ष एवं विपक्ष में गोलबंदी भी तेज होती हुई नजर आएगी।


मिलेगा 1 महीने का पर्यटक वीजा

सुस्ती के बाद विदेशी पर्यटक को लुभाने के लिए सर्कार ने लगाया जोर

अनीश फडणीस

देश के भीतर पर्यटन को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने एक महीने के लिए ई-वीजा पेश करने और अहम व गैर अहम सीजन के लिए शुल्कों को लचीला बनाने का निर्णय लिया है। केंद्रीय पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल ने आज छुट्टियां बिताने वाले पर्यटकों के लिए शुल्कों में कमी करने की घोषणा की। ऐसे पर्यटकों से अप्रैल से जून और जुलाई से मार्च के बीच की अवधि में 30 दिनों के ई-वीजा का शुल्क क्रमश: 10 डॉलर और 25 डॉलर वसूला जाएगा। अभी भारत ज्यादातर देशों को एक वर्ष की अवधि के लिए ई-वीजा जारी करने पर 80-100 डॉलर का शुल्क वसूल करता है।

2018 में भारत में 1.05 करोड़ विदेशी पर्यटक आए जो कुछ अन्य एशियाई देशों के मुकाबले बहुत कम है। पिछले वर्ष सिंगापुर में 1.85 करोड़ पर्यटक पहुंचे जबकि थाइलैंड जाने वाले पर्यटकों की संख्या 3.8 करोड़ रही। पर्यटकों के लिए भारत के कम आकर्षक होने की वजह उच्च वीजा शुल्क है और अब उनको लुभाने और विदेशी मुद्रा की आवक बढ़ाने के लिए शुल्कों में कटौती की जा रही है। एक वर्ष और पांच वर्ष के लिए ई-वीजा देने पर जापान, सिंगापुर और श्रीलंका के नागरिकों से 25 डॉलर का शुल्क लिया जाएगा जबकि अन्य देशों के लिए शुल्क क्रमश: 40 डॉलर और 80 डॉलर वसूला जाएगा। लचीले शुल्क के साथ पर्यटकों के लिए एक महीने की अवधि के लिए ई-वीजा जारी करने का निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई हालिया बैठक में लिया गया था। इसमें ई-वीजा की वैधता को मौजूदा एक वर्ष की अवधि से बढ़ाकर पांच वर्ष करने पर भी निर्णय लिया गया था। विदेश मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद नए शुल्कों का औपचारिक आदेश जारी कर दिया जाएगा।

विदेशी पर्यटकों के लिहाज से अप्रैल-जून का महीना कमजोर अवधि मानी जाती है और 2017 में कुल विदेशी पर्यटकों में से करीब आधे जनवरी से मार्च और जुलाई से सिंतबर में आए थे। बांग्लादेश, अमेरिका और ब्रिटेन सहित सभी बड़ी जगहों से आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए दिसंबर का महीना अहम होता है। इंडियन एसोसिएशन ऑफ टूर ऑपरेटर्स के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कोहली ने कहा, ‘श्रीलंका और थाइलैंड जैसे देश मुफ्त वीजा के कारण भारतीय पर्यटकों को आकर्षित करने में सफल रहे हैं। सरकार के निर्णय से अब संकेत मिलता है भारत भी पर्यटकों का स्वागत करने के लिए तैयार है।’

थॉमस कुक की घरेलू पर्यटन विभाग टीसीआई के प्रबंध निदेशक दीपक देवा ने कहा, ‘यह बहुत ही अच्छा कदम है। इस कदम के बाद अगले दो से तीन वर्षों में भारत आने वाले पर्यटकों की संख्या दोगुनी हो जानी चाहिए। इस कदम से गोवा जैसे दूर दराज वाले पर्यटन स्थलों को भी लाभ होगा। विदेशी पर्यटकों के लिए भारत हमेशा से आकर्षक पर्यटन स्थल रहा है लेकिन उच्च वीजा शुल्क ने भारत की यात्रा को महंगा बना दिया था।’ पिछले वर्ष जनवरी में पर्यटन मंत्रालय ने 2020 तक विदेशी पर्यटकों की संख्या दोगुनी कर 2 करोड़ करने का लक्ष्य बनाया था। हालांकि 2018 में वृद्घि दर सुस्त पड़ गई और पर्यटकों की संख्या महज 5.2 फीसदी बढ़ कर 1.05 करोड़ पर ही ठिठक गई। 2019 के पहले चार महीनों में वृद्घि दर महज 1.9 फीसदी रही जिसके लिए पिछले वर्ष वीजा शुल्क में किए गए इजाफे को जिम्मेदार माना गया। विगत जुलाई में सरकार ने ज्यादातर देशों के लिए ई-वीजा शुल्क को 50 डॉलर से बढ़ाकर 80 डॉलर कर दिया था और अमेरिका तथा ब्रिटेन के लिए इसे 75 डॉलर से बढ़ाकर 100 डॉलर कर दिया था।


अतिवृष्टि और तबाही

अगस्त का महीना भारत के लिए हमेशा ही बाढ़ का महीना होता है। इस महीने तक अगर बाढ़ की खबरें न आने लगें, तो मान लिया जाता है कि सूखा पड़ गया है। बाढ़ जो विनाश लाती है, वह भी हमारे लिए नया नहीं रहा है। लेकिन इस बार यह सब जिस तरह से और जिस बडे़ पैमाने पर हो रहा है, वह डराने वाला है। कहीं बादल फट रहे हैं, तो कहीं भू-स्खलन हो रहे हैं, कहीं पुल बह रहे हैं, तो कहीं पूरी सड़क ही अतिवृष्टि की भेंट चढ़ रही है। सिर्फ यह कहना कि देश का एक बड़ा हिस्सा बाढ़ की चपेट में है या यह कि बाढ़ के चलते देश के एक बड़े हिस्से में जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है, इस समस्या को कम करके आंकना होगा।

समस्या को अगर एक अन्य तरह से देखें, तो यह वह साल है, जब शुरू में मौसम के सारे आकलन कह रहे थे कि इस बार मानसून औसत से कम रहेगा। देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ने की आशंकाएं अप्रैल और मई के महीनों से ही गहरा रही थीं। और जून खत्म होते-होते जब मानसून आमतौर पर पूरे देश को भिगो चुका होता है, तब यह सुनने में आ रहा था कि देश के ज्यादातर हिस्सों में सूखे के हालात हैं और इसका असर फसलों की बुवाई पर पड़ा है। कहां औसत के कितनी कम बारिश हुई है, इसके आंकडे़ तक आने लगे थे। फिर मौसम ने अचानक करवट ली और देश का एक बड़ा हिस्सा अतिवृष्टि से जूझता नजर आया।

इस समय हालत यह है कि दक्षिण, पश्चिम और उत्तर भारत तकरीबन हर जगह से अतिवृष्टि के कहर की खबरें आ रही हैं। पहाड़ों पर भू-स्खलन और बादल फटने की वजह से हुए नुकसान की खबरें तो आ ही रही हैं, राजस्थान जैसा सूखा माना जाने वाला प्रदेश भी भीषण बाढ़ से त्रस्त दिख रहा है। देश के सभी जलाशय पहले ही लबालब हो चुके थे और भारी बारिश जारी रहने के कारण बांध के गेट खोल दिए गए हैं, जिसका पानी एक और खतरा बनकर चारों ओर फैल रहा है। जान-माल का नुकसान बहुत बड़ा है, पर शायद यह अभी उसे गिनने का समय नहीं है। अभी जरूरत उन लोगों को बचाने और राहत पहंुचाने की है जो या तो बाढ़ में फंसे हैं या इसकी वजह से बेघर हो चुके हैं।

अतिवृष्टि का यह नया रूप पिछले कुछ साल से हमें परेशान कर रहा है। हर बार पहले से ज्यादा। पिछले साल कुछ ही दिनों की बारिश ने केरल के एक बड़े हिस्से के लिए भारी मुसीबतें खड़ी कर दी थीं, इस साल केरल समेत देश के तकरीबन सभी प्रदेश इस भयावह अनुभव से गुजर रहे हैं। वैज्ञानिक मौसम के इस बदलते मिजाज को जलवायु परिवर्तन के एक लक्षण की तरह देख रहे हैं, जो शायद एक सच भी है। लेकिन इसके साथ एक सच यह भी है कि इस बीच हमने पहाड़ों के गाद-गदेरों और नदियों-नालों के उस रूप को भी काफी बदल दिया है, जो आसानी से बारिश का पानी सहेजकर शेष को समुद्र तक पहुंचा देते थे।

कहीं नदियों के डूब क्षेत्र पर कब्जे हो रहे हैं, तो कहीं उनमें तरह-तरह की संरचनाएं खड़ी हो रही हैं। मकान, दुकान और यहां तक कि कई पर्यटन स्थल भी स्थापित कर दिए हैं। कुदरत ने बारिश को समुद्र तक पहंुचाने का जो रास्ता तैयार किया था, हमने उसमें तरह-तरह की बाधाएं खड़ी कर दी हैं। मौसम विभाग का कहना है कि बारिश अब चंद रोज की मेहमान है। ऐसा हुआ, तो कुछ दिन में बाढ़ भी चली जाएगी, पर क्या हम कोई सबक लेंगे?


सूखे की आशंकाएं, बाढ़ की आपदा

एस श्रीनिवासन

मूसलाधार बारिश और बाढ़ से तबाह केरल-कर्नाटक से अनेक मार्मिक कहानियां सुनने को मिल रही हैं। एक कहानी बूढ़ी ईसाई महिला की है, जिन्होंने पास के मंदिर में शरण लेना मुनासिब समझा, क्योंकि वह जगह उन्हें सबसे सुरक्षित लगी। एक अन्य कहानी केरल के मलप्पुरम जिले के तीन नौजवानों की है, जो बाढ़़ में फंसे लोगों की जान बचाने में जुटे थे, मगर एक भू-स्खलन में उन तीनों की जान चली गई। बलिदान की इस तरह की कहानियां अक्सर चंद सुर्खियों में दम तोड़ देती हैं। एक पशुपालक ने तो अपने 50 मवेशियों की जान बचाने और उन्हें भूखा न छोड़ने की खातिर उनके साथ ही रुकने का जोखिम मोल लिया, हालांकि अपनी जान बचाने के लिए वह उन्हें उनके हाल पर छोड़ भाग सकता था। कर्नाटक के बेलगावी राहत शिविर ने तो अपने यहां पनाह लिए लोगों की इतनी अच्छी देखभाल की कि पानी उतरने के बाद भी लोग वहां से अपने घर जाने को तैयार न थे।

ये वो चंद कहानियां हैं, जो तस्दीक करती हैं कि एक-दूसरे के प्रति गहरे संदेहों से भरे होने और आज के ध्रुवीकृत नफरती माहौल के बावजूद मानवीय मूल्य हमारे भीतर बचे हुए हैं। कोई विद्वेषी से विद्वेषी भी शायद इन कहानियों को नजरंदाज नहीं कर सकता। कर्नाटक में भी स्थानीय विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में राहत और बचाव के कार्यों में मदद के लिए उतर आए, भले ही इसकी पहल उनकी प्रतिद्वंद्वी पार्टी के लोगों ने ही क्यों न की हो।

इसके अलावा वहां जिंदगी अपने ढर्रे पर ही आगे बढ़ती दिखी है। राजनेताओं ने नुकसान के आकलन के लिए हवाई दौरे किए और उन इलाकों को नजरंदाज किया, जहां उनकी विरोधी सरकारें हैं। फिर उन्होंने वही पारंपरिक बयान दिए और बचाव व राहत में मदद के वादे किए। मुख्यमंत्रियों ने कुदरती आपदा के आगे अपनी बेबसी का राग अलापा, कभी-कभी उन्होंने केेंद्र सरकार पर उंगली उठाई और अधिक राहत राशि की मांग की। इस समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए क्या उन्हें जमीन पर एक साथ नहीं बैठना चाहिए, ताकि इसका ठोस हल निकल सके? क्या कुदरती आपदाओं पर राष्ट्रीय बैठक की कोई व्यवस्था है, जिसमें सभी सियासी पार्टियां सक्रिय रूप से भाग लें?

केरल में पिछले साल अगस्त में आई बाढ़ ने पूरे प्रदेश को तबाह कर दिया था। 483 लोग उसकी भेंट चढ़ गए थे, जबकि 140 लापता हो गए। इस साल भी अगस्त महीने में ही आई इस आपदा में अब तक 104 लोग मारे जा चुके हैं, जबकि अनगिनत लापता हैं। इस साल केरल के सिर्फ उत्तरी और मध्य हिस्से प्रभावित हुए हैं। पिछले साल अचानक मूसलाधार बारिश के कारण उमड़ते बांधों द्वारा पानी छोड़े जाने को बाढ़ का मुख्य कारण बताया गया था। तब यह भी कहा गया था कि 100 वर्षों में एक बार ऐसा होता है। इस बार तो दो दिनों के भीतर ही 80 भू-स्खलनों ने केरल को हिलाकर रख दिया। मल्लपुरम जिले में हुए भू-स्खलन में आधा गांव दफ्न हो गया। यह पश्चिमी घाट का ही एक हिस्सा है। करीब 45 परिवारों के इसमें मारे जाने का अंदेशा है। 50 फीट से भी ऊंचे मलबे में दबे लोगों की तलाश में प्रशासन में जुटा हुआ है।

इसके पड़ोसी कर्नाटक को तो दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। चंद हफ्ते पहले तक इसके 80 फीसदी जिले भीषण सूखे के शिकार थे। यहां तक कि स्कूलों को लंबी अवधि के लिए बंद करना पड़ा था। लोगों की प्यास बुझाने के लिए बड़े स्तर पर टैंकरों की सेवा ली जा रही थी। राज्य के पश्चिमोत्तर और उत्तरी भाग को सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका था। लेकिन कर्नाटक सरकार सूखे की वजह से हुए नुकसान का आकलन कर पाती कि दूसरे इलाकों में भारी बारिश शुरू हो गई। अब केंद्रीय टीम सूखे और बाढ़, दोनों के नुकसान का आकलन करने में जुटी है। लगभग 70 लोग अब तक यहां बाढ़ की भेंट चढ़ चुके हैं।

दूसरी ओर, तमिलनाडु में जल संकट तो इतना गंभीर हो चला था कि निजी दफ्तर बंद करने पडे़ और कर्मचारियों को घर से ही काम करने की इजाजत देनी पड़ी थी, यहां तक कि रेस्टोरेंट्स ने दोपहर का भोजन परोसना बंद कर दिया था, क्योंकि बर्तनों को साफ करने में ज्यादा पानी खर्च होता है। स्थानीय प्रशासन ने स्कूलों-कॉलेजों में ऐसे शौचालयों का विकल्प तलाशना शुरू कर दिया, जिनमें पानी का न के बराबर इस्तेमाल हो सके। बावजूद इसके तमिलनाडु सरकार अपनी आंखें मूंदे बैठी रही और यही दावा किया कि राज्य में ऐसा कोई जल संकट नहीं है।

किसी भी कुदरती आपदा में सबसे ज्यादा नुकसान हाशिए के लोगों को उठाना पड़ता है, क्योंकि उन्हें अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए अपनी जगह छोड़नी पड़ती है। ऐसे लोग पिछले साल के नुकसान का मुआवजा भी नहीं ले पाते। दक्षिणी राज्यों में भी सरकारी अधिकारी खाली घरों के दरवाजे पीट लौट गए थे। अब वे फिर नए संकट की गिरफ्त में हैं। जलवायु परिवर्तन और इंसानी ज्यादतियों को सूखे और बाढ़ की मुख्य वजह माना जाता है, और पश्चिमी घाट की संवेदनशील पारिस्थितिकी से जुड़ा विस्तृत अध्ययन हमारे पास पहले से मौजूद है। माधव गाडगिल कमिटी ने अपनी 2011 की रिपोर्ट में इस क्षेत्र में भू-स्खलन और तबाही के कारणों के बारे में विस्तार से कहा है। लेकिन राजनीतिक वर्ग ने उसकी सिफारिशों को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया। एक वन-अधिकारी के मुताबिक, कोई भी यदि राज्य में ग्रेनाइट और अन्य खनन गतिविधियों की सूची तैयार करे, तो उसे आसानी से मालूम हो जाएगा कि ज्यादातर भू-स्खलन इनके आस-पास ही हुए हैं।

वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के कारण पारिस्थितिकीय त्रासदी पैदा हो रही है। यह सबको पता है कि पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी बेहद नाजुक है और भारत के मेट्रोलॉजिक सिस्टम में इसकी अहम भूमिका है। भारत का जून से सितंबर तक का मुख्य मानसून अपनी यात्रा केरल से ही शुरू करता है। जैसे-जैसे इन पर्वतों से गुजरता है, वह मजबूत होता जाता है। वैसे, दक्षिण ही नहीं, उत्तर भारत के भी कई राज्य इस समय भयंकर बाढ़ की त्रासदी झेल रहे हैं। इसलिए बेहद जरूरी है कि नीति-निर्माता इस समस्या के हल के लिए फौरन अपनी सक्रियता दिखाएं। जलवायु परिवर्तन की अनेदखी अब और नहीं की जा सकती।

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