11-11-2019 (Newspaper Clippings)

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मुक्त व्यापार समझौते की मुश्किलें

आरसेप करार के कारण भारत में सस्ते आयात बढ़ते और पहले से मुश्किल में फंसे किसानों की परेशानी और बढ़ती।

डॉ. भरत झुनझुनवाला , (लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री आईआईएम, बंगलुरु के पूर्व प्रोफेसर हैं)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के नेतृत्व में आकार ले रहे मुक्त व्यापार संगठन रीजनल कॉम्प्रहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप यानी आरसेप से बाहर रहने का निर्णय लिया। पूर्वी एशिया के देशों द्वारा आसियान नाम से बने संगठन में इंडोनेशिया, थाइलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, फिलीपींस, वियतनाम, म्यांमार, ब्रुनेई, कंबोडिया और लाओस समेत कुल दस शामिल हैैं। 2010 में चीन भी इससे जुड़ गया। 2010 में चीन और आसियान देशों के बीच व्यापार का संतुलन आसियान के पक्ष में था। ये चीन से आयात कम और उसे निर्यात अधिक करते थे। व्यापारिक मोर्चे पर आसियान को 53 अरब डॉलर की बढ़त हासिल थी, मगर 2016 तक तस्वीर पूरी तरह बदल गई। तब तक आसियान का चीन को होने वाला निर्यात घट गया और आयात बढ़ गया। आसियान को 54 अरब डॉलर का घाटा होने लगा। आसियान देशों को चीन के साथ समझौता करने से नुकसान हुआ।

बाद में आसियान से चीन के अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया भी जुड़ गए। इस जुडाव को आरसेप का नाम दिया गया। आरसेप व्यापार समझौते का हिस्सा बनते ही भारत में पूर्वी एशिया, चीन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड इत्यादि देशों के साथ मुक्त व्यापार व्यवस्था लागू हो जाती और इन देशों की वस्तुएं बगैर आयात कर के भारतीय बाजार में प्रवेश कर जातीं। तमाम भारतीय संगठनों का मानना है कि आरसेप के कारण भारत में सस्ते आयात बढ़ते और पहले से मुश्किल में फंसे किसानों की परेशानी और बढ़ती। मुक्त व्यापार समझौते को लेकर खुद आसियान देशों का यही अनुभव रहा है।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि मुक्त व्यापार नुकसानदेह क्यों साबित हो रहा है? मुक्त व्यापार के तहत किसी वस्तु का उत्पादन वही देश करे, जहां वह सबसे सस्ती दर पर बनाई जा सकती है। मसलन, चीन में सीएफएल बल्ब और भारत में एंटीबायोटिक दवाएं। इससे भारतीय उपभोक्ताओं को चीन में बने सस्ते बल्ब मिलेंगे और चीनी उपभोक्ताओं को भारत में बनी सस्ती दवाएं। दोनों देशों के उपभोक्ताओं को सस्ता माल मिलने से उनके जीवन-स्तर में सुधार होगा। किंतु आसियान को इस तरह का लाभ नहीं हुआ। दरअसल यह जरूरी नहीं कि प्रत्येक देश को किसी वस्तु के निर्माण में महारत हासिल हो। जैसे कक्षा में छात्रों के साथ होता है। कई छात्र कई विषयों में प्रवीण होते हैं तो कई छात्र किसी एक विषय में भी ठीक नहीं होते। ऐसे पिछड़े छात्रों के लिए प्रतिस्पर्द्धा नुकसानदेह हो जाती है। इसी प्रकार कई देश किसी भी वस्तु का निर्यात नहीं कर पाते और कमजोर होते जाते हैं। उनके उपभोक्ताओं को विदेश में बना सस्ता माल अवश्य मिल जाता है, लेकिन घरेलू उत्पाद दबाव में आ जाते हैं। दूसरी समस्या है कि सभी वस्तुओं एवं सेवाओं को मुक्त व्यापार में नहीं शामिल किया जाता। जैसे भारत में सॉफ्टवेयर, अनुवाद कार्य और सिनेमा इत्यादि किफायती होने के साथ अच्छी गुणवत्ता वाले होते हैं, लेकिन आरसेप के तहत केवल वस्तुओं को शामिल किया गया और सेवाओं को इससे बाहर रखा गया। जिन उत्पादित वस्तुओं के मामले में भारत कमजोर है, उनके व्यापार की राह तो खोल दी जाएगी, किंतु जहां भारत सुदृढ़ है, वहां अवरोध बना रहेगा। इसलिए आरसेप भारत के लिए नुकसानदेह है।

इससे जुड़ी तीसरी समस्या छोटे और बड़े उद्योगों की है। मुक्त व्यापार से बड़ी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होता है, क्योंकि वे किसी एक स्थान पर बड़े पैमाने पर माल का उत्पादन कर उसका निर्यात कर सकती हैं। फलस्वरूप छोटे उद्योग दबाव में आ जाएंगे। अपने देश में इसका उदाहरण जीएसटी के रूप में देखा जा सकता है।

जीएसटी के बाद बड़े उद्योगों का दबदबा और बढ़ा है, जबकि छोटे उद्योग और दबाव में आ गए हैं। आरसेप के तहत चीनी कंपनियों का दबदबा कायम होगा और भारतीय छोटे उद्यमों पर दबाव और ज्यादा बढ़ जाएगा। छोटे उद्योगों द्वारा ही बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होते हैं। इस लिहाज से भी आरसेप आम आदमी और किसानों के लिए नुकसानदेह था। इन तीन कारणों से मुक्त व्यापार सिद्धांत नाकाम हो जाता है। ऐसे में भारत का इससे बाहर रहने का फैसला उचित है।

हालांकि यह भी सही है कि मुक्त व्यापार से प्रतिस्पर्द्धा बढ़ती है और उद्यमियों की कार्यकुशलता एवं क्षमताएं बेहतर होती हैं। ऐसे में सरकार के सामने अब यही चुनौती है कि आरसेप से बाहर रहकर अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए। हमें चिंतन करना होगा कि चीन इतना सस्ता माल बनाने में कैसे सक्षम है? इसकी पहली वजह चीन में श्रम कानूनों का कमजोर होना है। दूसरी वजह चीन में सकारात्मक भ्रष्टाचार है। यानी वहां भ्रष्टाचार के माध्यम से उद्योगों को बढ़ावा दिया जाता है, जबकि भारत में ऐसा नहीं है। सरकार को चाहिए कि श्रम कानूनों को नरम बनाए, जिससे श्रमिकों की उत्पादकता बढ़े। इसके साथ ही जमीनी स्तर पर सरकारी कर्मियों के भ्रष्टाचार पर नकेल कसे। चीन का माल सस्ता होने के और भी कारण हैं। जैसे वहां औद्योगिक प्रदूषण को लेकर भारत जितनी सख्ती नहीं है। भारत में उत्पादन लागत ज्यादा होने की एक वजह यह भी है।

प्रदूषण पर रोक के कारण भारत में उत्पादन लागत ज्यादा होने को हमें स्वीकार करना चाहिए और अपनी प्रतिस्पर्द्धा क्षमता बनाए रखने के लिए दूसरे देशों पर यह दबाव डालना चाहिए कि वे भी पर्यावरण की रक्षा के लिए सख्त कदम उठाएं, क्योंकि धरती का पर्यावरण हम सबकी साझा विरासत है। यदि हम श्रम कानूनों और भ्रष्टाचार के मसले पर रवैया सुधार लें तथा पर्यावरण को लेकर दूसरे देशों पर दबाव डालें तो हमारा माल भी दूसरे देशों के मुकाबले प्रतिस्पर्द्धी बनेगा और तब हमें मुक्त व्यापार समझौते के अपेक्षित परिणाम हासिल होंगे।

भविष्य के लिए दूसरा विषय सेवा क्षेत्र का है। भारत को आरसेप में ही नहीं, बल्कि विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ में भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि भारत उन्हीं देशों के साथ वस्तुओं का मुक्त व्यापार समझौता करेगा, जिनके साथ सेवाओं के मुक्त व्यापार का भी समझौता होगा। इससे भारत चीन से सस्ते बल्ब का आयात कर सकेगा और सिनेमा इत्यादि का निर्यात कर सकेगा। तब यह मुक्त व्यापार समझौता हमारे लिए लाभप्रद होगा। एक अन्य विषय छोटे उद्योगों के संरक्षण का है। हमारा देश बड़ी आबादी वाला है। यहां बड़ी संख्या में युवा रोजगार को तरस रहे हैं। इसीलिए हमें दिग्गज विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में आयातित माल पर विशेष आयात कर लगाने चाहिए। तभी अपने देश में छोटे उद्योग पनप सकेंगे और आम आदमी को रोजगार और जीवन का अवसर मिल सकेगा। रोजगार होने पर ही सस्ते माल की सार्थकता है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने आरसेप से बाहर रहने का फैसला किया है। इस बीच सरकार श्रम कानूनों में सुधार, सेवाओं के निर्यात एवं छोटे उद्योगों के संरक्षण के लिए कोई बड़ी पहल करे, ताकि लोगों के जीवन स्तर में सुधार हो सके।

स्रोत–  नई दुनिया

आसियान और भारत

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने थाइलैंड की राजधानी बैंकाक में सोलहवें भारत-आसियान सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा है कि भारत की ‘‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ हमारी हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) नजरिये का अहम हिस्सा है, और आसियान इसके केंद्र में है। हालांकि भारत आसियान का सदस्य नहीं है, लेकिन आसियान देशों की भू-राजनीतिक और सामरिक स्थिति इस बात पर बल देती है कि नई दिल्ली इन देशों के साथमजबूत रिश्ता रखे। इस क्षेत्रमें चीन अत्यधिक सक्रिय है, और लगातार अपना वर्चस्व बढ़ा रहा है। चीन के वर्चस्व बढ़ाने के प्रयासों को प्रभावहीन बनाने और इस क्षेत्र में संतुलन कायम करने की दृष्टि से भारत का आसियान देशों के साथरणनीतिक रिश्ते मजबूत करना अति आवश्यक है। भारत का आसियान के सदस्य देशों के साथ जमीन, वायु और समुद्री संपर्क बढ़ाने से क्षेत्रीय व्यापार और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। आसियान 10 देशों का समूह है, जिसमें इंडोनेशिया, मलयेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाइलैंड, ब्रूनेई, वियतनाम, लाओस, म्यांमार और कंबोडिया शामिल हैं। भौगोलिक रूप से ये सभी देश भारत और चीन, दोनों के करीब हैं, लेकिन सांस्कृतिक रूप से वियतनाम को छोड़कर ज्यादातर आसियान देश भारत के ज्यादा करीब हैं। भारत अपनी ‘‘लुक ईस्ट’ और ‘‘एक्ट ईस्ट’ नीति के तहत आसियान देशों के साथ जुड़कर अपने आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक रिश्ते मजबूत कर रहा है। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर आसियान के सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया था। सभी राष्ट्राध्यक्ष गणतंत्र दिवस पर उपस्थित भी हुए थे, जो क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भारत की पहचान की तस्दीक करता है। इस सोलहवें भारत-आसियान सम्मेलन की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर यह माना जा सकता है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्रमें भारत की बढ़ती भूमिका को आसियान नेताओं ने पहली बार रेखांकित किया है। भारत को चाहिए कि वह आने वाले समय में इस संगठन को एकीकृत और आर्थिक रूप से गतिशील बनाने की दिशा में आने वाली बाधाओं से आसियान नेताओं को अवगत कराए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा भी है कि एकीकृत और आर्थिक रूप से गतिशील आसियान भारत के हित में है।

स्रोत–  राष्ट्रीय सहारा

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