14-11-2019 (Newspaper Clippings)

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अवज्ञा की परिणति

विजय शंकर सिंह, (लेखक सेवानिवृत्त आईपीएस हैं)

दिल्ली में साकेत के पास मोटरसाइकिल से वर्दी में जा रहे पुलिस के एक सिपाही को कुछ वकीलों द्वारा अनायास पीटने की घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो के अनुसार, सिपाही अकेला जा रहा था और वकील उसे पीट रहे थे। सिपाही ने सब्र रखना बेहतर समझा। सिपाही अकेला न होता या उसके पास कोई हथियार होता तो हो सकता है कि तीसहजारी जैसी कोई घटना फिर घट जाती।इसमें दो राय नहीं कि वकील सत्ता के लिए एक दबाव समूह के रूप में पुलिस से अधिक उपयोगी हैं जबकि पुलिस सरकार का एक विभाग है-नियम कानून से बंधा, हजार बंदिशें। दिल्ली पुलिस के जवानों के धरने को अनुशासनहीनता की दृष्टि से कुछ मित्र देख सकते हैं पर मेरी राय थोड़ी अलग है। अनुशासन का यह कतई अर्थ नहीं है कि अपनी बात कही ही न जाए। इसका अर्थ यह भी है कि अपनी बात विभाग के आला अधिकारियों तक खुल कर कही जाए। जो आक्रोश अभिव्यक्त हो रहा है, उसका समाधान ढूंढा जाए। पुलिस विभाग को किसी फैक्ट्री या अन्य सरकारी विभागों की तरह देख कर समझने की कोशिश करेंगे तो नहीं समझ पाएंगे। इसे सेना या सशस्त्र बलों की तरह देख कर समझें। दिल्ली पुलिस में तीसहजारी अदालत के बाद उपजे असंतोष का बड़ा कारण यह है कि हाईकोर्ट ने बिना पुलिस का पक्ष जाने ही उनके साथियों का न केवल तबादला कर दिया बल्कि कुछ को निलंबित भी कर दिया। जब वे अपनी बात कहने पुलिस मुख्यालय पहुंचे तो पुलिस कमिश्नर भी उनसे मिलने, उनकी बात सुनने नहीं आए। पुलिसकर्मिंयों को लगा कि ऐसे नाजुक समय में उनके अफसर भी उनके साथ नहीं हैं। असंतोष और आक्रोश का यह तात्कालिक कारण था। घटना पर बार कॉउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष का बयान उनके पद के अनुरूप नहीं था। वकीलों का एक ग्रुप पुलिस मुख्यालय पहुंच कर यही कह देता कि हम अपने समूह में ऐसे कुछ लोगों, जो अनावश्यक विवाद पैदा करते हैं, के खिलाफ कार्यवाही करेंगे तो काफी हद तक समस्या सुलझ जाती। बीसीआई प्रमुख के बयान में मामले को हल करने लायक कोई बात नहीं थी। उन्होंने साकेत कोर्ट की घटना के बारे में भी कुछ नहीं कहा। मान लिया कि यह धरना न्यायिक जांच से बचने के लिए धरना है। उनका कहना था कि पुलिस अनुशासनहीनता कर रही है। यह तो जांच के पहले ही पुलिस को दोषी ठहराना हुआ। मॉब लिंचिंग की परंपरा से बहुत पहले ही कचहरियों में मुल्जिम के साथ, जो पेशी पर ले जाए जाते हैं, लिंचिंग की परंपरा कानून के जानकार व पैरोकार कहे जाने वाले वकीलों द्वारा शुरू की जा चुकी है। इस एलीट लिंचिंग से खबरें तो बनीं पर र्भत्सना न हुई, न मुकदमे कायम हुए और न जांच हुई। कुछ ने इसकी सराहना की तो कुछ ने औचित्यपूर्ण तक ठहरा दिया। कुछ ने तर्क दिया कि सजा हो न हो कम से कम यही सही। वैसे भी सजा कहां इतनी जल्दी मिलती है। यह सीधे-सीधे कानून को न मानने की पैरोकारी है। यह प्रवृत्ति हमें विधिपालक समाज के बजाय ऐसा समाज बना रही है जहां विधि की अवज्ञा ही समाज का स्थायी भाव बनता जा रहा है। आप इस पर समझौता कर बैठेंगे कि सजाएं चाहे वकीलों द्वारा कचहरियों में मारपीट कर के दी जाएं या पुलिस गैरकानूनी तरीकों से दे, कुछ हद तक उचित है तो वह हद कभी न कभी बेहद होगी ही। उसकी जद में आप-हम-सभी आ जाएंगे। कानून को कानूनी तरीके से ही लागू होने पर जोर दीजिए अन्यथा विधिविहीन और अराजक समाज की दस्तक सुनने के लिए तैयार रहिए। आये दिन वकीलों के कभी पुलिस तो कभी किसी सामान्य व्यक्ति के साथ मारपीट की खबरें आती रहती हैं। यह रोग तो अब हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। न्यायिक अधिकारियों से बात कीजिए तो वे भी इस उद्दंडता और गुंडई से दु:खी हैं पर कुछ कर नहीं पाते। कानपुर में वकीलों की अनिश्चितकालीन हड़ताल का आह्वान हुआ। कारण, वकीलों ने एक रेस्टोरेंट में जाकर मारपीट की और मौके पर पुलिस पहुंची से उलझ गए। मामले पर मुकदमा दर्ज हुआ तो हड़ताल कर दी। वकीलों का यह आचरण विधिविरु द्ध गिरोह की तरह ऐसे अवसर पर आचरण करता है। दिल्ली की घटना भीड़ हिंसा के प्रति नरम रुख रखने और उसे मौन सहमति देकर गुंडागर्दी का वातावरण बनाने का परिणाम है। यह एक मनोवृत्ति को जन्म दे रहा है, जो त्वरित न्याय के तौर पर खुद को ही फरियादी, और खुद को ही मुंसिफ के तौर पर समझ कर तदनुसार आचरण कर रही है। यह मनोवृत्ति प्रतिशोध की है। अपराध और दंड का दशर्न प्रतिशोध की बात नहीं करता। वह कानून के दंड की बात करता है। अपराधी को दंड देना किसी भी प्रकार का बदला लेना नहीं है। वह एक न्यायिक प्रक्रिया है जिसके अंग वकील भी हैं, और पुलिस भी। पर लगता है हम एक अधीर, उद्दंड और जिद्दी समाज में बदलते जा रहे हैं। जिसके पास संख्याबल और शारीरिक ताकत मौके पर होगी वह अपने विरोधी से सड़क पर निपट लेगा और कुछ इसका औचित्य भी ढूंढ लेंगे। जो पिटेगा वह भी मौका ढूंढेगा और बदला ले लेगा। नये और बिना काम के वकीलों में एक बात घर कर जाती है कि वे कानून और कानूनी प्रक्रिया के ऊपर हैं। बार काउंसिल व बार एसोशिएशन, दोनों को इस प्रवत्ति पर अंकुश लगाना होगा अन्यथा सबसे अधिक हानि वादकारियों की होगी। पुलिस में बहुत सी कमियां हैं पर कभी भी पुलिस ने एक समूह के रूप में जैसे दिल्ली पुलिस ने किया है, अपने विरु द्ध दर्ज भ्रष्टाचार या कदाचार के आरोपों में दंडित या कार्यवाही किए जाने पर सामूहिक विरोध प्रदशर्न नहीं किया। पुलिस को राजनैतिक दबाव से मुक्त करने और प्रोफेशनल की तरह से कानून लागू करने वाली संस्था बनाने के लिए पूर्व डीजी प्रकाश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ निर्देश भी दिए पर आज तक किसी सरकार ने कोई भी सक्रिय कार्यवाही नहीं की क्योंकि वे सुधार राजनीतिक आकाओं के हितों को प्रभावित करते हैं। मूल समस्या है कानून के प्रति बढ़ता अवज्ञा भाव। यही भाव सड़क पर वर्दी उतरवा देने की धमकी देता है, यही भाव यातायात उल्लंघन पर चेकिंग होने पर ईगो को आहत कर देता है, यही भाव कभी वकीलों को संक्रमित कर देता है तो कभी वर्दीधारी को, और यही भाव पुलिस सहित कानून लागू करने वाली सभी संस्थाओं का राजनीतिक आकाओं द्वारा दुरुपयोग कराता है। जब तक कानून की अवज्ञा का भाव समाज में हावी रहेगा तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। दिल्ली का तीसहजारी कांड न तो पहला है, और न ही अंतिम।

स्रोत–  राष्ट्रीय सहारा

गहराते बादल

टी. एन. नाइनन

अर्थव्यवस्था पर छाए संकट के बादल घने होते जा रहे हैं। मूडी ने भारत को लेकर अपनी रेटिंग में जो चेतावनी दी है वह पहले से कमजोर आर्थिक संभावनाओं में आ रहे और अधिक बदलाव को चिह्नित करना ही है। आमतौर पर रेटिंग एजेंसियां धीमी गति से प्रतिक्रिया देती हैं। पूर्वानुमान लगाने वालों में से अधिकांश ने यह आशा जताई थी कि जुलाई-सितंबर तिमाही के बाद अर्थव्यवस्था में मामूली सुधार दिखाई दे सकता है (भले ही आधार अवधि में बदलाव के कारण) लेकिन शायद ऐसा नहीं हो क्योंकि इस मंदी के अपने तमाम कारण हैं।

एक राजकोषीय संकट उत्पन्न हो रहा है जो वित्त आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद उजागर हो सकता है। खासतौर पर उस स्थिति में जब वह केंद्र सरकार के भारी-भरकम बकाया बिल, छिपे हुए व्यय, राजस्व में कमी तथा तमाम ऐसे कारणों से राज्यों की कर हिस्सेदारी वापस चाहता हो। सरकार वोट जुटाने के लिए नागरिकों के अनुकूल कार्यक्रमों पर व्यय कर रही है। इसकी शिकायत भला किससे की जाए। लेकिन वे कदम कहां हैं जिनकी बदौलत इनके लिए धन जुटाया जाएगा। पूंजी का या तो गलत तरीके से इस्तेमाल हो रहा है या उसे नष्ट किया जा रहा है। वित्तीय क्षेत्र डूब रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र ढेरों नकदी गड़प रहा है।

ताजा मामला दिवालिया दूरसंचार कंपनियों का है जो वेतन तक देने की स्थिति में नहीं हैं। रेलवे में ढेर सारी नकदी लगी है लेकिन आवाजाही या राजस्व के मोर्चे पर कोई खास बढ़ोतरी नजर नहीं आती। दिवालिया प्रक्रिया का किस्सा अलग ही है। गैर जवाबदेह किस्म के मुख्यमंत्री ऊर्जा अनुबंध रद्द करके पूंजी को नष्ट कर रहे हैं। विभिन्न क्षेत्रों का कुप्रबंधन करने वाले नियामक मसलन दूरसंचार क्षेत्र के नियामक आदि ने भी पूंजी को क्षति पहुंचाई है। सर्वोच्च न्यायालय भी ऐसे मामलों में कोई मदद नहीं कर पाया है। मूल बात यह है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि संभावनाएं अभी भी उच्च बचत और निवेश दर में निहित हैं लेकिन यदि निवेश की गई राशि बिना किसी सुराग के डूब जाए तो ऐसे में क्या कहा जा सकता है। अचल संपत्ति क्षेत्र की कहानी भी इससे अलग नहीं है।

सबसे बड़ी चिंता है आश्वस्त न होते हुए भी ऐसे आरोपों को नकारे जाने की। बड़े क्षेत्रीय कारोबारी समझौते से बाहर रहने का निर्णय भी शायद कोई विकल्प न होने की स्थिति में लिया गया। परंतु यह दर्शाना मूर्खतापूर्ण है कि यह साहसी नेतृत्व का उदाहरण है। जब बंगलादेश के पूर्व में स्थित हर देश इसमें शामिल हो और भारत नहीं तो यह बताता है कि गड़बड़ी भारत में ही है। यह बीते पांच साल में नेतृत्व की नाकामी दर्शाता है। यह सुधार की कमी है और बताता है कि हम सबसे बड़े और तेज विकसित होते क्षेत्र के साथ एकीकृत नहीं हो पाए।

पिछले मुक्त व्यापार समझौतों के भारत के पक्ष में कारगर नहीं होने को लेकर दी जा रही दलील गलत है, उनसे थोड़ा फर्क तो पड़ा। भारतीय बाजार में चीनी उत्पादों की भरमार हो जाने की आशंका वास्तविक हो सकती है और नहीं भी। लेकिन चीन के साथ व्यापार घाटा केवल आधी कहानी ही है, भारत का इस क्षेत्र के अमूमन हरेक देश के साथ बड़ा व्यापार घाटा है। ऑस्ट्रेलिया के लिए दरवाजे खोलने का मतलब कृषि क्षेत्र को खोलना है, न्यूजीलैंड के मामले में यह डेरी उद्योग है और आसियान देशों के मामले में दूसरे कृषि उत्पादों के लिए अपने दरवाजे खोलना है। ‘ऐक्टिंग ईस्ट’ के बजाय अपना तवज्जो ‘लुकिंग वेस्ट’ पर लाने के लिए अमेरिका के साथ व्यापार समझौते करने आसान नहीं होंगे, खासकर उस समय जब विश्व व्यापार संगठन में व्यापारिक विवादों पर शिकस्त मिल रही हो।

ऐसा कहा जा रहा है कि हम बाद में आरसेप का हिस्सा बन सकते हैं लेकिन घरेलू स्तर पर जीत दर्ज करने वाले लॉबी समूह संरक्षणवादी हैं तो वे सरकारी नीति-निर्माताओं पर अपना नियंत्रण क्यों कम कर देंगे? आयात शुल्कों में कटौती, कृषि उत्पादकता को दोगुना करने और बिजली दरों में क्रॉस सब्सिडी खत्म करने के लिए हमारी तैयारी की कार्ययोजना और समयसीमा कहां हैं? या संगठित रिटेलरों को हतोत्साहित होने पर क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखलाओं में घुसने की क्या तैयारी है? सरकार ने आयात शुल्क बढ़ा दिए हैं और एक डंपिंग-रोधी चैंपियन बन चुकी है। ऐसे में भारत पहले से अधिक अंतराभिमुख होता जा रहा है। सवाल यह है कि व्यवस्था कैसे खुल सकती है या अधिक प्रतिस्पद्र्धी हो सकती है? प्रतिस्पद्र्धी इकाइयों को वे लोग बाजार से निकाल बाहर कर दे रहे हैं जो प्रतिस्पद्र्धी नहीं हैं। पराजित ही जीत रहे हैं। पांच लाख करोड़ डॉलर की मंजिल की राह यह तो नहीं है।

स्रोत–  बिजनेस स्टैंडर्ड

पुलिस में कम महिलाएं होना संतुलन के लिए हानिकारक

देश की पुलिस फोर्स में महिलाओं की मौजूदगी आज भी सिर्फ 7% है। हाल ही में रिलीज इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2019 के मुताबिक पुलिस फोर्स में ऑफिसर स्तर पर तो केवल 6% महिलाएं हैं। यह उस समय जब राज्यों ने उनकी संख्या को हर साल 1% से बढ़ाने का वादा किया है। महिलाओं को 33% आरक्षण के लक्ष्य तक पहुंचने में इस हिसाब से दशकों लग जाएंगे। ये आंकड़े इसलिए अहम हैं क्योंकि महिलाओं का पुलिस में होना पुलिस की क्षमता को प्रभावित करता है। जरूरत है कि हमारी सरकारों को पुलिसिंग में महिलाओं की अहमियत याद दिलाई जाए और यह भी बताया जाए कि आरक्षण के 33% के लक्ष्य को पूरा करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। पुलिस सर्विस में समाज के हर तबके की नुमाइंदगी जरूरी है। फिर चाहे वह महिला-पुरुष हों या अलग-अलग धर्मों केे लोग। किसी एक समुदाय या जेंडर का वर्चस्व पुलिस के कामकाज से जुड़े संतुलन के लिए खतरनाक है। ऐसा होना महिलाओं और बच्चों के साथ न्याय की संभावना को भी कमजोर करता है। संयुक्त राष्ट्र के 39 देशों के आंकड़ों के मुताबिक पुलिस में महिलाओं के होने का सीधा और सकारात्मक असर महिलाओं के खिलाफ दुष्कर्म के मामलों की शिकायतों और ऐसे गुनाहों के अपराधियों के खिलाफ सजा पर पड़ता है। स्टडी के मुताबिक, महिलाओं का होना पुलिस थानों के माहौल पर भी अच्छा प्रभाव डालता है। महिला पुलिस शारीरिक सख्ती का इस्तेमाल कम करती हैं और कम्युनिकेशन की बदौलत हिंसक हालात से निपट लेती हैं। यही वजह है कि उनके रहते पुलिस की दरिंदगी जैसे मामले कम होते हैं। यह संभव होगा जब इस पर भी ध्यान दिया जाए कि जो महिलाएं पुलिस फोर्स में हैं वह नौकरी छोड़कर न जाएं। चौंकाने वाली बात है कि देश में सभी सरकारी नौकरियों में पुलिस की नौकरी छोड़कर जाने वाली महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है। इसलिए जो सबसे जरूरी है कि पुलिस फोर्स को महिलाओं के लायक बनाया जाए। पुलिस स्टेशन में कम से कम उनके लिए अलग शौचालय बनें। उनकी ड्यूटी को 100 नंबर पर आने वाले फोन का जवाब देने, एंट्री करने और महिला बटालियन-यूनिट संभालने तक सीमित न किया जाए। महिलाओं के लिए सुरक्षित देश को जरूरत है सशक्त और समर्थ महिला पुलिस की जिसके लिए लक्ष्य सिर्फ आरक्षण का आंकड़ा पूरा करना न हो।

स्रोत–  दैनिक भास्कर

साइबर लोक से विस्तार पा रही लोकसंस्कृति

बद्री नारायण, (निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान)

जैसे ही लोकगायक शब्द हमारे सामने आता है, मन में एक छवि बनती है- गांवों-चौपालों, खेत-खलिहानों में लोकगीत गाते गायकों की, लेकिन अब यह छवि बदल रही है। टीवी चैनलों पर होने वाली गायन प्रतियोगिताओं में ये लोकगायक आपको गाते हुए दिख जाएंगे। लाखों लोग यू-ट्यूब पर इनके गीतों के चैनल को सबस्क्राइब करने लगे हैं। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे सोशल साइट्स पर ये लोकगायक संवाद करते हुए मिलते हैं। वैसे तो, ऑडियो कंपनियां पिछले 30-40 वर्षों से भोजपुरी, अवधी, ब्रज, मैथिली, मगही आदि के लोकगायकों के गीतों के एलबम बनाती रही हैं, मगर अब इनके गीत यू-ट्यूब के माध्यम से खूब सुने-सराहे जा रहे हैं। ब्रज, भोजपुरी, मगही, अवधी के लोकगायकों का एक अपना साइबर लोक बनता जा रहा है।

इन लोकभाषाओं से जुडे़ लोग प्रवास, नौकरी, व्यापार और भूमंडलीकरण के विस्तार के कारण पूरी दुनिया में फैले हैं। ऐसे लोग जहां कहीं भी हैं, साइबर लोक के जरिए इन लोकगीतों को सुन अपनी जड़ों की संस्कृति का एहसास करते हैं। पूरबी तान, छठ-गीत, झूमर, भजन, बारहमासी, राधा-कृष्ण के गीत, कबीर-रविदास के लोक भजन आदि के जरिए अपनी माटी का भावनात्मक स्पर्श महसूस करते हैं। साफ है, जिन गायकों के सुरों की दुनिया एक खास क्षेत्र, राज्य, और देश की सीमाओं में बंधी हुई थी, वह आधुनिक तकनीक, स्मार्टफोन और इंटरनेट की दुनिया से जुड़कर वैश्विक होती जा रही है। इनका श्रोता समूह किसी एक क्षेत्र में नहीं बंधा है, बल्कि वह वैश्विक हो चुका है। गांवों, खेत-खलिहानों और क्षेत्रीय सीमाओं के बाहर इनकी शोहरत का प्रसार यूं तो आकाशवाणी और दूरदर्शन के जरिए ही शुरू हो गया था, किंतु ऑडियो कंपनियों के विकास के साथ 80 से 90 के दशक में इनके श्रोताओं का दायरा तेजी से बढ़ा।

खासकर टी सीरीज को इसका बड़ा श्रेय जाता है। फिर 90 के दशक में देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के साथ जब निजी चैनलों की संख्या बढ़ी, तो महुआ जैसे भोजपुरी के राष्ट्रीय चैनल भी विकसित हुए। छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी फिल्म उद्योगों के विकास के साथ लोकगायकों और इनकी गायन शैलियों की दुनिया भी व्यापक व प्रभावी हुई। इनके विकास क्रम का एक सुखद पहलू यह भी है कि लोकगायक गायन के साथ ही भाषायी फिल्मों में नायक की भूमिका भी निभाने लगे। इस तरह, गायक के साथ-साथ इनकी छवि नायक की भी बनने लगी। जिन लोक भाषाओं की फिल्म इंडस्ट्र्री अभी विकसित नहीं हुई है, उनके वीडियो बनने लगे हैं। इन वीडियो एलबम में भी गायक ही नायक की भूमिका में होते हैं। गायक के रूप में प्रसिद्धि और नायक के रूप में दृश्यांकन के कारण कई लोकगायकों को अपने-अपने क्षेत्र में सांस्कृतिक नायक के रूप में देखा जाने लगा। इनकी लोकप्रियता को देखते हुए राजनीतिक दलों ने भी इन्हें अहमियत देना शुरू कर दिया। मनोज तिवारी, हंसराज हंस, प्रहलाद सिंह टिपाणिया, निरहुआ, सपना चौधरी आदि लोक गायकी के रास्ते ही राजनीति में आए हैं।

इन गायकों ने अपनी आंचलिक लोक-संस्कृति की प्रचलित कथाओं में समय के अनुसार परिवर्तन भी किए। आज के नौजवानों की रुचि, उनके संघर्ष कई बार इनके गीतों में बयां होते हैं। कई बार वे धुन तो पारंपरिक उठाते हैं, मगर उन पर नए समय की कथाएं बुनते हैं। इन लोकगायक-गायिकाओं ने जो अपना लोक रचा है, उनका आधार ग्रामीण लोक-संस्कृति है। स्मार्टफोन पर सस्ती हो रही इंटरनेट-सुविधाओं के साथ यह संस्कृति अब गांवों में यू-टयूब, रिंग टोन और अनेक सोशल साइट्स के माध्यम से ग्रामीण नौजवानों की लोक चेतना का हिस्सा बन रही है। लोक-संस्कृतियों से संगीत के नए बाजार का संबंध दोतरफा रहा है। एक तरफ, बाजार ग्रामीण लोक-संस्कृति की सांस्कृतिक शक्ति पर बनते, विकसित होते और खडे़ होते हैं, तो दूसरी ओर नई निर्मित हो रही लोक-संस्कृति पारंपरिक लोक-संस्कृति, लोक चेतना को प्रभावित भी करती है। साफ है, आधुनिकता, नई तकनीक और नए बाजार ने हमारी लोक-संस्कृतियों के मूल रूप को तो बदला है, पर इनमें काफी कुछ जोड़ा भी है। इन्हें नए ढंग से बन रहे संगीत के बाजार के उपयुक्त तो किया है, लेकिन इनकी प्रासंगिकता का प्रसार भी किया है।

स्रोत–  हिंदुस्तान

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