12-10-2019 (Newspaper Clippings)

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अमेरिका से गहराते रिश्तों का दौर

प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका दौरे में तमाम मसलों पर बात आगे बढ़ी और इस दौरान की गई सभी कोशिशें सराहनीय कही जाएंगी।

हर्ष वी. पंत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया अमेरिकी दौरे पर खासी टीका-टिप्पणियां हो रही हैं। यह स्वभाविक भी है। जहां मोदी के समर्थक इस दौरे को भारत के लिए बड़ी जीत करार दे रहे हैं, वहीं उनके आलोचकों का कहना है कि इस दौरे में कोई ठोस उपलब्धि हासिल नहीं हुई। इस बात को लेकर दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हो सकते हैं, मगर इस बात पर किसी विवाद या बहस की कोई गुंजाइश नहीं कि अपने पूरे दौरे में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रंटफुट पर खेलते नजर आए और उन्होंने पूरी तन्मयता के साथ भारत के हितों को वैश्विक मंच पर रखा।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने अपनी विदेश नीति में परंपरागत रक्षात्मक रवैया छोड़ दिया। अपने अमेरिकी दौरे के दौरान भी वह भारतीयों की आकांक्षाओं को मुखरता के साथ प्रदर्शित करने में पीछे नहीं रहे। अपने इस व्यस्त अमेरिकी दौरे में मोदी को चार भूमिकाएं निभानी थीं। सबसे पहले तो उन्हें अमेरिका के साथ विशेषकर व्यापारिक मोर्चे पर तल्खी को कम करना था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप काफी अरसे से व्यापारिक मुद्दों को लेकर भारत पर निशाना साधते रहे हैं। ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री के लिए यह महत्वपूर्ण था कि वह वाशिंगटन को आश्वस्त करें कि भारत परस्पर लाभ के लिहाज से अमेरिका के साथ ठोस मुद्दों पर सक्रियता से संवाद करने के लिए तैयार है। दोनों देशों के साथ व्यापारिक ताने-बाने को सुगम बनाने के लिए भारतीय अधिकारी विशेषकर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल पिछले कुछ हफ्तों से अपने अमेरिकी समकक्षों के साथ लगातार सक्रिय हैं। यहां तक कि ह्यूस्टन में अपनी रैली के दौरान खुद मोदी ने ट्रंप को बड़े जोरदार ढंग से लुभाने की कोशिश की, वहीं ट्रंप उस कार्यक्रम में स्वयं को भारत और भारतीय मूल के अमेरिकियों के सबसे बड़े हितैषी के रूप में पेश कर रहे थे। हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं कि इस कवायद का खाका मोदी ने ही खींचा था।

बहरहाल, इस दौरे में बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौता नहीं हो सका। इसकी मुख्य वजह यही रही कि दोनों देश सूचना एवं संचार यानी आईसीटी उत्पादों पर कोई सहमति बनाने में नाकाम रहे, मगर इन वार्ताओं ने वाशिंगटन को यह भरोसा जरूर दिलाया कि अमेरिका के साथ व्यापार को लेकर भारत वाकई बहुत गंभीर है। व्यापार समझौते को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का बयान दोनों देशों के बीच सहजता के स्तर की पुष्टि करता है।

मोदी के लिए दूसरी भूमिका यह थी कि वह अमेरिकी और वैश्विक निवेशकों के समक्ष निवेश के लिए एक आकर्षक गंतव्य के रूप में भारत का पक्ष मजबूती से रखें। उन्हें भारत की ऐसी पैरवी एक ऐसे समय में करनी थी, जब देश में आर्थिक सुस्ती को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। ऊर्जा क्षेत्र में सक्रिय कंपनियों के प्रमुखों के साथ ह्यूस्टन में और फिर मास्टरकार्ड, वीजा और वाल-मार्ट जैसी 40 दिग्गज कंपनियों के सीईओ के साथ न्यूयॉर्क में ब्लूमबर्ग ग्लोबल बिजनेस फोरम में मोदी ने भारत में निवेश के आकर्षर्क पहलुओं को रेखांकित किया। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि निवेशकों को कोई दिक्तत आती है तो वह स्वयं निजी हस्तक्षेप करके उसका निदान करेंगे। मोदी ने भारत के लोकतंत्र, जनसांख्यिकी, मांग और निश्चिंतता जैसे तमाम बिंदु गिनाए जो भारत की वृद्धि को धार दे रहे हैं और वैश्विक निवेशक भी इसका हिस्सा बनकर लाभ उठा सकते हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि मोदी भारत के सबसे बेहतरीन ब्रांड एंबेसडर बने हुए हैं और वह भारत की पैरवी ऐसे वक्त में कर रहे हैं, जब तमाम लोगों ने भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

मोदी के लिए तीसरी भूमिका अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमताओं को पुन: रेखांकित करने से जुड़ी थी। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन में उन्होंने जिस तरह भारत के आमूलचूल परिवर्तनों को प्रकट किया, वह उन व्यापक आकांक्षाओं के अनुरूप ही था, जो दुनिया की भारत से लगातार बनी हुई हैं। एक वैश्विक खिलाड़ी के रूप में भारत की भूमिका और भारत के उदय को समायोजित करने के लिए नए वैश्विक ढांचे की दरकार को लेकर उनका भाषण तेजतर्रार और स्पष्टता लिए था। इस मंच पर मोदी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीयवाद भारतीय सभ्यता के मूल्यों में स्वाभाविक रूप से सन्न्हित है। वह केवल शक्ति संतुलन में भारत के हितों को लेकर की जाने वाली तिकड़म नहीं है। अपने भाषण में उन्होंने पाकिस्तान को पूरी तरह नजरअंदाज किया। यहां तक कि आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से किए आह्वान में भी उन्होंने पाकिस्तान का नाम लेना गवारा नहीं समझा। इससे भी महत्वपूर्ण उनका यह कहना रहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए नई दिल्ली बहुध्रुवीयता को अनिवार्य मानती है। उन्होंने यह कहते हुए दुनिया में बढ़ते संरक्षणवाद पर प्रहार किया कि ‘हमारे पास यह विकल्प नहीं कि हम स्वयं को अपनी सीमाएं में समेटकर रखें। यह कहकर उन्होंने ट्रंप की बहुध्रुवीयता की समाप्ति वाली अवधारणा को स्पष्ट रूप से खारिज किया।

आखिर में मोदी के लिए चौथी भूमिका यही थी कि वह जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद भारत के पक्ष को रखने के साथ ही इस मसले पर पाकिस्तानी दुष्प्रचार की काट करें। इसके लिए उन्होंने ह्यूस्टन रैली के मंच का प्रभावी रूप से इस्तेमाल किया और ट्रंप की मौजूदगी में यह संदेश दिया कि नई दिल्ली को यह नीति बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि भारत ने कितने पारदर्शी और लोकतांत्रिक तरीके से इस फैसले को अंजाम दिया। इस सभा में मौजूद 50,000 भारतीय-अमेरिकियों द्वारा इस पर गर्मजोशी से दी गई प्रतिक्रिया से अमेरिकी राजनीतिक प्रतिष्ठान को महसूस हुआ होगा कि अनुच्छेद 370 पर नई दिल्ली के निर्णय को भारतवंशियों का कितना जबर्दस्त समर्थन हासिल है। मोदी के अलावा विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी विभिन्न् मंचों पर भारत के पक्ष को बखूबी बयान किया। इस दौरान वह कई मिथ्या धारणाओं को दूर करने में सफल रहे।

स्पष्ट है कि मोदी के अमेरिकी दौरे में तमाम मसलों पर बात आगे बढ़ी और इस दौरान की गई तमाम कोशिशें सराहनीय कही जाएंगी। यह सही है कि अमेरिका के साथ व्यापारिक मसलों पर गतिरोध कायम है और ट्रंप एक अनिश्चित एवं अस्थिर वार्ताकार बने होने के साथ इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकते कि अमेरिका में अभी भी पाकिस्तान के हमदर्द मौजूद हैं। मगर मोदी का दौरा इन सभी समस्याओं को सुलझाने के लिए नहीं था। यह दौरा संबंधों में आई शिथिलता को दूर करने और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को साधने पर केंद्रित था। इन दोनों मोर्चों पर मोदी प्रभावी रहे। अब पूरा दारोमदार भारतीय कूटनीति पर है कि मोदी के इस दौरे से बने बेहतरीन माहौल को कैसे निरंतरता देते हुए उसे भलीभांति भुनाया जाए।

स्रोत –  नई दुनिया

बेमानी कवायद

टी. एन. नाइनन

अब शायद वक्त आ गया है कि राजकोषीय जवाबदेही से संबंधित कानून को विदा कर दिया जाए क्योंकि इससे फायदा कम, नुकसान ज्यादा हो रहा है। शायद एकबार वर्ष 2007-08 को छोड़ दिया जाए तो इस कानून के तहत तय राजकोषीय घाटे का लक्ष्य कभी हासिल नहीं हो सका है। राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 3 फीसदी के बराबर रखने का लक्ष्य लगातार टाला जाता रहा या उसे स्थगित किया गया। समस्या में इसलिए भी इजाफा हुआ क्योंकि जब वित्त मंत्री इस लक्ष्य के आसपास जाने में भी नाकाम रहे तो उन्होंने हिसाब में छेड़छाड़ की और पूरा राजकोषीय बोझ सरकारी क्षेत्र की लाचार कंपनियों पर डाल दिया। सरकारी आंकड़ों में आ रही कमी को पूरा करने के लिए इन कंपनियों से एक से अधिक तरीके से धन वसूली की गई। एक समय अत्यंत अमीर रही तेल विपणन कंपनियों के पास अब बहुत कम नकदी बची होने की यह भी एक वजह है।

राजकोषीय जवाबदेही कानून के तहत लक्ष्य की प्राप्ति दर्शाने के अन्य तरीकों में बिल भुगतान न करना भी शामिल है। ध्यान रहे कि वित्त मंत्री ने हाल ही में कहा कि छोटे और मझोले उपक्रमों का बकाया भुगतान तत्काल किया जाना चाहिए। उन्होंने अन्य उपक्रमों का जिक्र नहीं किया जबकि उनकी राशि भी बकाया है। इसके अलावा राजस्व के आंकड़े हासिल करने के दबाव में काम कर रहे कर अधिकारी भी साल के आखिरी महीने में कंपनियों पर दबाव बनाते हैं कि वे अतिरिक्त कर चुकाएं। उनसे वादा किया जाता है कि अगले वर्ष की शुरुआत में ही उनकी राशि रिफंड कर दी जाएगी। ये तमाम तरीके अपनाने के बावजूद घाटे के आंकड़े लक्ष्य से कमजोर बने रहते हैं। अगर किसी को वास्तविक तस्वीर पर संदेह हो तो उसे जानना चाहिए कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने वित्त आयोग से क्या कहा था। उसने कहा था कि वर्ष 2017-18 में केंद्र का घाटा 3.46 फीसदी नहीं था जैसा कि संसद को बताया गया बल्कि यह इससे कहीं अधिक 5.85 फीसदी था।

वित्त मंत्रियों को ऐसे तोड़-मरोड़ के लिए दबाव में क्यों डाला जाता है कि वे करीब 6 फीसदी के घाटे को 3.5 फीसदी के आसपास दर्शाने को मजबूर हो जाते हैं? उन्हें खुलकर सच्चाई क्यों नहीं बताने दी जाती ताकि देश के सामने वास्तविक तस्वीर आ सके? राजकोषीय घाटे को घटाकर बचाने से सरकार में शामिल प्रमुख लोगों को यह प्रोत्साहन मिलता है कि वे और अधिक खर्च कर सकें जबकि हकीकत में इसकी गुंजाइश नहीं होती। अगर सही आंकड़े पेश किए जाएंगे और चेतावनी साफ नजर आ रही होगी तो राजकोषीय जवाबदेही को लेकर समझदारी बढ़ेगी। कुछ और नहीं तो निजी क्षेत्र के अर्थशास्त्री, रेटिंग एजेंसियां और ऐसे लोग जो आज घाटे को लेकर सरकारी राय दोहराते हैं, उन सभी का सामना एक अलग सच से होगा। ऐसे में राजकोषीय सुधार का दबाव उत्पन्न होगा।

केवल राजकोषीय जवाबदेही कानून से संबंधित नुस्खा काम नहीं आएगा क्योंकि आंकड़ों से छेड़छाड़ तो इस कानून के बनने के पहले से होता आया है। कानून को समाप्त करने के साथ-साथ अन्य बदलाव भी करने होंगे। नकदी लेखा की मौजूदा पुरानी व्यवस्था समाप्त करनी होगी। अधिकांश देश इसे त्याग चुके हैं। नकदी लेखा में सरकार के व्यय खाते का इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के लिए बुनियादी कंपनियों द्वारा सड़क, पुल आदि के निर्माण का भुगतान करना। अधिकांश कंपनियां अपने बही खातों में कर्जदारों के बकाये का इस्तेमाल करती हैं। सरकार ऐसा नहीं करती और वह नकद लेखा के जरिये बच निकलती है। दूसरा, सरकारी क्षेत्र के लेखा का व्यापक अंकेक्षण होना चाहिए। इससे वह सारा व्यय सामने आ जाएगा जो अभी सरकार अपने संस्थानों मसलन खाद्य निगम आदि पर थोपती है। जिस खाद्य सब्सिडी बिल की भरपाई बजट से होनी थी उसे निगम ने अल्प बचत फंडों से उधारी लेकर निपटाया।

यदि इन बदलावों के माध्यम से विश्वसनीय बजटिंग नहीं होती है तो राजकोषीय घाटे को तीन फीसदी के स्तर पर रखने का कोई फायदा नहीं। टीसीए श्रीनिवास-राघवन ने इस समाचार पत्र में बार-बार कहा है कि यह आंकड़ा यूरोप का अनुकरण है जबकि भारत का आर्थिक संदर्भ यूरोप से एकदम अलग है। यह बात भरोसेमंद लगती है। तेज आर्थिक वृद्घि दर वाली भारतीय व्यवस्था उच्च घाटे वाले वृहद आर्थिक संकेतकों से निपट सकती है। जब तक घाटे की सच्चाई सबके सामने नहीं होगी तब तक वास्तविक आंकड़ों की दुनिया में ऐसे सवालों का जवाब मिलना आसान नहीं होगा।

स्रोत –  बिजनेस स्टैंडर्ड

क्या कहती है मानसून की यह करवट

इस बार वर्षा की अति हमे उस समय परेशान कर रही है , जब यह माना जाने लगा है की हम कम वर्षा के युग में प्रवेश कर चुके हैं।

महेश पलावत

अक्तूबर का महीना शुरू हो चुका है और आमतौर पर इस समय तक मानसून की आधिकारिक विदाई हो जाती है। मगर इस बार देश के कई हिस्सों में बारिश अब भी जारी है। माना जा रहा है कि उत्तर-पश्चिम भारत से मानसून की रवानगी 10 अक्तूबर से शुरू होगी। भारत में मानसून का सफर केरल तट से शुरू होता है और पूरे देश में बारिश कराने के बाद यह फिर इसी तट से वापस लौट जाता है। पिछले कुछ वर्षों में इस पर अल नीनो का प्रभाव बढ़ा है। अल नीनो की वजह से ही इस साल शुरुआती दिनों में सूखे की स्थिति दिखी, लेकिन बाद में भारी बारिश हुई, और एक ही मानसून में हमें सूखा और बाढ़, दोनों अनुभवों से गुजरना पड़ा। सितंबर के अंत में इसका मिजाज कुछ यूं बदला कि पटना जैसे शहर अप्रत्याशित बाढ़ में डूब गए।

बहरहाल, अपने यहां मौसम के पूर्वानुमान की गणना क्लाइमेट फॉरकास्ट सिस्टम (सीएफएस वी2) नामक वैश्विक मॉडल से की जाती है। इससे पता चलता है कि अगले तीन-चार महीनों में मौसम की दशा-दिशा क्या होगी और कहां-कितनी बारिश होगी या कितनी धूप की रोशनी खिलेगी? इसमें अल नीनो और ला नीना के प्रभावों का भी अध्ययन किया जाता है। अल नीनो प्रभाव तब पैदा होता है, जब प्रशांत महासागर के पूर्वी भाग में समुद्री सतह का तपामान सामान्य से ज्यादा हो जाता है। इसकी वजह से पेरू व दक्षिण अमेरिका में ज्यादा बारिश होती है, जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया में कम।

इस बार भी अनुमान लगाया गया था कि अल नीनो की सक्रियता रहेगी और भारत, खासतौर से इसके उत्तरी हिस्से में सामान्य से कम बारिश होगी। आकलन यह भी था कि अल नीनो प्रभाव जुलाई से कम होता जाएगा और फिर ‘न्यूट्रल’ (अल नीनो का प्रभाव खत्म होना) की स्थिति बन जाएगी। चूंकि न्यूट्रल स्थिति में भी मानसून ज्यादा अच्छा नहीं रहता, इसलिए तमाम पूर्वानुमानों में ‘सामान्य से कम’ बारिश की बात कही गई थी। मगर पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान अनुमान से पहले कम होने लगा, जिससे अल नीनो का प्रभाव जल्द ही खत्म हो गया और समय-पूर्व ‘न्यूट्रल’ की स्थिति बन गई।

जब अल नीनो सक्रिय रहता है, तो हिंद महासागर द्विध्रुव (इंडियन ओशन डायपोल-आईओडी) आमतौर पर असरकारी नहीं रहता। आईओडी के कारण हिंद महासागर और अरब सागर की सतह का तापमान बढ़ जाता है, जिससे हमारे यहां मानसूनी बारिश तेज हो जाती है। मगर चूंकि यह क्षेत्रीय कारक है और अल नीनो वैश्विक, इसलिए मौसम के आकलन में अल नीनो को ज्यादा तवज्जो दिया जाता है, लेकिन इस बार क्षेत्रीय कारक ही प्रभावी साबित हुआ है। आज से पहले यह स्थिति 1997 में दिखी थी, जब अल नीनो प्रभाव के बाद भी बादल छाए रहे और तेज बरसात होती रही।

हमारे देश में विशेषकर दक्षिण-पश्चिम मानसून बनने में मैडेन जूलियन ऑसीलेशन (एमजेओ) भी अहम भूमिका निभाता है। एमजेओ असल में गरम हवा के कारण उष्णकटिबंधीय मौसम में होने वाला उतार-चढ़ाव है। जब-जब हिंद महासागर में यह कारक सक्रिय होता है, तब-तब भारत में मानसून तेज हो जाता है। अप्रैल के महीने में, जब मानसून की भविष्यवाणी की जाती है, इसका आकलन मुश्किल है। इस साल यह हवा अगस्त और सितंबर में दो बार हिंद महासागर से गुजरी, जिससे देश के कुछ हिस्सों में अप्रत्याशित बरसात हुई और मानसूनी बारिश सामान्य से 53 फीसदी ज्यादा हुई।

सवाल यह है कि क्या यह प्रवृत्ति आगे भी दिखेगी? फिलहाल यह बताना आसान नहीं होगा। अभी यह अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता कि अगले साल अल नीनो असरकारी होगा, ला नीना (अल नीनो से विपरीत इसमें समुद्री सतह का तापमान कम हो जाता है और पश्चिमी प्रशांत महासागर के इलाकों में अच्छी बारिश होती है) रहेगा या फिर न्यूट्रल स्थिति बनेगी। अगले साल आईओडी को नजरंदाज करने का जोखिम भी वैज्ञानिक शायद ही उठाना पसंद करेंगे। मगर इन सबमें एक बात तय है कि मानसून पर जलवायु परिवर्तन का असर साफ-साफ दिखेगा। ‘क्लाइमेट चेंज’ के कारण ही पिछले कुछ वर्षों में अल नीनो प्रभाव कहीं अधिक तीव्रता से और अनवरत असरकारी होने लगा है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने के साथ-साथ यह प्रभाव भी बढ़ेगा, जिससे मानसूनी बारिश कहीं ज्यादा प्रभावित होगी।

जलवायु परिवर्तन किस कदर मानसून को प्रभावित कर रहा है, इसे अपने यहां के कुछ आंकड़ों से भी समझ सकते हैं। भारत में मानसून का अब एक खास पैटर्न दिखने लगा है। हम एक अंतराल के बाद सूखे से जूझने लगे हैं। इसी सदी में साल 2002, 2004, 2009, 2014 और 2015 में हमने सूखा झेला, जबकि साल 2000, 2001, 2012, 2017 और 2018 में सामान्य से कम बारिश हुई। मौजूदा दशक (2011-2020) में 2018 तक हुई मानसूनी बारिश का अगर अध्ययन करें, तो यह औसतन 835 मिलीमीटर है, जबकि मानसूनी मौसमी वर्षा का दीर्घकालिक औसत (एलपीए) 887 मिलीमीटर है।

जाहिर है, हम अब कम वर्षा वाले युग में प्रवेश कर चुके हैं। आने वाले वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की वजह से मानसूनी वर्षा सामान्य से कम होती जाएगी, जिसका नुकसान अंतत: मानव जाति को ही होगा। बेशक इस साल सामान्य से ज्यादा बारिश हुई है, लेकिन यह प्रवृत्ति शायद ही आगे बनी रहेगी। अभी की मानसूनी बारिश को हमें अपवाद ही मानना चाहिए।

स्रोत –  हिंदुस्तान

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