11-08-2019 (Newspaper Clippings)

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संविधान को मिला नया विस्तार

हरबंश दीक्षित

जम्मू-कश्मीर से जुड़ी अधिसूचना को लेकर पूरे देश में काफी बहस छिड़ी हुई है। उसे लेकर परस्पर विरोधी दावे किए जा रहे हैं। कुछ लोग केंद्र सरकार की नीयत को लेकर आशंका जता रहे हैं, तो कुछ लोगों को सरकार के अधिकार क्षेत्र को लेकर असमंजस है। मीडिया में आने वाली कुछ खबरों में कहा जा रहा है कि अनुच्छेद 370 को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है, तो कुछ लोग यह मान बैठे हैं कि जम्मू-कश्मीर राज्य तुरंत प्रभाव से दो भागों में बांट दिया गया है। वास्तविक स्थिति इससे अलग है। पहला यह कि अनुच्छेद 370 को समाप्त नहीं किया गया है। इसे इस तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। उसके लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता पड़ेगी। इस अधिसूचना का दूसरा प्रभाव यह है कि इसके द्वारा भारत के संविधान को समग्र रूप से जम्मू-कश्मीर पर भी लागू कर दिया गया है। इस आधार पर संविधान के अनुच्छेद 2 से 5 में दिए गए अधिकारों के तहत केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन का प्रस्ताव एक विधेयक के रूप में संसद के सामने रखा गया है। इसके द्वारा संविधान के कई उपबंधों में संशोधन होगा, और यह तभी लागू होगा, जब दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाए।

गृह मंत्री के राज्य सभा के बयान को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले भाग में राष्ट्रपति की अधिसूचना के बारे में सदन को सूचित किया गया। दूसरे भाग में जम्मू-कश्मीर राज्य को दो भागों में बांटने के लिए जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक को सदन के सामने रखा गया। इसके द्वारा जम्मू-कश्मीर को ऐसा केंद्रशासित क्षेत्र बनाने का प्रस्ताव है, जिसकी विधानसभा होगी और लद्दाख को ऐसा केंद्रशासित क्षेत्र बनाने का प्रस्ताव है, जिसकी विधानसभा नहीं होगी।

राष्ट्रपति की अधिसूचना में कहा गया है कि यह पूर्व की इस तरह की सभी अधिसूचनाओं का अतिक्रमण करेगी और तुरंत प्रभाव से लागू होगी। आगे इसमें यह कहा गया है कि संविधान के सभी उपबंध जम्मू-कश्मीर राज्य पर भी लागू होंगे। इसका प्रभाव यह है कि भारत के संविधान के लिए जम्मू-कश्मीर राज्य अब एक ऐसा अलग द्वीप नहीं रहेगा, जिस पर संविधान का बड़ा हिस्सा लागू नहीं होता था। अब जम्मू-कश्मीर राज्य के नागरिकों को भी संविधान के भाग तीन में दिए गए सभी मूल अधिकार हासिल होंगे।

वहां के नागरिक को समानता का मूल अधिकार हासिल होगा। महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक हासिल होगा। जाति-धर्म-मूल-वंश या लिंग के आधार पर भेद-भाव नहीं होगा। समाज के वंचित लोगों को आरक्षण का लाभ लेकर मुख्यधारा में शामिल होने का मौका मिलेगा। छुआछूत के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव समाप्त हो सकेंगे। सभी को वहां संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का मूल अधिकार हासिल होगा और धार्मिक या भाषायी अल्पसंख्यकों को भी देश के दूसरे भागों में रहने वाले अल्पसंख्यकों की तरह अनुच्छेद 29 तथा 30 के तहत संरक्षण मिल सकेगा। वे अपनी भाषायी या सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखने के लिए संस्थाएं बना सकेंगे और उन्हें संचालित कर सकेंगे।

नई अधिसूचना से होने वाले परिवर्तनों की सूची बहुत लंबी है। वहां पर राज्य के नीति निर्देशक तत्वों और मूल कर्तव्यों से जुड़ा अध्याय लागू होगा, जिसका मतलब यह हुआ कि राज्य की जिम्मेदारी होगी कि वह इस व्यवस्था को लागू करे। विभिन्न वर्गों के बीच की आर्थिक खाई को कम करे। महिलाओं के लिए विशेष प्रसूति सुविधाएं मुहैया कराए। गरीबों को नि:शुल्क कानूनी सहायता दे। गरीब छात्रों को अच्छे शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश दिलवाने की व्यवस्था करे। महिलाओं को पुरुषों के बराबर वेतन सुनिश्चित करे और नागरिकों के जीवन स्तर सुधारने के लिए काम करे। मूलभूत कर्तव्यों के लागू होने का असर यह होगा कि राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना होगा। राष्ट्रीय धरोहरों को संरक्षित करने तथा बच्चों को स्कूल भेजने जैसे दायित्व भी वहां के नागरिकों पर उसी तरह से प्रभावी हो सकेंगे।

जम्मू-कश्मीर राज्य में इस तरह के भेदभाव की मुख्य वजह अनुच्छेद 35 के उपबंध थे। यह संविधान के मूल पाठ में नहीं था, इसलिए इसके साथ अनुच्छेद शब्द लिखना ही उचित नहीं था। अनुच्छेद 35-ए एक प्रशासनिक आदेश था, जिसे राष्ट्रपति द्वारा 14 मई, 1954 को जारी किया गया था। इसे संसद के सामने नहीं रखा गया और इस तरह से पेश किया गया, जैसे कि यह संविधान का हिस्सा हो। इसका सबसे अधिक आश्चर्यजनक पक्ष तो यह है कि इसे जिस अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जारी किया गया, उसकी शुरुआत ही संविधान को नकारने से होती है। कहा गया था कि अनुच्छेद 35-ए में उल्लिखित विषयों पर बनाए गए कानून का भारत के संविधान के अनुरूप होना जरूरी नहीं है। इसका सबसे रहस्यमय पहलू यह है कि जिस संविधान में एक विराम या अल्पविराम में भी संशोधन के लिए दोनों सदनों के विशेष बहुमत की और कुछ मामलों में राज्यों की सहमति की जरूरत पड़ती है, उसमें केवल प्रशासनिक आदेश द्वारा आमूल परिवर्तन कर दिया गया, और वह रहस्यमय ढंग से पिछले 65 वर्षों से लागू रहा। लोगों को मूल अधिकारों से वंचित करता रहा। यहां तक कि संविधान के मूल ढांचे को लेकर कोई सार्थक बहस नहीं की गई।

मीडिया की खबरों को देखकर ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति की मौजूदा अधिसूचना तथा राज्य पुनर्गठन के संबंध में मूल बहस सरकार के क्षेत्राधिकार को लेकर है। इस संबंध में कुछ बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं। पहली यह कि अनुच्छेद 35-ए की अधिसूचना राष्ट्रपति द्वारा जारी की गई थी। उसे संविधान के अनुच्छेद 370 (1) के तहत जारी किया गया था। अनुच्छेद 370 (1) में व्यवस्था है कि उसे राज्य सरकार की सहमति के बगैर जारी नहीं किया जा सकता और अनुच्छेद 35-ए को जोड़ने का आदेश राष्ट्रपति द्वारा राज्य सरकार की सहमति से 14 मई, 1954 को जारी किया गया था। सोमवार की अधिसूचना को स्पष्ट रूप से राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद-370 के खंड (1) में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए जम्मू-कश्मीर सरकार की सहमति से जारी किया गया है। इसलिए इसमें कोई तकनीकी खामी नहीं है। जिस प्रक्रिया द्वारा पिछली अधिसूचना से अनुच्छेद 35-ए को लागू किया गया था, उसी प्रक्रिया का पालन करते हुए पिछली अधिसूचना को निष्प्रभावी कर जम्मू-कश्मीर में संविधान को समग्रता से लागू कर दिया गया है।


अलगाववाद का खादपानी था

अग्निशेखर

भारत के इतिहास में एक निर्णायक फैसले का दिन घटित हुआ है। बहुत कम बार ऐसा होता है, जब आपके सामने ही देश और इतिहास बदलता है। धारा 370 और उसके साथ 35-ए का समाप्त होना जम्मू-कश्मीर, लद्दाख की दृष्टि से एक युगांतकारी घटना है। जिससे जम्मू, लद्दाख और अन्य देशभक्त नागरिकों के लंबे संघर्ष और जिजीविषा के चलते आज केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की भूमिका से धर्मनिरपेक्ष भारत में मुस्लिम राज्य के समान और एक अलगाववादी मुस्लिम वर्चस्व की राजनीति का अंत हुआ है।

धारा 370 के एक भुक्तभोगी नागरिक के नाते मैं कह रहा हूं कि इसी ने अलगाववादी सोच को जन्म दिया, जिसके चलते आतंकवाद का जन्म हुआ। और जिसे आगे चलकर विशेष दरजा कहा गया या कश्मीरियत कह के प्रचारित व प्रसारित किया गया, आज यह सिद्ध हुआ कि मुस्लिम धार्मिक अस्मिता के साथ छेड़छाड़ है। अर्थात जिसे आज तक ये लोग कश्मीरियत को मुखौटे के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे, वह दरअसल मुस्लिम सांप्रदायिक राजनीति थी। अगर ऐसा नहीं था जैसा कि कश्मीर का नेतृत्व आज तक कहता रहा है कि कश्मीरियत की लड़ाई थी तो लाखों कश्मीरी पंडितों को रातों-रात क्यों घर-बार छोड़ने का फरमान सुनाया गया? धारा 370 के रहते सन् 1990 में क्यों कश्मीरी पंडितों को जलावतनी का शिकार बनाया गया। अगर ऐसे नियम और कानून सही थे और कश्मीरियत के लिए थे तो ऐसा नहीं होना चाहिए था। साबित होता है कि 370 एक मुस्लिम अलगाववादी सांप्रदायिक राजनीति के वर्चस्व का मुखौटा भर था। और इसे धराशायी करने के साथ ही भारत देश के बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक चरित्र के भविष्य और भाग्य पर मंडरा रहे खतरे का अंत हुआ। अब चूंकि लद्दाख केंद्र शासित राज्य बन चुका है, जो दशकों से कश्मीर केंद्रित मुस्लिम राजनीति के वर्चस्व के नीचे छटपटा रहा था। उसके साथ जो अन्याय और भेदभाव था, उसके विरोध में वह लोग दशकों से लड़ाइयां लड़ रहे थे।

उनकी वर्षों से सियासी आवाज थी कि वे बजाय कश्मीर के सीधे केंद्रशासित क्षेत्र में रहें। इसी तरह, जम्मूवासी भी कश्मीर केंद्रित राजनीति से नाराज और उपेक्षित और अन्याय से जूझते आए हैं और धर्मनिरपेक्ष भारत में या तथाकथित कश्मीरियत वाले कश्मीर से कश्मीरी पंडितों की जलावतनी में देश भर में और विदेशों में भी संघर्ष चला रहा था, उस दिशा में भी 370 का हटाया जाना एक उपलिब्ध ही माना जाएगा। नि:संदेह यह एक युगांतकारी घटना है। इसके साथ ही कश्मीर के नेताओं में ब्लैकमेल व शोषण की राजनीति का भी खात्मा हो गया। इसके अलावा, केंद्र सरकारों ने विगत में एक ठंडा रवैया अपनाए रखा, जिसके चलते अलगाववादी नेता पैदा हुए। इसमें शेख अब्दुल्लाह से लेकर महबूबा मुफ्ती तक शामिल हैं। और केंद्र की सरकारें इसी अलगाववाद के रास्ते और इन लोगों के साथ प्रयोग करके कश्मीर में स्थायी शांति के असफल प्रयोग करते आए हैं। आज वह ठंडा रवैया या टालू सोच भी जमींदोज हो गया। कड़े शब्दों में कहें तो पिछले 70 साल में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख की जो बेटियां राज्य से बाहर ब्याही गई हैं और 370 के अंतर्गत उसकी जो नागरिकता समाप्त हुई थी, उसकी आज बहाली का पहला दिन है।लद्दाख और जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित घोषित करने से उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत मजबूत हुआ है।

इस संघर्ष में लाखों निर्वासित कश्मीरी पंडितों की वापसी की उम्मीदें फलीभूत होंगी, ऐसी आशा की जानी चाहिए। लाखों कश्मीरी पंडित कश्मीर घाटी के अंदर एक ही स्थान पर राजनीतिक और संवैधानिक अधिकार व गारंटी के साथ बसना चाहते हैं ताकि उन्हें फिर से न निकाला जाए। और इसके साथ ही हम सरकार से अपेक्षा करते हैं कि वह कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को स्वीकार करे और फिर उसे पलटने के लिए जरूरी कदम उठाए। आज तक कि सरकारों ने कश्मीरी पंडितों के जलावतनी को समुचित शब्दावली तक नहीं दी। इसे एक विस्थापन कहकर गौण कर दिया गया। जबकि हमारा विस्थापन घृणा की धार्मिक राजनीति के कारण घटित हुई थी। इसलिए इसे विस्थापन कहना अपमानजनक है। हम चाहेंगे कि सरकार हमारी त्रासदी को सही नाम से पुकारे और तद्नुसार निर्णायक कदम उठाए ताकि इस धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत में किसी भी राज्य में किन्हीं भी लोगों के साथ ऐसी त्रासदी न घटे, जिसके हम शिकार हुए। सरकार सुप्रीम कोर्ट के रिटार्यड जज की अध्यक्षता में एक आयोग का भी गठन करे जो खून-खराबा करने वालों की पहचान कर उन्हें दंडित करे।

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