15-10-2019 (Newspaper Clippings)

CategoriesNews Clipping

वोट सरकार को दीजिए पर संकट में कोसिए प्रकृति को

बिहार अतिवृष्टि के संकट से जूझ रहा है। राजधानी पटना में जल-जमाव के कारण डेंगू और अनेक जल-जनित बीमारियां महामारी बन रही हैं। संकट में सरकारी रवैये को लेकर मीडिया या केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के सवालों पर मुख्यमंत्री निर्विकार भाव छोड़कर आक्रामक हो गए हैं।

उनके तीन प्रति-प्रश्न हैं : क्या सरकार पर सवाल खड़ा करने वाले यह जानते हैं कि यह प्राकृतिक आपदा है; दूसरा, क्या ऐसे लोगों को पटना की भौगोलीय स्थिति का ज्ञान है; और तीसरा, क्या यही सवाल दिल्ली और मुंबई के जल-भराव को लेकरपूछा जा रहा है?

अपराध-न्यायशास्त्र का एक मशहूर तर्क-दोष माना जाता है– सवाल के जवाब में सवाल पूछना। नीतीश कुमार अदालत में वर्जित उसी दोष का सहारा ले रहे हैं। पानी बरसाना तो भगवान का काम है, लेकिन अवांछित पानी निकालना मनुष्य का। खासकर उस मनुष्य या मनुष्य-समूह का जो चुनाव में यह काम करने का वादा करके वोट लेता है।

राज यह खुला कि पटना के ड्रेनेज का नक्शा न तो नगर निगम के पास है, न ही राज्य सरकार के शहरी विकास के पास। मुख्यमंत्री से कहा जा सकता है कि दिल्ली और मुंबई में एक ही दल के 15 साल सत्ता में न रहने के बावजूद नक्शे अपनी जगह पर हैं और यह भी कि ड्रेनेज का नक्शा पूरी दुनिया में भगवान ने कहीं नहीं बनाया। लेकिन इसके बाद शुरू हुआ विभाग-दर-विभाग आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला।

क्या मुख्यमंत्री से यह पूछा जा सकता है कि जब नक्शा ही नहीं है तो ड्रेनेज की सफाई इन 15 सालों में कैसे की जाती थी। तेजी से जल-निकासी के काम के लिए बना कंकरबाग सम्प हाउस इसलिए नहीं चल पाया कि ट्रांसफार्मर महीनों से काम नहीं कर रहा था। कोई ताज्जुब नहीं कि अब शहरी विकास मंत्री बिजली मंत्रालय को भी लपेट लें।

उधर मौसम विभाग पर भी आरोप है कि उसने बारिश का सही पूर्वानुमान नहीं दिया। क्या यह सब सही होता तो नक्शा मिल जाता और सारे 39 सम्प काम करने लगते? सत्ता में अधिक दिन रहने पर राजनीतिक वर्ग राग, द्वेष, भय, मोह से मुक्त हो जाता है तभी तो मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से 163 बच्चों की मौत के बाद सरकार ने निर्विकार भाव से ठीकरा बेजान लीची पर फोड़ दिया। अबकि बार भगवान की बारी थी। लीची और भगवान दोनों ही मतदाता नहीं हैं।

स्रोत –  दैनिक भास्कर

बाजार को है विश्व के ताकतवर शासकों से लगाव

वॉल स्ट्रीट में लंबे समय से एक ऐसे समानांतर विश्व की मौजूदगी है, जहां आलोचकों द्वारा मीडिया में विलेन जैसे पेश किए जाने वाले वे नेता हीरो होते हैं, जिनके काम अर्थव्यवस्था के लिए मददगार होते हैं। आलोचकों की नज़र में आज हम बहुत ही अनुदार युग में जी रहे हैं, जहां खतरनाक और अस्थिर नेताओं की भरमार है। इसके प्रमुख उदाहरण ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो हैं, जिन्होंने अमेजन के जंगलों में लगी आग पर आंख मूंदने के आरोपों पर पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र में अपनी सरकार का जमकर बचाव किया। दूसरे मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी हैं, जिनकी सैन्य समर्थित सरकार के खिलाफ पिछले हफ्ते कई प्रदर्शन हुए हैं। तीसरे सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान हैं, जिनकी पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या करवाने के लिए व्यापक आलोचना हो रही है।

इसके बावजूद वैश्विक निवेशक इन तीनों को ही भरोसेमंद आर्थिक सुधारकों के रूप में देखते हैं। बाजार भी उन्हें इसके मुताबिक पुरस्कृत करता है। बोलसोनारो के शासन में ब्राजील और युवराज सलमान के नेतृत्व में सऊदी अरब दुनिया के सबसे तेज शेयर बाजारों की श्रेणी में आ गए हैं। बीते हफ्ते तक मिस्र इस साल का सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला मार्केट रहा है। कटु वास्तविकता यह है कि बाजार अनैतिक है आैर मामूली वजहों से भी इन क्षत्रपों की क्रूरता और ज्यादतियां को नज़रअंदाज कर सकता है। इन क्षत्रपों को विधायिका या न्यायपालिका से कोई चुनौती नहीं मिलती, वे स्वतंत्र प्रेक्षकों की भी बहुत परवाह नहीं करते, इसलिए बिना किसी दबाव के भारी-भरकम सुधार लागू कर सकते हैं।

जब मैंने 150 विकासशील देशों के 1950 से अब तक के रिकॉर्ड पर नज़र डाली तो पाया कि 43 देश ऐसे थे, जिनकी अर्थव्यवस्था की विकास दर पिछले एक दशक से लगातार सात फीसदी या उससे अधिक बनी हुई थी। आपको आश्चर्य होगा के इनमें से 80 फीसदी यानी 35 देशों में ऐसे ही दंबंग शासकों की सरकारें थीं। इसका एक दूसरा पक्ष भी है। इन्हीं 150 देशों में से 138 देश ऐसे थे, जिनकी अर्थव्यवस्था एक दशक तक सिर्फ तीन फीसदी की दर से बढ़ रही थी और इनमें से भी 100 देशों में दबंग शासक थे। कहने का आशय यह है कि ये दबंग शासक जहां तेज आर्थिक प्रगति की वजह हैं वहीं कई बार मंदी के कारक भी रहे हैं। बाजार इन क्षत्रपों द्वारा संचालित अर्थव्यवस्थाओं की अस्थिर प्रकृति को अच्छी तरह समझता है। वह तब तक ही इनमें खुलकर निवेश करता है, जब तक ये अपनी गति बरकरार रखते हैं। 1970, 1980 और 1990 के दशकों में चिली के अगस्तो पिनोचेत, इंडोनेशिया के सुहार्तो और मलेशिया के महातिर मोहम्मद की उच्च विकास दर वाली नीतियों की वजह से वहां स्टॉक मार्केट लगातार तेजी पर रहा।

2000 के बाद बाजार के प्रिय दबंगोें की नई पीढ़ी का उदय हुआ। इनका नेतृत्व रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन कर रहे हैं। इन दाेनों के पहले शासनकाल में रूस और तुर्की का स्टॉक मार्केट तेजी से बढ़ा, लेकिन बाद में निवेशकों ने यहां से मुंह मोड़ लिया। इसकी वजह इन नेताओं का अधिक सत्तावादी होना नहीं था, बल्कि उन्होंने कड़े अार्थिक सुधारों को आगे बढ़ाना बंद कर दिया था। कहने के मतलब यह है कि ठोस आर्थिक विकास के लिए वित्तीय स्थिरता सबसे जरूरी है। बोलसोनारो, सिसी या सलमान के बीच कई मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उन्हांेने वित्तीय स्थिरता को बनाए रखा है। बोलसोनारो ने न केवल अफसरशाही का आकार कम किया है, बल्कि सरकारी कंपनियों के विनिवेश के साथ ही पेंशन में भी 250 अरब डॉलर की कटौती कर ब्राजील को दिवालिया होने से बचा लिया। एेसे ही सिसी ने आईएमएफ की मदद पाने के लिए कैपिटल गेन्स और अमीरों पर टैक्स बढ़ाने के साथ ही ऊर्जा सब्सिडी की 60 फीसदी घटा दिया। सलमान ने भी अमीरी टैक्स की चोरी करने वालों पर कार्रवाई के साथ ही बिक्री कर में बढ़ोतरी की और ऊर्जा सब्सिडी में कटौती करके बजट घाटे को कम किया।

ब्राजील, मिस्र और सऊदी अरब पर वाल स्ट्रीट की रिसर्च रिपोर्ट में शायद ही इन देशों की सत्तावादी प्रवृत्ति का जिक्र हो। इसके बजाय इसमें कहा जाता है कि सऊदी अरब में सुधार अब भी पटरी पर हैं, मिस्र क्षेत्र की अर्थव्यस्था में सुधार का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है और बाजार ब्राजील की अर्थव्यवस्था में सुधार के बोलसोनारों के प्रयासों को देख रहा है। इन नए क्षत्रपों की एक विशेषता वैचारिक लाइन से हटना भी है। संकुचित राजनीति कई बार उदार अर्थशास्त्र से ऐसे जुड़ जाती है कि इससे परंपरागत वाम-दक्षिण राजनीति के दायरे में लाना कठिन हो जाता है। ब्लू कॉलर नौकरियों और अमीरों के लिए टैक्स कम करने के चैंपियन माने जाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसके उदाहरण हैं। उन्हांंेने किसी भी अन्य अमेरिकी राष्ट्रपति की तुलना में स्टाॅक मार्केट काे संतुष्ट करने की अधिक कोशिश की है। जैसे-जैसे महाभियोग की लड़ाई तेज होगी, वे और तेजी से ऐसा करने के साथ ही चीन के साथ जल्द व्यापार डील करने या फेडरल रिजर्व पर ब्याज दरें घटाने का दबाव डालेंगे।

यह कोई संयोग नहीं है कि बोलसोनारो, सिसी और सलमान के प्रशंसक हैं ट्रम्प। सलमान ने जहां आर्थिक आधुनिकीकरण अभियान के तहत महिलाओं को ड्राइव करने की अनुमति दी, वहीं महिलाओं को व्यापक अधिकार देने की मांग कर रहे प्रदर्शनों को सख्ती से कुचल दिया। क्या वे वाम या दक्षिणपंथी हैं, प्रगतिवादी या प्रतिक्रयावादी हैं या इन पुरानी श्रेणियों से अलग हैं? ऐसा नहीं है कि वॉल स्ट्रीट के लोग खुद अनैतिक हैं या इन क्षत्रपों की ज्यादतियाें की प्रशंसा करते हैं। उनका काम है कि वे ऐसे दबंग शासकों को क्रूर व विलेन बताने वाली हेडलाइनों पर ध्यान देने की बजाय विकास दर को बढ़ाने वाली उनकी नीतियों पर फोकस करें। इसीलिए बाजार ऐसे शासकों की तब तक परवाह नहीं करता जब तक उनका व्यवहार अर्थव्यवस्था को अस्थिर न करने लगे। और दुनियाभर में बढ़ रहे अनुदार नेताओं के बीच लगता है कि एेसे और कई क्षत्रप उत्पन्न हो सकते हैं, जिनसे बाजार को लगाव हो।

स्रोत –  दैनिक भास्कर

चीन की चाहत और रवैया

चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के ठीक पहले चीन की ओर से यह कहा जाना उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली और इस्लामाबाद को कश्मीर मसले का समाधान आपसी बातचीत के जरिये करना चाहिए, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि यह वही चीन है जो कुछ समय पहले तक इस मामले में पाकिस्तान की भाषा बोल रहा था। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले पर चीन ने न केवल आपत्ति जताई, बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को इसके लिए बाध्य किया कि वह इसका संज्ञान ले। हालांकि ऐसा नहीं हुआ, लेकिन कश्मीर मसले पर चीन की ओर से पाकिस्तान की जैसी खुली तरफदारी की गई उससे भारत में खटास ही पैदा हुई।

यह कहना कठिन है कि चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा इस खटास को कम करने का काम कर सकेगी, क्योंकि चीन अपने प्रति जैसे व्यवहार की अपेक्षा रख रहा है वैसे व्यवहार का परिचय देने से इन्कार कर रहा है। वह अरुणाचल प्रदेश को लेकर अपनी निराधार आपत्तियों से तो भारत को परेशान करता ही है, इस सवाल का जवाब देने से भी इन्कार करता है कि आखिर उसकी ओर से गुलाम कश्मीर यानी पाकिस्तान अधिकृत भारतीय भू-भाग में आर्थिक गलियारे का निर्माण किस हैसियत से कर रहा है?

चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कुछ मसलों पर सहमति कायम हो सकती है, लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं। जरूरत इस बात की है कि सहमति के इस दायरे को बढ़ाया जाए। इसी के साथ आपसी भरोसे की कमी को प्राथमिकता के आधार पर दूर करने की भी जरूरत है। भरोसे की इस कमी को दूर करने में एक बड़ी बाधा सीमा विवाद पर न के बराबर प्रगति होना है। सीमा विवाद सुलझाने को लेकर बातचीत का सिलसिला जरूरत से ज्यादा लंबा खिंचने के कारण यह लगने लगा है कि चीन इस विवाद के समाधान का इच्छुक ही नहीं।

सच्चाई जो भी हो, चीन को यह समझना होगा कि भारतीय हितों की अनदेखी करके आपसी संबंधों को मजबूती नहीं दी जा सकती। यह सही है कि भारत और चीन के बीच असहमति वाले विभिन्न मसलों का समाधान रातोंरात नहीं हो सकता, लेकिन अगर र्बींजग इस्लामाबाद को भारत के खिलाफ एक मोहरे की तरह इस्तेमाल करेगा तो फिर नई दिल्ली को दूसरे समीकरणों पर विचार करना ही होगा।

चीन एशिया में अपनी ही चलाना चाहेगा तो मुश्किल होगी ही। यदि चीनी नेतृत्व सचमुच भारत से संबंधों में सुधार चाहता है तो उसे भारतीय हितों की अनदेखी करने वाले अपने रवैये का परित्याग करना ही होगा। उसे यह समझ आए तो बेहतर कि दोनों देश मिलकर साथ-साथ तरक्की कर सकते है।

स्रोत –  नई दुनिया

सुस्ती दूर करने के सही कदम

विवेक कौल

अब यह मानने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि देश आर्थिक सुस्ती के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में एक प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने पिछले महीने कहा था कि निवेश आर्थिक विकास और उपभोग का प्रमुख संचालक है। यहां तर्क सीधा है। निवेश से रोजगार सृजित होते हैं। ये नौकरियां लोगों को आय प्रदान करती हैं। लोग इस पैसे को खर्च करते हैं और यह उपभोग को बढ़ावा देता है। इससे अन्य लोगों को भी आय अर्जित करने में मदद मिलती है। ये लोग भी पैसा खर्च करके खपत के लिए एक और विकल्प प्रदान करते हैं। इस तरह यह पूरा चक्र काम करते हुए आर्थिक गतिविधियों को गति देता है। समस्या यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत कम निवेश हो रहा है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी का डाटा बताता है कि अप्रैल से जून 2019 के दौरान घोषित नई परियोजनाओं का स्तर 15 साल में सबसे निचले स्तर पर आ गया था। अगर जुलाई से सितंबर 2019 के बीच के आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति में थोड़ा सा सुधार तो जरूर हुआ है, लेकिन यह न के बराबर यानी नाकाफी ही कहा जाएगा।

वर्ष 2007-2008 में 35.8 प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद, पिछले चार वर्षों से निवेश एवं सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात (निवेश-जीडीपी अनुपात) 28-29 प्रतिशत पर स्थिर रहा है। निवेश में ऐसी सुस्ती को देखते हुए आय पहले की तरह नहीं बढ़ रही है। यदि हम 2004 और 2014 के बीच प्रति व्यक्ति आय देखें तो यह प्रत्येक वर्ष में दो अंकों में बढ़ी थी। वर्ष 2016-2017 को छोड़कर इसकी वृद्धि एकल अंक में सिमट गई है। इस दौरान केवल 2016-2017 में ही प्रति व्यक्ति आय 10.2 प्रतिशत बढ़ी थी। यदि हम पुरुषों के लिए ग्रामीण मजदूरी के बढ़ने की दर को देखें तो यह 2008-2009 और 2014-2015 के बीच बड़े पैमाने पर उछली थी। 2013-2014 में मजदूरी की दर में तकरीबन 28 प्रतिशत की तेजी आई। तब से इसमें बढ़ोतरी एकल अंक में रह गई है। वर्ष 2018-19 में यह केवल 3.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी। यह दर केवल निवेश की कमी से ही नहीं गिरी है। जब महिला श्रमिकों की बात आती है तो 2008-2009 और 2014-2015 के बीच ग्रामीण मजदूरी में भारी वृद्धि हुई। 2013-2014 में मजदूरी 25.3 प्रतिशत बढ़ी थी। तब से 2018-2019 के दौरान मजदूरी दर में बढ़ोतरी एकल अंक में हुई है। वर्ष 2018-2019 में मजदूरी में वृद्धि महज छह प्रतिशत रही थी। यह कम खाद्य मुद्रास्फीति का दूसरा पक्ष है। आखिर इस स्थिति से बाहर निकलने का क्या तरीका है?

इसमें संदेह नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक निवेश की आवश्यकता है, मगर कारोबारी तभी निवेश करते हैं, जब उन्हें मुनाफे की उम्मीद दिखती है। फिलहाल पस्त पड़ी उपभोक्ता मांग के चलते कारोबारियों को ऐसा महसूस नहीं हो रहा। इसके अलावा भारतीय कारोबारी अभी भी अपनी मौजूदा उत्पादन क्षमता का पूरी तरह उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इस परिदृश्य में उनके निवेश और विस्तार करने की संभावना कम है। कई कारोबारी कर्ज चुकाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसीलिए और अधिक कर्ज लेकर निवेश और विस्तार करना फिलहाल उनके बस की बात नहीं दिखती।

निवेश को प्रोत्साहित करना जरूरी है, मगर हाल-फिलहाल यह अधिक महत्वपूर्ण है कि उपभोक्ता मांग को कैसे पटरी पर लाया जाए? जब तक उपभोक्ता मांग में वृद्धि नहीं होगी, तब तक अधिकांश निजी कंपनियां निवेश करने से हिचकती रहेंगी। इसलिए अगर सरकार ने कॉरपोरेट कर की दर में कटौती के बजाय व्यक्तिगत आयकर में कटौती की होती, तो जरूर कुछ बात बनती।

कॉरपोरेट करों में कटौती के समर्थन में एक तर्क यह दिया गया कि उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए कंपनियां कीमतों में कटौती करेंगी। चलिए इस विकल्प की तुलना व्यक्तिगत आयकर में कटौती के विकल्प से करते हैं। यदि व्यक्तिगत आयकर में कटौती होती तो बचत सीधे उपभोक्ता के हाथों में जाती और फिर वे यह तय कर सकते कि इसके साथ क्या करना है? मसलन, इसे खर्च करना है या बचाना है? कॉरपोरेट कर कटौती के मामले में यह तय नहीं है कि कंपनियां अपने सामान या सेवाओं की कीमत में कटौती करेंगी या नहीं? चूंकि उपभोक्ता अपने खर्च का निर्णय करने के लिए कंपनियों के अगले कदम पर निर्भर हैं, इसलिए यह देखना होगा कि उपभोक्ता खर्च बढ़ाने के लिए कौन सा विकल्प बेहतर है।

नि:संदेह वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी का सरलीकरण भी उपभोग को प्रोत्साहित करेगा। इससे खासतौर से छोटे कारोबारियों को भी बहुत मदद मिलेगी। यह भी मशविरा दिया जा रहा है कि सरकार को ही अपना खर्च बढ़ाना चाहिए। भारतीय संदर्भ में फिलहाल यह सलाह कैसे लागू हो सकती है, इस पर भी गौर करते हैं। 2017-2018 और 2018-2019 में कुल सरकारी व्यय क्रमश: 15 प्रतिशत और 9.3 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा मुद्रास्फीति समायोजन के साथ है। इसी अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था क्रमश: 7.2 प्रतिशत और 6.8 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ी। यदि हम अप्रैल और जून 2019 के बीच की अवधि को देखें तो भारतीय अर्थव्यवस्था में पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई, निजी उपभोग व्यय में केवल 3.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि सरकारी व्यय में 8.9 प्रतिशत का इजाफा हुआ। स्पष्ट है कि पिछले कुछ वर्षों में सरकारी व्यय ने ही विकास को गति दी है, यानी आर्थिक विकास को गति देने के लिए सरकार पहले ही बहुत पैसा खर्च कर रही है।

अगर सरकार और भी ज्यादा खर्च करती है तो उसे और अधिक उधार लेना पड़ेगा, क्योंकि कर संग्रह के मोर्चे पर तस्वीर बहुत अच्छी नहीं लग रही है। अप्रैल और अगस्त 2019 के बीच सकल कर राजस्व में केवल 4.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सरकार ने बजट में जितने खर्च के लिए प्रावधान किया है, उसकी पूर्ति के लिए राजस्व में 18.3 प्रतिशत की वृद्धि करनी होगी। अगर सरकार ज्यादा उधार लेगी तो ब्याज दरें भी ऊपर जा सकती हैं। यहां एक तरीका यह हो सकता है कि सरकारी कंपनियों और उनकी जमीनों को तेजी से बेचा जाए और उस पैसे को राष्ट्रीय निवेश कोष में डाला जाए। फिर इसका उपयोग बुनियादी ढांचे के विस्तार में किया जाए। यह सब कहना आसान है, लेकिन इसे मूर्त रूप देना उतना ही मुश्किल। सरकारी कंपनियों के जल्द विनिवेश का अर्थ यथास्थिति को बदलना होगा और इतिहास गवाह है कि सरकारें ऐसा करने से बचती रही हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था की गाड़ी का पहिया इसी गड्ढे में अटका हुआ है। इससे बाहर निकलना आसान नहीं होगा।

स्रोत –  नई दुनिया

About the author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *