24-07-2019 (Newspaper Clippings)

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बेनामी संपत्ति पर लगाम

किसी के भी द्वारा बेनामी संपत्ति हासिल किया जाना अपने आप में भ्रष्टाचार का परिचायक है, इसलिए ऐसी संपत्ति के धारकों पर कोई रहम नहीं किया जाना चाहिए

आयकर विभाग की ओर से बसपा प्रमुख मायावती के भाई आनंद कुमार की चार सौ करोड़ रुपये की बेनामी संपत्ति जब्त किए जाने पर शायद ही किसी को हैरानी हो। अभी हाल में फिर से बसपा उपाध्यक्ष बनाए गए आनंद कुमार जिस तरह कुछ ही समय में अकूत संपदा के स्वामी बन गए थे उसके चलते इसके आसार थे कि एक न एक दिन वह आयकर विभाग अथवा प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई की चपेट में आ सकते हैं। आखिरकार वह चपेट में आए। आयकर विभाग के अलावा प्रवर्तन निदेशालय भी उनके खिलाफ जांच कर रहा है। पता नहीं यह जांच किस नतीजे पर पहुंचेगी, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में ढेरों ऐसे आनंद कुमार हैं जिनके पास अकूत संपत्ति है।

किसी ने स्वयं के राजनीतिक रसूख के बल पर संपदा बटोरी है तो किसी ने अपने सगे-संबंधी के राजनीतिक असर के जरिये। इनमें से ज्यादातर ने बेनामी संपत्ति भी एकत्र कर रखी है। करोड़ों-अरबों रुपये की बेनामी संपत्ति एकत्र करने वालों में नेताओं और नौकरशाहों की बड़ी संख्या यही बताती है कि ये लोग मौका मिलने पर दोनों हाथों से संपदा लूटते हैं। बेनामी संपत्ति वालों के खिलाफ कार्रवाई का सिलसिला न केवल कायम रहना चाहिए, बल्कि उसमें तेजी और सख्ती भी आनी चाहिए। वास्तव में हर उस शख्स के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए जिसने बेनामी संपत्ति हासिल कर रखी है। चूंकि बेनामी संपत्ति हासिल किया जाना अपने आप में भ्रष्टाचार का परिचायक है इसलिए ऐसी संपत्ति के धारकों पर कोई रहम नहीं किया जाना चाहिए।

हालांकि बेनामी संपत्ति के खिलाफ कानून पहले भी था, लेकिन उसे मजबूती तब मिली जब 2016 में मोदी सरकार ने इस कानून में संशोधन किया। कालेधन के खिलाफ अभियान छेड़ने के बाद बेनामी संपत्ति को लेकर कोई प्रभावी कानून बनाना समय की मांग थी। नि:संदेह बेनामी संपत्ति संबंधी कानून में संशोधन के बाद इस तरह की संपत्ति रखने वालों के खिलाफ कार्रवाई का सिलसिला बढ़ा है और बीते दो साल में सैकड़ों करोड़ रुपये की बेनामी संपदा जब्त भी की गई है, लेकिन अभी उपयुक्त माहौल का निर्माण नहीं हो सका है।

मोदी सरकार को ऐसे किसी माहौल का निर्माण करने के लिए सक्रिय रहना चाहिए जिससे बेनामी संपत्ति रखने वाले भय खाएं। ऐसे किसी माहौल का निर्माण तभी होगा जब बेनामी संपत्ति रखने के कुछ दोषियों को सजा देकर जेल भेजा जाएगा। इस आंकड़े से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि लगभग सात हजार करोड़ रुपये की बेनामी संपत्ति जब्त की जा चुकी है। इतने बड़े देश में दो-ढाई साल में केवल सात हजार करोड़ रुपये की बेनामी संपत्ति जब्त किया जाना पर्याप्त नहीं।

संपत्ति जब्ती के साथ जुर्माना वसूलने और जेल भेजने का काम इसलिए आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि बेनामी संपत्ति हासिल करने वाले नेता यह प्रचारित करने में जुटे हुए हैं कि उनके खिलाफ राजनीतिक बदले की भावना के तहत कार्रवाई हो रही है। यह किसी से छिपा नहीं कि इस जुमले को उछाल कर चुनावी लाभ लेने की भी कोशिश की जाती है। यह कोशिश यही बताती है कि बेनामी संपत्ति वाले जनता की आंखों में धूल झोंकने की फिराक में हैं।


पितृसत्ता की जंजीरें

जिस दौर में देश की लड़कियों ने लगातार नई ऊंचाइयां छूकर यह बताया है कि अगर उन्हें जंजीरों में नहीं जकड़ा जाए तो वे हर क्षेत्र में अपनी क्षमताएं साबित कर सकती हैं, उसमें उन्हें मोबाइल के इस्तेमाल से रोकना और उन पर सामाजिक जड़ परंपराओं को ढोने का बोझ लादना बेहद अफसोसजनक है। गुजरात के बनासकांठा जिले में ठाकोर समुदाय की एक पंचायत में अपने बीच की लड़कियों के लिए कुछ ऐसे फरमान जारी किए गए हैं, जिन्हें सामाजिक विकास की कसौटी पर जड़ता के उदाहरण के तौर पर ही देखा जाएगा। खबर के मुताबिक दांतीवाड़ा तालुक में बारह गांवों के इस समुदाय के बुजुर्गों ने बीती चौदह जुलाई को एक पंचायत बुलाई और उसमें सर्वसम्मति से फरमान जारी किया कि अगर समुदाय के युवा अंतरजातीय विवाह करते हैं तो उनके परिवार को डेढ़ से दो लाख रुपए जुर्माना भरना पड़ेगा। इसके अलावा, अगर इस समुदाय की कोई अविवाहित युवती मोबाइल फोन के साथ पकड़ी जाती है तो उनके माता-पिता को जिम्मेदार माना जाएगा। इस तरह की पाबंदियों को वहां मौजूद इस समुदाय के करीब आठ सौ नेताओं सहित एक कांग्रेस विधायक तक का समर्थन प्राप्त है।

जातिगत दायरे में कैद मानसिकता को आज एक बड़ी सामाजिक समस्या के तौर पर देखा जा रहा है और इसका हल अंतरजातीय संबंधों के रूप में ही माना जाता है। उम्मीद की जाती है कि कोई भी सभ्य समुदाय जाति की दीवारों को तोड़ कर एक मानवीय मूल्यों वाले समाज की जड़ों को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाएगा। लेकिन इसके उलट अंतरजातीय विवाह पर पाबंदी और जुर्माना लगाने की घोषणा करके क्या साबित करने की कोशिश की जा रही है? इसके अलावा, अगर समुदाय के लोगों को अपने बीच की लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई की फिक्र है तो उन्हें आधुनिक तकनीकी से वंचित करने की जगह उल्टे उसकी सुविधा मुहैया कराना चाहिए। स्मार्टफोन जैसी आधुनिक तकनीकी का सकारात्मक उपयोग किया जाए तो वह ज्ञान को हासिल करने का एक बड़ा जरिया साबित होती है। लड़कियों के मोबाइल पर बात करने पर रोक लगाना एक तरह का पितृसत्तात्मक दमन है और वह किसी अन्य रूप में फूट सकता है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि बच्चों के पालन-पोषण और उनके सामाजिक प्रशिक्षण की बुनियाद को इतना मजबूत बनाया जाए कि वे विकास की तमाम संभावनाओं और रास्तों को अपने और समूचे मानव समुदाय के हित में इस्तेमाल करना सीखें।

दरअसल, जाति की जड़ता की दीवारों को और तंग बनाने की कोशिश हो या मोबाइल पर बात करने से वंचित करने की घोषणा, इस तरह की तमाम कवायदों की शिकार अंतिम तौर पर स्त्री ही होती है। अक्सर ऐसी खबरें आती रहती हैं जिनमें किसी पंचायत ने अपने समुदाय की लड़कियों के मोबाइल पर बात करने या जींस पैंट जैसे कपड़े पहनने पर भी पाबंदी लगा दी। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिन जड़ताओं और तंगनजरी की वजह से सामाजिक विकास के रास्ते बाधित हुए माने जाते हैं, आज आजादी के सत्तर सालों के बाद उन्हें कमजोर करने या तोड़ने के बजाय मजबूत करने के लिए संवैधानिक अधिकारों तक का खयाल नहीं किया जाता। संविधान के तहत किसी भी बालिग युवा को यह अधिकार है कि वह अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह कर सकता है। लेकिन इस पर पाबंदी और आर्थिक दंड लगाने का फरमान जारी करने वाले लोग क्या खुद को संविधान और कानून से ऊपर मानते हैं? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जब तक समाज को इस तरह की पितृसत्तात्मक वर्चस्व की मानसिकता से आजादी नहीं मिलेगी, तब तक सामाजिक विकास एक ठहराव का शिकार बना रहेगा।


गैरमौजूदगी पर नाराजगी

संसद से हमेशा गायब रहने वाले मंत्रियों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नाराजगी जायज ही कही जाएगी। ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री पहली बार मंत्रियों के गैर जिम्मेदार रवैये को लेकर सख्त हैं। इससे पहले भी वह सदन से गायब रहने वाले सांसदों को अनुशासित होने की सीख दे चुके हैं। मोदी ही नहीं पार्टी अध्यक्ष रहे अमित शाह ने भी लापरवाह संसदों को लेकर अपनी नाखुशी जता चुके हैं। दरअसल, ऐसे कई मौके आए जब मंत्रालय से संबंधित सवालों का जवाब देने के लिए एक भी मंत्री सदन में मौजूद नहीं थे। इस वजह से सत्ता पक्ष को कई बार बेवजह शर्मिदा भी होना पड़ा है। जबकि नियम है कि संसद सत्र के दौरान सदन में एक का उससे ज्यादा मंत्री का होना अनिवार्य होता है। इसके लिए बारी-बारी से मंत्रियों की डयूटी भी लगाई जाती है। वैसे सांसदों और मंत्रियों को खुद इस बारे में सोचने की जरूरत है। उन्हें कोई सदन में मौजूदगी के लिए टोके या नाखुशी जताए, यह अच्छी बात नहीं है। लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च संस्था है। इसके प्रति लापरवाही, अनदेखी या अरुचि दिखाना अच्छे जनप्रतिनिधियों का लक्षण नहीं हैं। दूसरों के लिए नियम-कानून बनाने वाले, अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले सांसद और विधायक ही अगर अनुशासित नहीं होंगे तो यह लोकतंत्र के साथ मजाक ही माना जाएगा। सांसदों को यह भी भान होना चाहिए कि सत्र चलने के दौरान प्रति सांसद सरकार का करीब 2,70,000 रुपया खर्च होता है। वहीं हर मिनट सत्र की कार्यवाही में सरकार का 2,50,000 रुपया खर्च होता है। जब इतना कुछ खर्च हो रहा हो तो जिम्मेदार जनप्रतिनिधि के तौर पर सांसद भी अपनी जवाबदेही दिखाएं। सदन की समझ हर किसी के लिए जरूरी है। सत्र कैसे चलते हैं, सवाल-जवाब का दौर कैसे होता है, किस नियम के तहत क्या कार्यवाही अमल में लाई जाती है आदि का ज्ञान होना संसदीय जीवन यात्रा के लिए बेहद फायदेमंद है। इसलिए इसके प्रति बेरुखी का भाव सांसदों के लिए अच्छा भाव नहीं प्रदर्शित करता है। मोदी का सदन में अनुपस्थित मंत्रियों की सूची मांगने और सख्त रुख दिखाने से कुछ बदलाव की उम्मीद तो है, इसके लिए हो सके तो सरकार सत्र के दौरान सांसदों-मंत्रियों की अनिवार्य उपस्थिति का नियम बनाए। हर बार नाराजगी जताने से बेहतर होगा कि सरकार के स्तर पर अनुशासन को बनाए रखने के लिए कुछ कड़े नियम भी बनाए जाएं।

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