11-10-2019 (Newspaper Clippings)

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असाधारण मॉनसून

इस वर्ष के मॉनसून को इतिहास में कई अस्वाभाविक घटनाओं के लिए याद किया जाएगा। यद्यपि मॉनसून का चार महीने का मौसम 30 सितंबर को आधिकारिक रूप से समाप्त हो जाता है लेकिन इस वर्ष दूर-दूर तक इसका कोई निशान नजर नहीं आ रहा है। भारतीय मौसम विभाग का मानना है कि 10 अक्टूबर के पहले मॉनसून की वापसी होती नहीं दिखती। इससे पहले सन 1961 में मॉनसून ने 1 अक्टूबर को लौटना शुरू किया था। यानी, आधिकारिक तौर यह मॉनसून का सबसे लंबा ठहराव है। इसके अलावा इस वर्ष हुई कुल बारिश भी 25 वर्षों में सर्वाधिक है।

सितंबर के अंत तक सर्वोच्च स्तर से 10 फीसदी अधिक बारिश दर्ज की जा चुकी है। इसके अलावा सन 1931 के बाद से यह पहला मौका है जब मॉनसून कमजोर शुरुआत के बाद इस कदर वापसी करने में सफल रहा कि जून में बारिश की 33 फीसदी कमी दूर हो गई और वर्षा का स्तर सामान्य से बेहतर श्रेणी में चला गया। मोटे तौर पर ऐसा अगस्त-सितंबर में अत्यधिक तेज बौछारों की वजह से हुआ। सितंबर में हुई बारिश औसत से 52 फीसदी अधिक रही। बीते 102 वर्षों में यह सितंबर सबसे अधिक बारिश वाला रहा।

इसके अलावा बारिश का रुझान कुछ ऐसा रहा कि वह मॉनसून के आगमन और वापसी, शुरुआती मौसम की बारिश और अतिरंजित मौसम की घटनाओं को लेकर सोच और विश्लेषण में बदलाव की मांग करता है। बारिश को लेकर मौजूदा सामान्य स्तर सन 1941 में तय किए गए थे और उन्हें अब लागू नहीं माना जा सकता है। कह सकते हैं कि ऐसा जलवायु परिवर्तन की वजह से हुआ है। मॉनसून अब पहले निर्धारित तिथियों के मुकाबले देरी से आता और जाता है। अब यह शुरुआती मौसम में धीमा रहता है। बीते 11 में से सात वर्षों में जून यानी मॉनसून के पहले महीने में बारिश सामान्य से कम रही। तेज बारिश की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इतना ही नहीं पूर्वोत्तर भारत अब उच्च वर्षा वाला क्षेत्र नहीं रहा। सन 1990 और 2000 के दो दशकों की अच्छी बारिश के बाद अब इस क्षेत्र मेंं कम बारिश हो रही है। जलवायु में यह बदलाव कृषि क्षेत्र पर व्यापक असर डालेगा। ऐसे में फसल चक्र और कृषि अर्थव्यवस्था की गतिविधियों में समायोजन की आवश्यकता है। जल प्रबंधन से जुड़े व्यवहार में भी बदलाव लाना होगा।

मॉनसून में यह इजाफा अल नीनो (प्रशांत सागर के गर्म होने) के कमजोर होने से हुआ है। इसके साथ ही जुलाई में हिंद महासागर के तापमान में बदलाव आया है। दिलचस्प बात है कि मौसम विभाग ने अन्य वैश्विक व घरेलू एजेंसियों की तुलना में अल नीनो के कमजोर पडऩे का सटीक अनुमान लगाया। इन एजेंसियों को लग रहा था कि इसके चलते मॉनसून कमजोर बना रहेगा। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मौजूदा मॉनसून की विचित्रताओं के अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पडऩे की आशंका नहीं है।

अनुमान लगाया जा रहा है कि मौजूदा खरीफ सत्र में फसल उत्पाद सामान्य रहेगा। इसके रबी सत्र से बेहतर रहने की आशा है क्योंकि देर से बारिश होने से मिट्टी में नमी बरकरार रही। देश के 113 बड़े जलाशयों का जल स्तर पिछले वर्ष से 15 फीसदी अधिक और बीते 10 वर्ष के औसत से 21 फीसदी अधिक है। अधिकांश बांधों के गेट खोलकर ज्यादा पानी बहाना पड़ा। यह सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन और जल संबंधी अन्य औद्योगिक गतिविधियों के लिए फायदेमंद है। ये सारी बातें आर्थिक गतिविधियों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

स्रोत –  बिजनेस स्टैंडर्ड

हिमखंड का टूटना

 

दक्षिणी ध्रुव के बर्फीले अंटार्कटिका में सदियों से जमे हुए विशाल हिमखंड का एक हिस्सा टूट गया है। इस खबर की गंभीरता का अंदाज हम इस बात से लगा सकते हैं कि यह अलग हुआ हिस्सा इतना बड़ा है कि उस पर पूरे दिल्ली महानगर को बसाया जा सकता है और उसके बाद भी उसमें गाजियाबाद और मेरठ शहर को बसाने लायक जगह बच जाएगी।

कई वैज्ञानिकों के लिए यह बड़ी खबर नहीं है, क्योंकि हिमखंड टूटने वाला है, इसकी भविष्यवाणी वे पिछले काफी समय से कर रहे थे। लेकिन दिलचस्प यह है कि वैज्ञानिक अंटार्कटिका के उस हिस्से पर नजर गड़ाए हुए थे, जिसे अंग्रेजी में ‘लूज टूथ’ कहा जाता है, क्योंकि एक तो उसकी आकृति बच्चों की दांत जैसी है और दूसरे, बच्चों की दांत जैसे ही उसके टूटने की भी आशंका थी। पर उनकी आशंकाओं को धता बताता हुआ अंटार्कटिका के हिमखंड का एक अन्य हिस्सा टूट गया।

वैसे धरती-ध्रुवों के हिमखंड निरंतर टूटते, उतरते और बनते रहते हैं, लेकिन पचास साल बाद पहली बार इतना बड़ा हिमखंड टूटा है। इसीलिए इस बार की टूटन ने चिंता की ज्यादा बड़ी लकीरें दी हैं। एक और संयोग यह है कि यह हिमखंड उस समय टूटा है, जब कुछ दिन पहले ही ऐसी चिंताओं के बीच संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण सम्मेलन हुआ था। पूरी दुनिया के शीर्ष नेता वहां जुटे थे, लेकिन धरती के पर्यावरण को बचाने का कोई ठोस आश्वासन उस सम्मेलन से नहीं मिल सका।

यह सच है कि हिमखंड पहले भी टूटते रहे हैं। कहा जाता है कि ऐसे ही एक हिमखंड के टुकड़े से टकराकर किसी जमाने में दुनिया का सबसे विशाल और सुरक्षित माना जाने वाला जहाज टाइटेनिक डूब गया था। लेकिन इस बार एक फर्क है कि हमारे पास इसकी सिर्फ खबर या किताबों में दर्ज रिकॉर्ड भर नहीं है, बल्कि उपग्रह से खींची गई इसकी तस्वीरें और इसका वीडियो भी है। इनके जरिए इसका एक एनीमेशन भी तैयार कर दिया गया है, जो इस समय दुनिया भर के सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा शेयर किया जा रहा है। लेकिन इसके पीछे दृश्य का वह कौतुक ज्यादा है, जो हमें दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर करता है।

इनमें चिंताएं जरूर दिखती हैं, पर धरती को बचाने का कोई ठोस संकल्प इसमें अभी तक नहीं दिख रहा।
हिमखंड पहले भी टूटते रहे हैं, इसलिए वैज्ञानिक अभी तक तय नहीं कर पा रहे कि इसे पर्यावरण बदलाव का नतीजा माना जाए या नहीं। एक बात पर सहमति जरूर दिख रही है कि इससे तुरंत ही समुद्र का जलस्तर बढ़ने वाला नहीं है, क्योंकि जो हिस्सा टूटा है, वह भी एक हिमखंड ही है। खतरा तब होता, जब वह पूरी तरह पिघल जाता। चिंता का कारण दरअसल दूसरा है। पहले जब हिमखंड के हिस्से टूटते थे, तो उसकी भरपाई कुछ अरसे में अपने आप ही हो जाती थी। धरती के ध्रुवों के पास समुद्र के खारे पानी को बर्फ में बदल देने की प्राकृतिक क्षमता हमेशा से ही रही है। फिलहाल चिंता इसलिए है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते यह क्षमता लगातार कमजोर पड़ती जा रही है। वैज्ञानिक मानते हैं कि ध्रुवों की बर्फ लगातार पिघल रही है, भविष्य में इसमें और तेजी आने की आशंकाएं हैं। अंटार्कटिका की सदियों से जमी ठोस बर्फ ने टूटकर अपनी चेतावनी जारी कर दी है। क्या दुनिया भर के लोग, खासकर नेता इसे सुन रहे हैं?

स्रोत –  हिंदुस्तान

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