13-10-2019 (Newspaper Clippings)

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बिगड़ते पर्यावरण को बचाने की चुनौती

संजय गुप्त, (लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)

पटना में आई भीषण बाढ़ ने जहां शहरी आधारभूत ढांचे की पोल खोल दी वहीं यह भी साफ कर दिया कि तेजी से बिगड़ता पर्यावरण गंभीर समस्याएं पैदा कर रहा है। जब बारिश और बाढ़ से पटना के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में जलप्रलय की स्थिति है तब देश के कुछ हिस्सों में सूखे जैसे हालात है। पिछले एक दशक में देश-दुनिया में तमाम स्थानों पर जरूरत से ज्यादा बारिश के कारण जान-माल की व्यापक क्षति हुई है। इसी दौरान यूरोपीय देशों में गर्मी के रिकॉर्ड भी टूटे हैं।

पिछले वर्ष केरल में बारिश से हुई तबाही को हम भूल नहीं सकते। वहां अगस्त के शुरुआती 19 दिनों में ही 758.6 मिलीमीटर बारिश हुई जो सामान्य से 164 फीसद अधिक थी। इसके चलते जो बाढ़ आई उसमें तीन सौ से अधिक लोगों की जान गई। जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल लगातार गर्म हो रहा है और इसके चलते अंटार्कटिका के साथ ग्रीनलैंड में मौजूद बर्फ की चादर तेजी से पिघल रही है।

अनुमान है कि 2050 तक अधिकांश ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे। इनमें हिमालयी ग्लेशियर भी शामिल हैं। यह भारत के लिए एक बड़ी विपदा का संकेत है। हमें इसे लेकर चेतना ही होगा कि जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी असर ने भारत की दहलीज पर दस्तक दे दी है। दुखद यह है कि अब भी हमारे कार्य व्यवहार पर यथास्थितिवाद हावी दिख रहा है।

जलवायु परिवर्तन के मुख्य कारक प्रदूषण के मुद्दे पर नीति निर्माताओं ने गंभीरता तो दिखाई, पर अभी उसके अपेक्षित नतीजे नहीं दिखे हैै। इसका कारण समाज में जागरूकता की कमी है। यदि प्राकृतिक संपदा और पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारी उदासीनता दूर नहीं हुई तो भविष्य भयावह हो सकता है। चूंकि आजकल जोर लोकलुभावन नीतियों पर है इसलिए पर्यावरण की दशा सुधारने के लिए सख्त फैसले नहीं लिए जा रहे हैैं।

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फसलीय अवशेष यानी पराली जलाए जाने से सर्दियों के मौसम में वायुमंडल बुरी तरह प्रदूषित हो जाता है। सब इससे परिचित हैं कि पराली जलने से बड़ी मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइड के साथ अन्य विषैले गैसों का उत्सर्जन होता है, लेकिन उस पर रोक नहीं लग पा रही है। पराली जलाने की समस्या आज की नहीं, दशकों पुरानी है।

राजनीतिक कारणों से न तो हरियाणा सरकार ने किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए जरूरी कदम उठाना जरूरी समझा और न ही पंजाब सरकार ने। वे शुतुरमुर्गी रवैया अपनाए रहीं। जब इसके खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लोग सक्रिय हुए और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सरकारों की कळ्ंभकर्णी नींद टूटी। यदि समय रहते किसानों को पराली जलने से होने वाले खतरों से अवगत कराया जाता और आम जनता को उन सभी कारणों से परिचित कराया जाता जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं तो बेहतर होता।

हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि जलवायु परिवर्तन के कारण आदिकाल से जीवनदायिनी रहीं हमारी नदियां आज दम तोड़ने की कगार पर हैैं। तमाम नदियां अब नष्टप्राय: हैैं। हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन की वजह से गंगा और यमुना की सहायक जलधाराएं तेजी से सूख रही हैं। इसके लिए आम लोग भी दोषी हैं। हम जहां नदियों की पूजा करते हैं वहीं उन्हें प्रदूषित करने से भी बाज नहीं आते। आखिर प्रतिमाओं के विसर्जन के समय यह ख्याल क्यों नहीं आता कि उनमें इस्तेमाल होने वाले रसायन और अन्य हानिकारक पदार्थ नदियों को जहरीला बनाते हैैं? मुश्किल यह है कि शासन-प्रशासन धार्मिक आस्था के चलते प्रतिमाओं के विसर्जन के खिलाफ कोई कदम उठाने का साहस नहीं करता। यह अच्छा हुआ कि एनजीटी ने गंगा और उसकी सहायक नदियों में प्रतिमाओं के विसर्जन पर रोक लगा दी, लेकिन देखना है कि प्रशासन उस पर अमल करा पाता है या नहीं?

पर्यावरण संबंधी चिंताओं के बीच केंद्र सरकार ने एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को ही लाल किले की प्राचीर से इसके खिलाफ मुहिम चलाने की घोषणा की थी। संयुक्त राष्ट्र के मंच से भी उन्होंने दुनिया को इस अभियान के बारे में बताते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन रोकने के मामले में बातें करने का समय निकल चुका है, अब काम करके दिखाने का समय है। प्लास्टिक से होने वाले नुकसान को देखते हुए देर से सही, एक दुरुस्त फैसला लिया गया।

केंद्र सरकार ने आम आदमी के रोजगार को ध्यान में रखते हुए प्लास्टिक पर प्रतिबंध जैसा कदम नहीं उठाया है। चूंकि प्लास्टिक की वस्तुओं का निर्माण छोटे-छोटे उद्योग करते हैं इसलिए उनके निर्माण पर यकायक पाबंदी लगती तो लाखों लोगों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ता। राज्य सरकारों को यह समझना चाहिए कि सिंगल यूज प्लास्टिक के चलन को रोकने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। क्षरणशील न होने के कारण प्लास्टिक सैकड़ों साल ज्यों का त्यों बना रहता है। इससे पानी भी दूषित होता है और मिट्टी भी।

प्लास्टिक अवशेष नदियों के जरिये समुद्र तक पहुंचते हैं और उनमें मौजूद जैव विविधता को बर्बाद करते हैं। जिस माइक्रो प्लास्टिक में पेय पदार्थों या खाद्य सामग्री की पैकिंग होती है वह भी सेहत के लिए हानिकारक है। यदि हम जागरूक होकर सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद कर सकें तो हर साल नदियों, नालों और जमीन में जमा होने वाले लाखों टन प्लास्टिक कचरे से निजात मिल सकती है। स्पष्ट है कि इससे पर्यावरण सुधारने में मदद मिलेगी।

भारत पेरिस जलवायु समझौते में शामिल है। यह जलवायु परिवर्तन रोकने की वैश्विक पहल है। यह तभी प्रभावी होगी जब सभी देश मिलकर काम करेंगे। चिंताजनक यह है कि कई ऐसे विकसित देश अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने को तैयार नहीं जो कहीं अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं।

जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए 2015 में हुए पेरिस समझौते को अपने लिए अनुचित बताते हुए अमेरिका इससे बाहर हो गया। इसके तहत विकसित देशों को कार्बन उत्सर्जन कम करने के साथ विकासशील देशों को तकनीकी एवं आर्थिक सहायता उपलब्ध करानी थी ताकि वे अपना विकास रोके बगैर जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने में सहायक बन सकें। अमेरिका के इस समझौते से बाहर हो जाने के कारण पेरिस में जो लक्ष्य तय किए गए थे उन्हें हासिल करना मुश्किल हो रहा है।

चूंकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पेरिस समझौते पर अमल के लिए प्रतिबद्ध हैैं इसलिए दुनिया भर में उनकी सराहना हो रही है। उन्होंने सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ जिस जन आंदोलन छेड़ने की बात कही उसमें समाज के हर तबके को शामिल होने की जरूरत है। वास्तव में यह बुनियादी बात सभी को समझनी ही होगी कि पर्यावरण संरक्षण केवल शासन-प्रशासन का काम नहीं, इसमें तो हर व्यक्ति का योगदान चाहिए। बेहतर होगा कि इस मामले में आम आदमी से लेकर उद्योगपति तक अपने महती दायित्व को समझें।

स्रोत –  नई दुनिया

समुचित कदम

 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने शुक्रवार को नीतिगत रीपो दर में 25 आधार अंक की कमी कर दी। यह काफी हद तक अनुमानों के अनुरूप ही था। हालांकि कुछ प्रतिभागियों को ज्यादा बड़ी कटौती की उम्मीद थी। एमपीसी ने बड़ी कटौती न करके आर्थिक मंदी के दौर में सही कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्घि दर के अनुमान को भी 6.9 फीसदी से कम करके 6.1 फीसदी कर दिया। यह कहा जा सकता है कि वृद्घि के अनुमानों में कमी के चलते दरों में बड़ी कटौती की आवश्यकता थी, खासतौर पर इसलिए क्योंकि मुद्रास्फीति के 4 फीसदी के दायरे के भीतर रहने का अनुमान है। अपनी पिछली बैठक में जीडीपी वृद्घि अनुमान में कमी न होने पर भी समिति ने नीतिगत दर 35 आधार अंक कम की थी।

बहरहाल, 25 आधार अंक की कटौती की उचित वजह थी। गत सप्ताह के नीतिगत कदम के पहले एमपीसी ने चालू चक्र में नीतिगत दर में 110 आधार अंक की कमी की है। यह पूरी तरह पारेषित नहीं हुआ। फरवरी-अगस्त के बीच वाणिज्यिक बैंकों के नए ऋण की औसत ऋण दर में केवल 29 आधार अंक की कमी आई जबकि मौजूदा ऋण की दर में सात आधार अंक का इजाफा हुआ। चूंकि पारेषण अत्यंत कम है इसलिए कुछ नीतिगत गुंजाइश बनाकर व्यवस्था को समायोजन की मोहलत देना उचित है। ऋण दर को बाहरी मानकों से जोडऩे से पारेषण में सुधार होना चाहिए। हालांकि इससे बैंकिंग तंत्र के सामने अलग तरह की चुनौती आ सकती है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता के बीच कुछ नीतिगत गुंजाइश बचाकर रखना समझदारी होगी। शुक्रवार को ही जारी मौद्रिक नीति रिपोर्ट दर्शाती है कि वैश्विक वृद्घि दर में 50 आधार अंक की कमी हमारे देश की वृद्घि दर में 20 आधार अंक तक की कमी ला सकती है।

हालांकि आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा है कि केंद्रीय बैंक के पास ऐसी कोई वजह नहीं है कि वह राजकोषीय घाटे को तय सीमा में रखने के प्रति सरकार की प्रतिबद्घता पर शुबहा करे। परंतु यह संभव है कि एमपीसी के सदस्यों ने राजकोषीय विचलन की संभावना पर विचार किया हो। एमपीसी के सदस्यों ने अतीत में भी राजकोषीय प्रबंधन को लेकर चिंता प्रकट की है। उदाहरण के लिए अगस्त की बैठक में चेतन घाटे ने कहा था, ‘मुझे लगातार चिंता हो रही है कि हमारे सरकारी क्षेत्र की भारी-भरकम उधारी आवश्यकता (जीडीपी के 8-9 फीसदी के बराबर) राजकोषीय असंतुलन अर्थव्यवस्था को गहरे तक प्रभावित करेगी।’

उन्होंने कहा कि राजकोषीय फिसलन के पथ को सीमा के रूप में देखा जाना चाहिए लेकिन सीमा का अभिसरण भी होता है और एक तरह का ‘रचनात्मक लेखा’ देखने को मिलता है। जाहिर है राजकोषीय फिसलन मुद्रास्फीति के पूर्वानुमान और मौद्रिक नीति के चयन को प्रभावित कर सकती है। हालांकि दरों संबंधी निर्णय के बाद शेयर कीमतों और बॉन्ड कीमतों में गिरावट आई। इसके लिए आंशिक रूप से धीमी वृद्घि के पूर्वानुमान से जुड़ी चिंता और ज्यादा कटौती की उम्मीद जिम्मेदार थी। हालांकि एमपीसी ने कहा है कि वह वृद्घि को गति देने की आवश्यकता होने पर अपने रुख में समायोजन जारी रखेगी। परंतु बाजार अब जानना चाहेंगे कि नीतिगत दरों में कितनी कमी की जा सकती है। स्पष्टï है कि समायोजन वाले रुख का यह मतलब नहीं है कि एमपीसी हर दो महीने में दरों में कटौती करेगी ही। यह स्पष्टï नहीं है कि केंद्रीय बैंक वृद्घि को सहायता देने के लिए वास्तविक दरों में कितनी कमी करने को तैयार होगा। समिति को इस विषय को स्पष्टï करना होगा। ज्यादा स्पष्टï होने से पारेषण में सुधार होगा और लंबी अवधि की मुद्रास्फीति के अनुमान भी संभलेंगे। आधुनिक केंद्रीय बैंकों के पास संचार के रूप में एक अहम उपाय है जिसका प्रभावी इस्तेमाल होना चाहिए।

स्रोत –  बिजनेस स्टैंडर्ड

डर रहा चीनी गणराज्य

माओ त्से तुंग ने जब चीनी लोक गणराज्य की स्थापना की थी तब उनका उद्देश्य थासमानता और लाभ में सभी की बराबर हिस्सेदारी।

रहीस सिंह

इसकी 70वीं वषर्गांठ पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी एकता, विकास और मजबूती पर जोर देते दिखे। यहां दो सवाल हैं। पहला यह कि क्या माओ के चीन ने माओ को अभी तक आत्मसात कर रखा है? दूसरा- क्या शी जिनपिंग जिन तीन पर विषयों पर अपनी प्रतिबद्धता जता रहे हैं, वे चीन ने हासिल कर लिए हैं अथवा चीन सही अथरे में उनमें से कम से दो के मामले में काफी दूर है?

डेंग जियांग पिंग ने अब से 40 साल पहले जिस नए चीन की बुनियाद रखी थी वह माओ की सांस्कृतिक क्रांति से अलग कृत्रिम समाजवादी अथवा पूंजीवादी तत्वों से निर्मित थी। इसे ही जियांग जेमिन, हू जिंताओ और शी जिनपिंग ने आगे बढ़ाया। परिणाम यह हुआ कि 4 दशक में माओ के चीन का मौलिक स्वरूप बदल गया। अब उसे देखकर कोई भी कह सकता है कि माओ त्से तुंग ने जिस चीनी लोक गणराज्य को स्थापित किया था, उसका ‘लोक’ अब भी चीन में वही महत्त्व रखता है, जो माओ के समय रख रहा था। दरअसल, इसे खत्म करने की शुरुआत माओ ने ही कर दी थी। उन्होंने ‘ग्रेट लीप फॉर्वड’ और ‘कल्चरल रिवोल्यूशन’ का सहारा लिया जो सही अथरे में चीनी किस्म का नवजागरण कम माओ की निरंकुशता के अधीन लोगों के एकत्ववाद का प्रशिक्षण अधिक था। यही वजह है कि ‘कल्चरल रिवोल्यूशन’ के युग में चीन में जड़ता का विकास अधिक हुआ। डेंग ने इस जड़ता को तोड़ा और चीन को खुला आसमान देने की कोशिश की।

माओ के बाद के चार दशकों में चीन विकास दर के मामले में डबल डिजिट तक पहुंचे और दुनिया का सबसे तेज गति से विकास करने वाला देश बना। चीनी निर्यातों ने दुनिया में भर में घूम मचायी, भुगतान संतुलन चीन के पक्ष में किया, विदेशी मुद्रा भण्डार को समृद्ध बनाया और चीन की अर्थव्यवस्था को दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्था बना दिया। इसी दौर में वह दुनिया का सबसे बड़ा कर्ज प्रदाता बना जिसके चलते उसे र्वल्ड बैंक जैसी संज्ञा दी जाने लगी। उसने चेकबुक डिप्लोमैसी के जरिए एशिया और अफ्रीका के तमाम देशों के प्राकृतिक संसाधनों को अपनी अर्थव्यवस्था से जोड़ने में कामयाबी हासिल की और दुनिया के सबसे महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य ‘वन बेल्ट वन रोड’ से एशिया एवं यूरोप के देशों को जोड़कर एक धुरी के रूप में प्रतिष्ठा करने का प्रयास किया। लेकिन उसकी इस विकास गाथा में बहुत सी बीमारियां छुपी थीं, जिनका खुलासा करने से चीनी नेतृत्व कतराता रहा। यही वजह है कि वह अपनी आर्थिक नीतियों के जरिए माओ को मारता गया, लेकिन राजनीतिक व्यवस्था में जिंदा रखता रहा ताकि लोगों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखने में सफल हो सके।

पिछले चार दशकों में चीन का जो रूपांतरण हुआ उसने विकास में असामंजस्य और विरूपता को बढ़ाया। कारण यह कि नवविकासवाद की चीनी सैद्धांतिकी ने इस प्रचार पर बल दिया कि युवा यदि प्रसिद्धि पाना चाहते हैं तो वे अनिवार्य रूप से धनी बनें। ऐसा हुआ भी। लेकिन युवाओं के धनी बनने की अदम्य प्यास ने चीन की विकास दर को तो बढ़ा दिया, लेकिन चीन को फिर उन्हीं स्थितियों में पहुंचा दिया जिनके कारण 20वीं सदी में माओ पैदा हुए। इस ‘कैपिटलिस्टिक रोडर्स’ ने चीन में डेंग को तो स्थापित कर दिया, लेकिन माओ को खो दिया। माओ देश में पूंजीवाद की न्यूनतम भूमिका देखना चाहते थे, लेकिन आज यह सर्वाधिक निर्णायक भूमिका में है, जिसके चलते चीन में असमानता काफी जटिल एवं व्यापक स्थिति में देखी जा सकती है। ये स्थितियां सही अथरें में चीनी शासकों को माओ के भूत से डरा रही हैं।

इसमें कोई संशय नहीं होना चाहिए कि गरीबी के आधार पर समाजवादी व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती। लेकिन क्या यह भी सच नहीं होना चाहिए कि केवल अर्थमेटिक्स से आर्थिक समृद्धता, समानता और न्याय की स्थापना भी नहीं की जा सकती। अगर ऐसा होता तो चीन दुनिया का रोल मॉडल बनता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि इसके विपरीत चीन के अंदर से ही उसके इस मॉडल को चुनौती मिल रही है, फिर चाहे वह मकाऊ हो, हांगकांग हो, ताइवान हो या फिर तिब्बत और शिनजियांग में बौद्धों तथा वीगरों का आंदोलन हो।

स्रोत –  राष्ट्रीय सहारा

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