13-08-2019 (Newspaper Clippings)

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मौद्रिक नीति की सीमाएं

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने नीतिगत रीपो दर में 35 आधार अंक की कमी करके कई बाजार प्रतिभागियों को चौंका दिया। यह लगातार चौथा अवसर है जब दरों में कटौती की गई है। केंद्रीय बैंक ने चालू वर्ष के लिए वृद्धि के पूर्वानुमान को भी 7 फीसदी से कम करके 6.9 फीसदी कर दिया। एमपीसी का मानना है कि खुदरा मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति 4 फीसदी का स्तर पार नहीं करेगी। कम से कम अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही तक तो कतई नहीं। केंद्रीय बैंक ने दरों को 25 आधार अंक या इसके गुणक में समायोजित करने की परंपरा भी तोड़ दी है। इसका सिरा आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास द्वारा इस वर्ष के आरंभ में वॉशिंगटन डीसी में दिए एक भाषण में तलाशा जा सकता है। उन्होंने कहा था, ‘ऐसी स्थिति में जब केंद्रीय बैंक को लगे कि वह समायोजन कर सकता है लेकिन बहुत ज्यादा नहीं, तब वह 35 आधार अंक की कटौती कर सकता है। बशर्ते कि उसे लगे कि 25 आधार अंक की मानक कटौती बहुत कम होगी और 50 आधार अंक की कटौती बहुत अधिक।’

एमपीसी के निर्णय के पीछे भी ऐसी ही दलील है। बहरहाल, इस कदम पर चर्चा की जरूरत है। उदाहरण के लिए क्या केंद्रीय बैंक के कदम और अधिक अप्रत्याशित नहीं होते जाएंगे और इनसे लाभ किसे होगा? यह भी स्पष्ट नहीं है कि 15 आधार अंक की और अतिरिक्त कटौती ज्यादा कैसे होती क्योंकि अर्थव्यवस्था में कमजोरी के स्पष्ट संकेत नजर आ रहे हैं। इतना ही नहीं अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही तक मुद्रास्फीति के भी स्थिर रहने की आशा है और समेकित मांग को बढ़ावा देकर तथा निजी निवेश में उछाल के माध्यम से वृद्धि को गति देना केंद्रीय बैंक की शीर्ष प्राथमिकता है।

नीतिगत दर में कटौती के अलावा केंद्रीय बैंक ने मानकों को शिथिल कर बैंकों की पूंजी मुक्त करने का प्रयास किया है। इससे उन्हें गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को अधिक ऋण देने की इजाजत मिल सकेगी। इससे न केवल इन कंपनियों को मदद मिलेगी बल्कि व्यवस्था में ऋण का प्रवाह भी सुनिश्चित हो सकेगा। बहरहाल, बड़ा सवाल यह है कि परंपरा को तोडऩे से वृद्धि में नई जान फूंकने में किस हद तक मदद मिल सकेगी? संभव है कि चालू वर्ष में वृद्धि दर आरबीआई के अनुमानों की तुलना में काफी कम रहे। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते कारोबारी तनाव के बीच हाल के दिनों में वैश्विक पूर्वानुमान में काफी कमी आई है। यह अनिश्चितता आगे चलकर वैश्विक वृद्धि के पूर्वानुमान को भी नुकसान पहुंचाएगी।

वैश्विक स्तर पर प्रतिकूल हालात के अलावा अर्थव्यवस्था के आंतरिक कारक भी जल्द सुधार के संकेत नहीं दर्शा रहे। केंद्रीय बैंक मुद्रा की लागत कम करके अपनी भूमिका निभा रहा है। बहरहाल, केवल इतना करना पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि अकेले मौद्रिक नीति के बल पर हासिल होने वाले लक्ष्यों की भी सीमा है। इतना ही नहीं, अर्थव्यवस्था को कम नीतिगत दरों का भी पूरा लाभ नहीं मिल रहा है क्योंकि धीमी गति से पारेषण दिक्कत की वजह बना हुआ है। सरकारी क्षेत्र की भारी भरकम उधारी भी इसकी वजह है। सरकार ने सरकारी बैंकों को सलाह दी है कि वे दरों में कटौती का लाभ आगे बढ़ाएं। परंतु सरकार को अपनी भूमिका भी बढ़ानी होगी।

इस स्तर पर यह अहम है कि राजकोषीय प्रबंधन की नीतियों व्यापार और विनिमय दर प्रबंधन आदि का नए सिरे से आकलन हो। इसके अतिरिक्त भूमि और श्रम सुधारों को लचीला बनाने की आवश्यकता है। वैश्विक माहौल चुनौतीपूर्ण है लेकिन भारत प्रतिस्पर्धा बढ़ाकर अपनी स्थिति बेहतर कर सकता है।


पकिस्तान की बौखलाहट

पाकिस्तान के नीतिनियंता कुछ भी कहें सच यही है कि उनके बौखलाहट भरे फैसलों से भारत की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।

अनुच्छेद 370 को बेअसर करके जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की भारत सरकार की ऐतिहासिक पहल पर पाकिस्तान जिस तरह भड़का हुआ था उसे देखते हुए यह तय था कि वह कुछ न कुछ करेगा। तमाम गर्जन-तर्जन के बाद उसने जिस तरह भारत से राजनयिक संबंधों का दर्जा कम करने और व्यापारिक संबंध तोड़ने का फैसला किया उससे भारत को चिंतित होने की जरूरत नहीं। आखिर यह भारत ही था जिसने पुलवामा हमले के बाद व्यापार के मामले में पाकिस्तान का सबसे तरजीही राष्ट्र का दर्जा खत्म किया था। इसके बाद पाकिस्तान से होने वाले सीमा व्यापार को भी निलंबित कर दिया गया था, क्योंकि उसके जरिये मादक पदार्थों की तस्करी हो रही थी। चूंकि भारत के इन कदमों के बाद द्विपक्षीय व्यापार न के बराबर रह गया था इसलिए उसे खत्म करने की पाकिस्तान की घोषणा का कोई मतलब नहीं। जहां तक राजनयिक स्तर घटाने की बात है तो सच्चाई यह है कि सुरक्षा मामलों के भारतीय विशेषज्ञ एक अर्से से यह मांग कर रहे थे कि पाकिस्तान से राजनयिक संबंध घटाए जाने चाहिए। एक तरह से पाकिस्तान ने वह काम किया जिसके लिए भारत सरकार से अपील की जाती थी।

ऐसा लगता है कि बौखलाहट में आए पाकिस्तान को कुछ सूझा नहीं और इसीलिए उसने ऐसे फैसले ले लिए जो उस पर ही भारी पड़ सकते हैैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि बालाकोट हमले के बाद पाकिस्तान ने भारत को दबाव में लेने के इरादे से भारतीय यात्री विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र लंबे समय तक बंद रखा और जब भारत सरकार इस पाबंदी से बेपरवाह रही तो उसने मजबूरी में अपने फैसले को पलटा।पाकिस्तान द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा करने के साथ ही कश्मीर मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाने की भी बात कर रहा है। वह जिस तरह द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा करने को स्वतंत्र है उसी तरह सुरक्षा परिषद का दरवाजा खटखटाने के लिए भी। वह शायद इस हकीकत से आंखें मूंदे रहना चाहता है कि कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव अब महज कागज का एक टुकड़ा भर रह गया है। उसे यह भी समझ आना चाहिए कि इस प्रस्ताव को निष्प्राण करने मे सबसे बड़ी भूमिका उसी की रही है। पाकिस्तान ने न केवल कश्मीर का एक हिस्सा चीन को सौंप दिया, बल्कि इस जरूरी शर्त को भी पूरा करने से इन्कार किया कि जनमत संग्रह के लिए पहले उसे अपने कब्जे वाले इलाके से अपनी फौज हटानी होगी। पाकिस्तान के नीति-नियंता कुछ भी कहें, सच यही है कि उनके बौखलाहट भरे फैसलों से भारत की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।


पाक की बौखलाहट

जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटा लेने के भारत सरकार के साहसिक कदम से पाकिस्तान किस कदर बौखलाया हुआ है, इसका पता पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के बयान से चलता है। इमरान खान ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र हैं और जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खत्म करने जैसे कदम से दोनों देशों के बीच रिश्ते और बिगड़ेंगे। इमरान खान का यह बयान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के मसले पर पाकिस्तान चुप नहीं बैठने वाला और आने वाले दिनों में इस मसले को लेकर वह पूरी दुनिया में भारत के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान छेड़ेगा। ऐसे कदम भी उठाएगा जो शांति के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। सोमवार को इमरान खान ने मलेशिया के प्रधानमंत्री से बातचीत में भी इस मुद्दे को उठाया था। दरअसल, पाकिस्तान ने यह कभी सोचा भी नहीं होगा कि कश्मीर को लेकर भारत इतना कठोर फैसला कर सकता है। पाकिस्तान की नींद इसलिए भी उड़ी हुई है कि भारत कहीं अब सीधे पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर कोई कदम न उठा ले। भारत ने यह तो स्पष्ट कर ही दिया है कि कश्मीर उसका अभिन्न अंग है और पाक अधिकृत कश्मीर भी इससे अलग नहीं है।

पिछले दिनों अमेरिका यात्रा के दौरान भी इमरान खान ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मुलाकात में कश्मीर का मुद्दा उठाया था। इसके बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिख कर कश्मीर में मानवाधिकारों की बिगड़ती स्थिति, नियंत्रण रेखा के पास संघर्षविराम उल्लंघन और कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे को खत्म करने जैसे आरोप भारत पर लगाए। पाकिस्तान पहले से ही भारत के खिलाफ ऐसे अभियान छेड़े हुए है। यह उसकी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है। पाकिस्तान चाहता है कि उसे दुनिया में जहां जिस मंच से बोलने का मौका मिले, वह जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने का मुद्दा उठाए। इस मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण कर अपने पक्ष में सहानुभूति जुटाने के लिए वह संयुक्त राष्ट्र, इस्लामिक सहयोग संगठन, मानवाधिकार संगठनों और मित्र देशों के दरवाजे खटखटाएगा। हालांकि भारत संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देशों सहित ज्यादातर देशों को इस बारे में सूचित कर चुका है और साफ बता दिया है कि जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खत्म करना भारत का अंदरूनी मामला है।

कश्मीर विवाद भारत और पाकिस्तान का आपसी मसला है। लेकिन धारा 370 भारत का अंदरूनी मसला है। इसमें पाकिस्तान को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? धारा 370 इसलिए हटाई गई है ताकि कश्मीर में रहने वालों और अन्य भारतीय नागरिकों के बीच दशकों से चले आ रहे अधिकारों के भेदभाव को खत्म किया जा सके, घाटी में विकास की प्रक्रिया शुरू की जा सके, लोगों को रोजगार दिया जा सके और लोगों के बीच सरकार के प्रति भरोसा पैदा किया जा सके। धारा 370 हटाने और राज्य का पुनर्गठन होने से कश्मीर विवाद का स्वरूप तो नहीं बदलने वाला! हां, इतना जरूर है कि घाटी के लोगों का मन बदलने और उन्हें भारत की मुख्यधारा में लाने की दिशा में काम तेजी से होगा। पाकिस्तान की परेशानी इसी को लेकर है। पाकिस्तान यह बिल्कुल नहीं चाहता कि घाटी में शांति का माहौल बने। अगर कश्मीर घाटी के नौजवान पढ़-लिख कर रोजगार में लगने लगेंगे तो आतंकी संगठन पत्थरबाजों और आतंकियों की भर्ती कैसे करेंगे, पाकिस्तान की फिक्र यह है। पाकिस्तान समझ चुका है कि कश्मीर को लेकर भारत की नीति अब साफ है और बड़े फैसले लेने में वह बिल्कुल नहीं हिचकेगा। धारा 370 को हटाना इसका साफ संदेश है।

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