24-10-2019 (Newspaper Clippings)

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अर्थशास्त्र के नोबेल से गरीबी मिटाने पर फिर फोकस

राम सिंह

पिछले तीन दशकों में दुनिया भर में गरीबों की संख्या में बहुत कमी आई है। इसमें भारत व चीन ने सबसे ज्यादा योगदान दिया है। 1995 और 2018 के बीच शिशु मृत्युदर भी 50 फीसदी से घटी है। स्कूल जाने वाले बच्चे 56 से बढ़कर 80 फीसदी हो गए हैं। किसी भी पैमाने से यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। लेकिन, भारत जैसे देश के लिए गरीबी अब भी बहुत बड़ी चुनौती है। अब भी 70 करोड़ से ज्यादा लोग कई तरह की गरीबी का सामना कर रहे हैं- आमदनी, सेहत और शिक्षा संबंधी गरीबी। दुनियाभर में हर साल 50 लाख से ज्यादा बच्चे बुनियादी मेडिकल सुविधा के अभाव में मर जाते हैं। बचे हुए बच्चों में से आधे से ज्यादा पढ़ने, लिखने और हिसाब लगाने की बुनियादी शिक्षा के बिना ही स्कूल छोड़ देते हैं। इस साल अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार ने अर्थशास्त्रियों और नीति-निर्धारकों का फोकस फिर गरीबों पर ला दिया है। विजेताओं- अभिजीत बनर्जी, उनकी पत्नी एस्तर डल्फो और माइकल क्रेमर ने गरीबी विरोधी नीतियों को प्रभावी बनाने के लिए अपने शोध में रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल (आरसीटी) नामक पद्धति अपनाई।

यह तकनीक एक सदी से भी ज्यादा समय से दवाओं के क्लिनिकल ट्रायल में इस्तेमाल होती रही है पर इन अर्थशास्त्रियों ने इसका उपयोग कई देशों के गरीबों के व्यवहार का अध्ययन करने के लिए किया। इससे नीति के किसी एक आयाम पर ध्यान केंद्रित करना संभव होता है। जैसे भारत सहित विकसित देशों में खराब शिक्षा की समस्या को लें। कई बच्चों के पास किताबें नहीं होती और वे भूखे ही स्कूल जाते हैं। फिर सरकारी स्कूलों में एक ही टीचर एक साथ कई अलग-अलग ग्रेड के बच्चों को पढ़ाता है। सवाल है कि बच्चों की शिक्षा किस बात में बदलाव से बेहतर होगी अधिक किताबें, अधिक शिक्षक या बच्चों को दोपहर का मुफ्त भोजन देने से? क्रेमर ने जवाब तलाशने के लिए केन्या में कई आरसीटी प्रयोग किए। स्कूलों को बेतरतीब तरीके से तीन भिन्न समूहों में बांटकर एक को किताबें तो दूसरे को मुफ्त भोजन दिया और तीसरे को दोनों में से कुछ नहीं दिया। पता चला कि किताबें व भोजन देने से तीसरे ग्रुप की तुलना में कोई खास फर्क नहीं पड़ा।
बनर्जी और डफ्लो ने मुंबई व वडोदरा में धीमी गति से सीखने वाले बच्चो को शिक्षण सहायक मुहैया कराए गए। बच्चों का प्रदर्शन कहीं बेहतर रहा। उसके बाद से भारतीय स्कूलों में कई बच्चों को ऐसी शिक्षण सहायता पहुंचाने के कार्यक्रम शुरू हुए हैं।

इसी तरह उन्होंने डॉक्टरों के लिए प्रोत्साहन व जवाबदेही के अभाव का अध्ययन किया, जो सरकारी डॉक्टरों की गैर-मौजूदगी के रूप में दिखाई दे रहा था। पाया गया कि डॉक्टरों को जवाबदेह बनाकर प्रदर्शन सुधारा जा सकता है। क्रेमर व सहयोगियों ने अपने शोध में पाया कि परजीवियों से होने वाले संक्रमण में कृमि नाशक उपायों की कीमत में थोड़ी वृद्धि से भी मांग बहुत घट जाती है। ये नतीजे स्वाभाविक हैं खासतौर उनके लिए जो विकासशील देशों से वाकिफ हैं। हालांकि, शोध की उपयोगिता नीतिगत प्रभावों को ठीक-ठीक आंकने और यह समझने में है कि किसी नीति को कारगर बनाने में कैसे बदलाव किया जाए। जब अपने बच्चों का टीकाकरण कराने वाले परिवारों को मुफ्त में दालें दी गईं तो टीकाकरण 6 फीसदी से बढ़कर 39 फीसदी तक पहुंच गया।

एक अन्य प्रयोग में डफ्लो व क्रेमर ने बताया कि लोग आधुनिक टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को लेकर उदासीन रहते हैं। कम लागत की प्राकृतिक खाद जैसे आसान उपाय भी छोटे खेतों के मालिक अपनाने से उदासीन रहते हैं, फिर चाहे उन्हें बहुत फायदा मिलने की संभावना क्यों न हो। उन्होंने प्रयोगों से दिखाया कि स्थायी के बजाय अस्थायी सब्सिडी ज्यादा असरदार होती है। जैसे यदि टॉयलेट बनाने के लिए थोड़े समय की सब्सिडी होती तो लोग तेजी से टॉयलेट बनवाते, क्योंकि उन्हें सब्सिडी गंवाने का डर होता। हालांकि नीति निर्धारिकों को रिसर्च और नीति निर्धारण को सीधे जोड़ने में सावधानी बरतनी चाहिए। जैसे मध्याह्न भोजन से सीखने का स्तर न बढ़ने का मतलब यह नहीं कि मध्याह्न भोजन रोक देना चाहिए। इसी तरह यह दलील की अल्पावधि के कॉन्ट्रेक्ट के जरिये शिक्षकों का प्रदर्शन सुधारा जा सकता है। यही स्कूलों के निजी क्षेत्र में होता है। पर औसत सरकारी व प्राइवेट स्कूल एक जैसे होते हैं। इसी तरह निजी अस्पताल कॉन्ट्रेक्ट पर डॉक्टर रखते हैं पर वे इतने महंगे होते हैं कि ज्यादातर भारतीयों की पहुंच से बाहर होते हैं। सारे सोच-विचार के बाद तीव्र आर्थिक प्रगति और अच्छी सार्वजनिक सेवाएं ही गरीबों की स्थिति सुधारने की कुंजी है। अब भारत घोर गरीबी में रहने वाली सबसे बड़ी आबादी वाला देश नहीं रहा है। जाहिर है पिछले तीन दशकों में हुई तीव्र प्रगति इसकी वजह है।

स्रोत –  दैनिक भास्कर

गरीब की जिंदगी

(विवेक कौल), स्तंभकार अर्थशास्त्री एवं इजी मनी ट्राइलॉजी के लेखक हैं)

 वर्ष 2011 की बात है। अभिजीत बनर्जी मुंबई आए हुए थे और मुझे उनका साक्षात्कार करना था। साक्षात्कार के दौरान उन्होंने मोरक्को से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग बयान किया। अपने मोरक्को दौरे के दौरान बनर्जी जब एक गरीब आदमी से मिले तो उन्होंने उससे पूछा कि अगर तुम्हे थोड़े और पैसे मिलें तो तुम उन पैसों का क्या करोगे? उस आदमी ने कहा कि वह उन पैसों से भोजन खरीदेगा। इस पर बनर्जी ने उससे पूछा कि अगर और भी पैसा मिले तो वह उन पैसों का क्या करेगा? आदमी ने फिर जवाब दिया कि वह और भी भोजन खरीदेगा।

बनर्जी को यह सुनकर काफी अजीब लगा, पर जब वह उस आदमी के घर पहुंचे तो हक्के-बक्के रह गए। उस आदमी के घर में टीवी और डीवीडी प्लेयर भी था। यह देखने के बाद बनर्जी ने उससे कहा कि अगर तुम्हारे पास खाने के लिए पर्याप्त आहार नहीं है तो फिर टीवी कैसे है? इस पर उसने जवाब दिया कि जिंदगी में टीवी होना खाने से अधिक जरूरी है। बनर्जी के लिए यह काफी चौंकाने वाली बात थी। इस अनुभव से दो-चार होने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी एस्थर डुफ्लो के साथ विश्व के कई देशों में भोजन के अधिकार पर कई प्रयोग किए। इसके अलावा उन्होंने बाल शैक्षिक सुधार की दिशा में भी काफी काम किया। उन्हें इन क्षेत्रों में काम के लिए ही माइकल क्रेमर के साथ अर्थशास्त्र में इस साल के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

अधिकांश अर्थशास्त्री अपने काम के लिए प्रयोग आधारित दृष्टिकोण का पालन नहीं कर पाते, क्योंकि वास्तविक जीवन में प्रयोग करना काफी मुश्किल होता है, लेकिन अभिजीत बनर्जी और डळ्फ्लो के साथ ऐसा नहीं है। अर्थशास्त्र में उनके शोध प्रायोगिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं। मोरक्को वाले उदहारण के आधार पर चीन में एक प्रयोग किया गया। इस प्रयोग की चर्चा बनर्जी ने उक्त साक्षात्कार में की थी। इसके बाद 2014 में मुंबई में हुए एक लिटरेचर फेस्टिवल में भी उन्होंने इसके बारे में काफी विस्तार से बताया। संयोग से मैं वहां मौजूद था। बनर्जी ने बताया कि हमने चीन में कुछ लोगों को सस्ते चावल खरीदने के लिए वाउचर दिए। हमारा अनुमान था कि इससे पोषण में सुधार होगा। चूंकि यह एक प्रयोग के रूप में किया गया था इसलिए कळ्छ लोगों को वाउचर दिए गए थे और कुछ को नहीं। इस प्रयोग का परिणाम उम्मीद से बहुत अलग निकला।

आशा यह की जा रही थी कि लोगों का पोषण सुधरेगा, पर ऐसा हुआ नहीं। बनर्जी ने बताया, वाउचर वाले लोग पोषण में बदतर निकले। दरअसल उन्हें लगा कि अब उनके पास वाउचर है सो वे पहले से ज्यादा अमीर हैं और अब उन्हें चावल खाने की जरूरत नहीं है। वे पोर्क, झींगा आदि खा सकते हैं। उन्होंने पोर्क और झींगा खरीदा और परिणामस्वरूप उनके शुद्ध कैलोरी ग्रहण में कमी हो गई। भले ही यह बात सुनने में थोड़ी अजीब लगे, पर बनर्जी इसे पूरी तरह तर्कसंगत मानते हैं। उनका कहना है कि वे लोग आनंद की प्रतीक्षा कर रहे थे। आनंद न केवल हमारे जीने के लिए, बल्कि हमारे भाग्य को नियंत्रित करने के संदर्भ में भी बहुत महत्वपूर्ण है। अगर किसी को लगता है कि उसे शेष जीवन दब्बू होकर जीना होगा तो इसका मतलब है कि उसका जीना बहुत मुश्किल हो गया है। बनर्जी के अनुसार, चीन के वे लोग अपने पोषण में सुधार कर सकते थे या अगले दस दिनों के लिए थोड़ा बेहतर खा सकते थे, लेकिन आनंद एक ऐसी चीज है जिसके बारे में हम भूल जाते हैं।

दुनिया भर के विभिन्न देशों ने भोजन के अधिकार को इसी विचार के साथ लागू किया है कि अगर गरीब लोगों को रियायती भोजन दिया जाएगा तो उनके पोषण में सुधार होगा। जब खाद्य सुरक्षा नीतियां तैयार की जाती हैं तो उन्हें तैयार करने वाले जीवन के आनंद के बारे में नहीं सोचते। वे यह मानकर चलते हैं कि अगर भोजन रियायती दरों पर उपलब्ध कराया जाएगा तो लोग स्वाभाविक रूप से पोषण के बारे में ही सोचेंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। यह एक बहुत ही सरल, किंतु गहरी बात है जो किसी प्रयोग से ही बाहर आ सकती थी। यह प्रयोग बनर्जी और डळ्फ्लो ने किया। ऐसे ही प्रयोग उन्होंने शैक्षिक सुधार के क्षेत्र में भी किए और यह पाया कि भारत के सरकारी स्कूलों में शैक्षिक सुधार की काफी जरूरत है। ऊंची कक्षाओं के छात्र भी ठीक से पढ़-लिख नहीं पाते हैं। उन्हें बुनियादी गणित के सवाल हल करने में भी दिक्कत होती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सरकारी शिक्षकों के साथ एक प्रयोग किया।

बनर्जी दंपती ने शिक्षकों से कहा कि छह हफ्ते तक वे केवल छात्रों के बुनियादी कौशल पर ध्यान दें। यदि वे पढ़ नहीं सकते तो उन्हें पढ़ना सिखाएं। यदि वे गणित में दक्ष नहीं तो उन्हें गणित सिखाएं। इन शिक्षकों को थोड़ा वजीफा और साथ ही कळ्छ दिनों का प्रशिक्षण भी दिया गया। छह सप्ताह के इस प्रयोग से यह पता चला कि अगर एक अलग तरीके से पढ़ाया जाए तो बच्चों का भविष्य बदला जा सकता है। इस बारे में बनर्जी ने समझाया कि शिक्षकों को एक ऐसा काम करने के लिए कहा गया था जो वास्तव में उन्हें समझ में आता है। उन्हें बच्चों को वह सिखाने के लिए कहा गया जो बच्चे नहीं जानते थे। आम तौर पर शिक्षकों को पाठ्यक्रम पढ़ाने के लिए कहा जाता है।

शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत हर साल शिक्षकों को पाठ्यक्रम पूरा करना पड़ता है। बच्चे कळ्छ समझ रहे है या नहीं, इसकी उन्हें चिंता नहीं होती। जरा कक्षा चार में पढ़ने वाले उन बच्चों के बारे में सोचिए जो पढ़ नहीं सकते, लेकिन वे सामाजिक अध्ययन और अन्य सभी चीजें सीख रहे होते हैं। वे किसी विदेशी भाषा में कळ्छ फिल्में भी देखते हैं। बनर्जी के अनुसार, दरअसल वे कुछ नहीं सीख रहे होते हैं और इसीलिए ड्रॉपआउट दर अधिक हैं। शिक्षा की समस्या का एक सरल समाधान है। बनर्जी का कहना है, पहले चार वर्षों में हमें बुनियादी कौशल सिखाने को प्राथमिकता देनी चाहिए।

देश के इतिहास से परिचित कराने का काम बाद में भी हो सकता है। बनर्जी के अनुसार, हम यह भूल जाते हैं कि पूर्णता अच्छे की दुश्मन है। हम एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की कोशिश कर रहे हैं, जो एकदम सही हो और हर बच्चा इसके अंत में ज्ञान के साथ सामने आए। इस कोशिश के कारण वे कुछ नहीं सीख पाते। ऐसे प्रयोगों से काफी लोगों का फायदा हुआ है। नोबेल पुरस्कार संबंधी प्रेस विज्ञप्ति में कहा भी गया है कि महज एक अध्ययन के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में पचास लाख से अधिक भारतीय बच्चों को स्कूलों में ट्यूशन के प्रभावी कार्यक्रमों से लाभ हुआ है। यह बहुत बड़ी बात है।

स्रोत –  नई दुनिया

पोषण का संकट

इस हफ्ते जारी वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की रैंकिंग को लेकर चिंता जाहिर करना वाजिब ही है। हर साल जारी होने वाले इस सूचकांक में भारत को इस बार 117 देशों में से 102वां स्थान मिला है। इसका मतलब है कि भूख की तड़प एवं उसके विस्तार पर काबू कर पाने में केवल 15 देश ही भारत से पीछे हैं। मोटे तौर पर देखें तो भारत वर्ष 2010 में 95वें पायदान पर था, लिहाजा यही लगता है कि वह रैंकिंग में नीचे गिरा है।

इस सूचकांक में बच्चों का कद के अनुपात में कम वजन, उम्र के अनुपात में कम दिखना, बाल मृत्यु दर और जरूरत से कम पोषण जैसे तमाम संकेतक शामिल होते हैं। यह संभव है कि इन पैमानों पर कुल रैंकिंग भारांक या गणना-पद्धति में छोटे बदलावों के प्रति संवेदनशील हो। लेकिन सूचकांक में शामिल घटकों के अलग-अलग रुझान भी परेशान करते हैं। कद के अनुपात में वजन का पैमाना अधिक परेशान करता है।

रिपोर्ट कहती है कि जहां वर्ष 2012 के पहले 16.5 फीसदी बच्चों का वजन कद के अनुपात में नहीं था, वहीं 2014 के बाद से ऐसे बच्चों की संख्या 20 फीसदी से अधिक हो चुकी है। यहां यह खास तौर पर उल्लेखनीय है कि ये आंकड़े मोटे तौर पर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण जैसे स्रोतों से हासिल संकेतकों से मेल ही खाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की इस हफ्ते जारी ‘विश्व बाल स्थिति’ रिपोर्ट में भी ऐसी ही चिंताएं जताते हुए कहा गया है कि 35 फीसदी भारतीय बच्चों का अपेक्षित कद नहीं बढ़ता है, 17 फीसदी दुबले रह जाते हैं और 33 फीसदी बच्चों का वजन कम रहता है। भारत का प्रदर्शन बेहद खराब रहने की पुष्टि इससे भी होती है कि इसके सारे पड़ोसी देश भूख सूचकांक में बेहतर स्थिति में हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म बताया था लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस मसले पर सरकारों की लगातार कोशिशों के बावजूद समुचित प्रगति नहीं हो पाई है। साफ-सफाई से जुड़ी समस्याएं भी कुपोषण की एक वजह हो सकती हैं, मसलन, स्वच्छ भारत अभियान। लेकिन रिपोर्ट बताती है कि खुले में शौच का सिलसिला अब भी जारी है जिसका पोषण पर दुर्भाग्यपूर्ण असर होता है। लेकिन अनवरत आर्थिक वृद्धि के दो दशक बाद भी खानपान के बुनियादी मसले नहीं निपटाए जा सके हैं।

हंगर रिपोर्ट कहती है कि छह महीने से लेकर दो साल तक के 90 फीसदी बच्चों को न्यूनतम स्वीकार्य आहार भी नहीं मिल पा रहा। यूनिसेफ रिपोर्ट के मुताबिक 40 फीसदी बच्चे एनीमिया की चपेट में हैं और केवल 40 फीसदी बच्चे, किशोर या माताएं ही हफ्ते में कम-से-कम एक बार दुग्ध उत्पादों का सेवन करते हैं। ऐसी हालत तब है जब दूध उत्पादन छह फीसदी दर से बढ़ा है और नवीनतम पशु गणना में दुधारू गायों की संख्या बढऩे की बात सामने आई है।

भारत राज्य को बुनियादी तत्त्वों पर जोर देना होगा और खाद्य वितरण के सवालों को हल करना होगा। किसी इलाके में गेहूं एवं धान उगाने की इच्छा रखने वाले किसानों के समर्थन का एक माध्यम भर रह गई मौजूदा सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार करने होंगे। यह एक वितरण प्रणाली है, केवल खरीद व्यवस्था नहीं।

अब यह सुनिश्चित करने पर जोर होना चाहिए कि कुपोषण का जोखिम झेल रहे बच्चों समेत तमाम भारतीयों को संतुलित एवं पोषक आहार मिले। अगर उत्तर प्रदेश के स्कूलों में बच्चों को मध्याह्न भोजन में चावल के साथ हल्दी का पानी भर मिल रहा हो तो अनाज के भंडारगृहों में गेहूं एवं चावल का ढेर लगा होने का कोई मतलब नहीं है। दोपहर में बच्चों को सब्जियों एवं प्रोटीन से भरपूर गरम खाना परोसना भूख से जुड़े सवाल हल करने का बढिय़ा शुरुआती बिंदु होगा।

स्रोत –  बिजनेस स्टैंडर्ड

कुपोषित विकास

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि एक ओर दुनिया भर में अर्थव्यवस्था को पैमाना बना कर अलग-अलग देशों में विकास की चमकती तस्वीरें पेश की जा रही हैं और दूसरी ओर बड़ी तादाद में बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। संयुक्त राष्ट्र की ओर से मंगलवार को जारी बाल पोषण संबंधी रिपोर्ट में यह आंकड़ा सामने आया है कि विश्वभर में पांच साल से कम उम्र के लगभग सत्तर करोड़ बच्चों में से एक तिहाई बच्चे या तो कुपोषित हैं या फिर मोटापे से पीड़ित हैं। नतीजतन, इन बच्चों पर पूरे जीन कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त रहने का खतरा बना रहेगा।

‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्र्न’ रिपोर्ट की ताजा तस्वीर विकास के दावों की हकीकत बताने के लिए काफी है। सवाल है कि अर्थव्यवस्था के चमकते आंकड़ों के बरक्स अगर दुनिया के एक तिहाई बच्चे किसी न किसी बीमारी की चपेट में अपनी जिंदगी काटेंगे तो उस चमक को किस तरह देखा जाएगा! विकास के प्रचारित पैमानों में अगर बच्चों के पोषण पर केंद्रित कार्यक्रम दुनिया के देशों की प्राथमिकता में शुमार नहीं हुए तो सेहत की कसौटी पर आने वाली पीढ़ियों के व्यक्तित्व का अंदाजा भर लगाया जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि हम स्वस्थ खानपान की लड़ाई हार रहे हैं। असल में एक नई समस्या यह खड़ी हो रही है कि कहीं जरूरत से ज्यादा और असंतुलित खानपान की वजह से बच्चों का वजन अत्यधिक है तो किसी परिवार में बच्चों को पेट भर खाना भी नहीं मिल पा रहा है। दोनों ही स्थितियों को कुपोषण के ही रूप में देखा गया है। एक में बच्चे मोटापे से पीड़ित हो रहे हैं तो दूसरे में बच्चों का कद अपनी आयु के मुताबिक काफी छोटा है और वे अत्यंत दुबलेपन की समस्या से जूझ रहे हैं।

कुपोषण, भोजन में पोषण तत्त्वों की कमी और मोटापा एक ही साथ आसपास और यहां तक कि कई बार एक परिवार में भी देखा जा सकता है। जहां विश्वभर में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में से करीब आधे बच्चों को भोजन में आवश्यक विटामिन और खनिज नहीं मिल पा रहे हैं, वहीं लगभग दो अरब लोग हानिकारक खाद्य पदार्थों का जरूरत से ज्यादा सेवन कर रहे हैं, जिसके चलते मोटापे, हृदय संबंधी और मधुमेह की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

जहां तक भारत का सवाल है, यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक यहां हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है। जबकि देश में हर साल एक लाख करोड़ रुपए का अनाज बर्बाद हो जाता है, यानी चालीस फीसद भोजन वार्षिक उत्पादन में बेकार हो जाता है। जाहिर है, पोषण का यह असंतुलन खानपान की स्थितियों से जुड़ा है, लेकिन दरअसल यह असंतुलित विकास नीतियों का नतीजा है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि पूरी दुनिया को अगले दशक के आखिर तक भुखमरी से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया गया है और संयुक्त राष्ट्र के इस लक्ष्य से भारत भी जुड़ा हुआ है।

विकास के बरक्स व्यापक कुपोषण के विरोधाभास की यह हकीकत इक्कीसवीं सदी के उस दौर में भी कायम है, जब कई देश अपने सीमा-क्षेत्र में आम लोगों की जरूरतों और यहां तक कि बुनियादी समस्याओं से दो-चार होने के समांतर दुनिया में खुद को विकसित और ताकतवर देशों के साथ होड़ में होने का दावा कर रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि विकास के पैमानों में वे सवाल हाशिये पर छोड़ दिए जा रहे हैं, जिनके नतीजों में एक बड़ी आबादी अपने बच्चों का पेट तक ठीक से नहीं भर पा रही है।

स्रोत –  जनसत्ता

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