10-08-2019 (Newspaper Clippings)

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इतिहास की भूल सुधारता एक ऐतिहासिक फैसला

गौतम चौधरी

संसद में पेश किए गए संकल्प और धारा 370 को वापस लेने के बाद अब जम्मू -कश्मीर को वह अधिकार प्राप्त नहीं रहेगा जो पहले था। इसलिए यह फैसला सचमुच भाजपा सरकार का ऐतिहासिक फैसला है। भाजपा अपने घोषणा पत्र में सदा से इस बात को जोड़ती रही थी कि वह पूरे देश में एक प्रकार का संविधान लागू करेगा। इस संकल्प को भाजपा ने पूरा किया और उसने न केवल तीन तलाक विधेयक संसद के दोनों सदनों में पास करवाया अपितु कश्मीर को भी विशेष दर्जा से मुक्त कर दिया

जम्मू -कश्मीर को स्वायतता देने वाला अनुच्छेद 370 को मोदी सरकार ने खत्म कर दिया। नि:संदेह यह नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतंत्रिक गठबंधन सरकार का ऐतिहासिक फैसला है। दरअसल, स्वतंत्रता के समय द्विराष्ट्रवाद केसिद्धांत को लेकर जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हो रहा था तो देश की कुछ रियासतों ने अपने आप को दोनों देशों से अलग स्वतंत्र अस्तित्व की बात की थी, जिसमें जम्मू -कश्मीर, हैदराबाद के निजाम, जूनागढ़ प्रमुख थे। चूंकि हैदराबाद और जूनागढ़ भारत के आंतरिक भाग में था इसलिए अंततोगत्वा दोनों को भारतीय संघ में विलय के लिए मजबूर होना पड़ा, लेकिन जम्मू -कश्मीर की भौगोलिक स्थिति उसे अलग बना रही थी। कश्मीर के तात्कालीन राजा महाराजा हरिसिंह ने जम्मू -कश्मीर को अलग रखने का पूरा मन बना लिया था लेकिन इसी बीच पाकिस्तान की ओर से अफगानी कबालियों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया। इस अचानक हमले से राजा घबरा गए और सहायता के लिए भारत की ओर हाथ बढ़ाया। भारत ने सशर्त सहयोग का आश्वासन दिया और अपनी सेना भेज दी। युद्ध हुआ, लेकिन तबतक पाकिस्तानी कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कव्जा कर चुके थे।

कश्मीर का अधिकतर हिस्सा भारत में रहा और कुछ हिस्से पर पाकिस्तान का कव्जा हो गया। भारत पाकिस्तान के बीच झूल रहे जम्मू -कश्मीर को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू संयुत राष्ट्र में ले गए लेकिन वहां भी मामला उलझा ही रहा। इसके कारण कश्मीर का मामला दिन ब दिन उलझता ही गया। चूंकि पाकिस्तान के साथ कश्मीर में युद्ध की स्थिति बनी थी और वहां अशांति भी थी साथ ही पूरा का पूरा कश्मीर भी भारत का अंग नहीं बन पाया था इसलिए भारत का संविधान वहां की विधानसभा में पारित नहीं हो पाया। ऐसी परिस्थिति में कश्मीर को भारत का अंग बनाए रखने के लिए संविधान में अलग से एक व्यवस्था दी गई जिसे धारा 370 के नाम से जाना गया। इसके बाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और कश्मीर के राजा महाराजा हरि सिंह के सिपहसालार शेख अदुल्ला के बीच 1954 में एक समझौता हुआ। उस समझौते के तहत एक आदेश से अनुच्छेद 35-ए को भारतीय संविधान में जोड़ा गया था। इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल करने से कश्मीरियों को यह विशेषाधिकार मिला कि बाहरी यहां नहीं बस सकते हैं। 35-ए से जम्मू -कश्मीर को विशेषाधिकार मिला हुआ था।

जम्मू -कश्मीर से बाहर का कोई भी व्यति यहां अचल सम्पत्ति नहीं खरीद सकता है। इसके साथ ही कोई बाहरी व्यति यहां की महिला से शादी करता है तब भी सम्पत्ति पर उसका अधिकार नहीं हो सकता है। लेकिन इस दर्जे को लेकर पूरे देश में असंतोष था। खासकर भारतीय जनता पार्टी इसे दो विधान, दो प्रधान, दो निशान मानती रही और इसके खिलाफ आन्दोलन करती रही। जम्मू -कश्मीर को लेकर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में अखिल भारतीय जनसंघ ने सबसे पहले आन्दोलन प्रारंभ किया। उस आन्दोलन में डॉ. मुखर्जी गिरफ्तार हुए और जम्मू – कश्मीर में ही उनकी मौत हो गई। कश्मीर पूरा न तो भारत के पास है और न ही पाकिस्तान के पास है। कश्मीर को भारत द्विपक्षीय मुद्दा मानता है जबकि पाकिस्तान को तीसरे पक्ष से परहेज नहीं है। पाकिस्तान कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग करता रहा है लेकिन भारत सदा से इसके पक्ष में नहीं रहा। भारत का कहना है कि वहां भारतीय संविधान के आधार पर प्रत्येक पांच साल पर संसद के चुनाव हो रहे हैं और व्यवस्थित विधानसभा है इसलिए जम्मू -कश्मीर में जनमत संग्रह की कोई जरूरत नहीं है। अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू -कश्मीर का अपना संविधान था। इसके साथ ही सुरक्षा और विदेश मामलों को छोड़कर हर फैसला लेने का अधिकार था। संविधान के इस हिस्सा के हटने से संविधान से कश्मीर को मिला विशेष दर्जा अब खत्म हो गया है। हालांकि जानकार बताते हैं कि 1947 में स्वायत्तता के आधार पर ही कश्मीर भारत के साथ आया था

लेकिन भारतीय पक्ष इस बात को नकारता रहा है। भारतीय पक्ष, खासकर भाजपा से संबंधित चिंतकों का दावा है कि जम्मू – कश्मीर में चूंकि पाकिस्तान हावी हो रहा था इसलिए वहां के राजा ने भारत के साथ विलय की सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किया। अनुच्छेद 370 से जम्मू -कश्मीर को संविधान में विशेष दर्जा मिला हुआ था। इसे गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में खत्म करने घोषणा कर दी। इससे पहले प्रधानमंत्री के आवास पर कैबिनेट की बैठक हुई थी। अमित शाह ने कहा कि जम्मू – कश्मीर का फिर से पुनर्गठन किया गया है। जम्मू -कश्मीर को दो हिस्सों में केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया है। जम्मू -कश्मीर एक केंद्र शासित प्रदेश होगा और दूसरा लद्दाख केन्द्र शासित प्रदेश होगा। जम्मू -कश्मीर में विधानसभा होगी जबकि लद्दाख फिलहाल केन्द्र के जिमे रहेगा। केन्द्रीय गृहमंत्री के द्वारा संसद में पेश किए गए संकल्प और धारा 370 को वापस लेने के बाद अब जम्मू -कश्मीर को वह अधिकार प्राप्त नहीं रहेगा जो पहले था। इसलिए यह फैसला सचमुच भाजपा सरकार का ऐतिहासिक फैसला है। भाजपा अपने घोषणा पत्र में सदा से इस बात को जोड़ती रही थी कि वह पूरे देश में एक प्रकार का संविधान लागू करेगा। इस संकल्प को भाजपा ने पूरा किया और उसने न केवल तीन तलाक विधेयक संसद के दोनों सदनों में पास करवाया अपितु कश्मीर को भी विशेष दर्जा से मुक्त कर दिया।


या कुछ रह गया है अब अनुच्छेद 370 में?

भूपेन्द्र गुप्ता

1947 में अनुच्छेद 370 को जिस स्वरूप में लागू किया गया था, समय समय पर होने वाले परिवर्तनों ने इसे पूरी तरह बदल दिया। यह विषय इसलिए समीचीन है कि कश्मीर पर होने वाली आक्रामक बहसों में लोग यह भूल ही जाते हैं कि अनुच्छेद 370 मूल स्वरूप में बचा ही कहां।

भारत में जब भी कश्मीर या उसकी समस्याओं की चर्चा होती है, संविधान का अनुच्छेद 370 जिसके तहत कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्राप्त है, चर्चा के केंद्र में आ जाता है। 1947 में अनुच्छेद 370 को जिस स्वरूप में लागू किया गया था या आज भी यह अनुच्छेद उसी स्वरूप में बाकी है, या समय समय पर होने वाले परिवर्तनों ने इसे पूरी तरह बदल दिया है। यह विषय इसलिए समीचीन है कि कश्मीर पर होने वाली आक्रामक बहसों में लोग यह भूल ही जाते हैं कि आज अनुच्छेद 370 किस स्वरूप में बचा है। धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार संसद को जम्मू कश्मीर के बारे में सुरक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में ही कानून बनाने का अधिकार है। लेकिन अन्य किसी विषय से संबंधित कानून को लागू कराने के लिए केंद्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिए। ये प्रावधान संविधान के 21वें भाग में समाविष्ट है जिन्हें अस्थाई प्रावधान कहा गया है । इसी विशेष दर्जे के कारण जम्मू -कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती थी जिसे 1964 के संशोधन के बाद 356 एवं धारा 357 को राज्य पर लागू कर दिया गया तथा राष्ट्रपति को इस अनुच्छेद के अनुसार वैधानिक व्यवस्था गडबड़ाने पर राष्ट्रपति शासन लागू करने का अधिकार दे दिया गया है। 1976 का भूमि कानून कश्मीर पर लागू नहीं होता । संविधान की धारा 360 के अन्तर्गत वित्तीय आपातकाल लगाने का भी प्रावधान नहीं किया जा सकता है। भारत के उच्चतम न्यायालय के आदेश जम्मू -कश्मीर के अंदर मान्य नहीं होते थे। 1960 में सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू -कश्मीर उच्च न्यायालय के विरुद्ध अपीलों को स्वीकार करना शुरू किया है तथा उसे अधिकृत किया गया है। धारा 370 की वजह से कश्मीर में सीएजी, आर.टी.आई. जैसे कानून लागू नहीं होते थे जिन्हें 1958 में लागू कर दिया गया । इस कानून के तहत आई.ए.एस., आई.पी.एस. की नियुतियां कश्मीर में नहीं होती थी। 1958 से यह केंद्रीय सेवाएं भी वहां शुरू हो चुकी है कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है। भारत संसद को जम्मू -कश्मीर के संबंध में अत्यंत सीमित क्षेत्र में कानून बना सकती है। कश्मीर के राज्य प्रमुख को सदर-ए रियासत और मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा जाता था। यह मुद्दा भी 1966 में जम्मू -कश्मीर विधानसभा में पारित सुधार से बदल दिया गया है। प्रधानमंत्री के स्थान पर मुख्यमंत्री तथा सदर-ए रियासत के स्थान पर राज्यपाल पद नामों को स्वीकृत कर प्रयोग करने की स्वीकृति दी जा चुकी है। पहले सदर-ऐ रियासत का चुनाव विधान सभा द्वारा हुआ करता था, किन्तु अब राज्यपाल की नियुति राष्ट्रपति द्वारा होने लगी है।

समय-समय पर आपसी बातचीत और परस्पर सहमति से इस अनुच्छेद के कई बिंदुओं में परिवर्तन हो चुका है। 1954 से कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए है। 1954 में ही चुंगी केंद्रीय आबकारी, नागरिक उड्यन और डाकतार विभाग के कानून तथा नियम जम्मू -कश्मीर में लागू किए गए हैं। 1959 में आपसी समझ से ही भारतीय जनगणना का कानून भी जम्मू कश्मीर में लागू हुआ है। 1965 में श्रमिक कल्याण, श्रमिक संगठन, सामाजिक सुरक्षा तथा सामाजिक बीमा संबंधी केंद्रीय कानून भी राज्य में लागू हुए हैं। 1966 में लोकसभा में प्रत्यक्ष मतदान द्वारा निर्वाचित अपना प्रतिनिधि भेजने का अधिकार भी दिया गया है। 1971 में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत विभिन्न प्रकार के मामलों की सुनवाई करने का अधिकार उच्च न्यायालय को दिया गया। 1986 में अनुच्छेद 249 के प्रावधान भी जम्मू -कश्मीर राज्य पर लागू हुए हैं। इस धारा में ही उसके सपूर्ण समाप्ति की व्यवस्था भी बताई गई है। धारा 370 का उप अनुच्छेद -3 बताता है कि पूर्ववर्ती प्रावधानों में कुछ भी लिखा हो राष्ट्रपति प्रकट सूचनाओं द्वारा यह घोषित कर सकते हैं कि यह धारा कुछ अपवादों और संशोधनों को छो? दिया जाए तो वह समाप्त की जा सकती हैं। इस धारा का एक परन्तुक भी है, जो कहता है कि इसके लिए राज्य की संविधान सभा की मान्यता चाहिए। किन्तु अब राज्य की संविधान सभा ही अस्तित्व में नहीं है ।

देखा जाए तो अनुच्छेद 370 जिस स्वरूप में 1947 लागू किया गया था अब उसके केवल भूमि, स्वामित्व के अधिकार महिलाओं के अन्य राज्यों में विवाह करने पर प्रभावित होने वाले नागरिकता अधिकार आदि कुछ मुद्दे बचे हैं जिनसे यह अनुच्छेद बार-बार चर्चा में आता है। किन्तु देखा यह गया है कि ऐसे अधिकार हमारे संविधान में अन्य राज्यों को भी दिए गये हैं। विशेषाधिकार प्राप्त राज्यों में गुजरात, महाराष्ट्र, आसाम, मणीपुर, अरूणांचल, मिजोरम सिकिम आदि राज्य हैं। जिन्हें अनुच्छेद 371 के माध्यम से विशेष अधिकार दिए गए हैं। मिजोरम में तो धारा 371-जी, के माध्यम से लगभग कश्मीर जैसे ही विशेषाधिकार दिए गए हैं । जो कहते है कि ‘राज्य विधान सभा की अनुमति के बिना धर्म, सामाजिक मान्यताओं से संबंधित विषय, सिविल एवं आपराधिक कानून, भूमि के स्वामित्व हस्तांतरण तथा पारपरिक कानूनी प्रक्रिया पर संसद कोई फैसला नहीं कर सकती । कर्नाटक एवं आन्ध्रप्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों को भी विशेष अधिकार दिए गए है और ताजा मामले में नागालैण्ड के साथ जो समझौते हुए हैं वे भी नागरिकता अधिकार के मामले में कश्मीर के अधिकारों से समीपता रखते हैं। वर्तमान समय में देश की एकता को संभालने की जो चुनौती भारतीय समाज के सामने है उसमें निरन्तर संवाद एवं भावनाओं का समादर ही एकमात्र रास्ता हो सकता है। देश की पूर्वाग्रही राजनैतिक शतियां जो जवाहरलाल नेहरूजी को कोसती हैं उन्होंने भी कश्मीर के एक बड़े नेता पंडित प्रेमनाथ बजाज को 21 अगस्त 1962 को लिखे अपने एक पत्र में स्पष्ट किया था कि ‘वास्तविकता तो यह है कि संविधान का यह अनुच्छेद जो जम्मू -कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा दिलाने के लिए कारणी भूत बताया जाता है, उसके होते हुए भी कई अन्य बातें की गई हैं और जो कुछ और किया जाना है वह भी किया जाएगा, लेकिन मुख्य सवाल तो भावनाओं का है, उसमें दूसरी कोई बात नहीं है। कभी-कभी भावना ही बड़ी महत्वपूर्ण सिद्ध होती है। भारत की वर्तमान आक्रामक राजनीति जो चोट पहुंचाकर मानसिकता के विभाजन को उकसा रही है या भावना की इस कड़ी का आदर कर सकेगी? ताकि बिना किसी को आहत किए देश इस संक्रमण से बाहर आ सके। उसकी सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं भौगोलिक एकता बरकरार रह सके एवं सबके परिश्रम से और सबके विश्वास से देश एक अराजक उन्माद को खारिज कर सके।

बवाल यों?

जम्मू कश्मीर पर मोदी सरकार ने सोमवार को ऐतिहासिक फैसला लिया। अमित शाह ने बयान में कहा कि जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के सभी खंड लागू नहीं होंगे। आइए जानते हैं कि आखिर ये धाराएं हैं या और इन पर विवाद या है। अनुच्छेद 370: यह अनुच्छेद जम्मू – कश्मीर को विशेष अधिकार देता है। इसके मुताबिक, भारतीय संसद जम्मू – कश्मीर के मामले में सिर्फ तीन क्षेत्रों- रक्षा, विदेश मामले और संचार के लिए कानून बना सकती है। इसके अलावा किसी कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र सरकार को राज्य सरकार की मंजूरी चाहिए होती है। विरोध: अनुच्छेद को हटाने का विरोध करने वालों का सोचना है कि इससे बाकी भारत के लोगों को भी जम्मू -कश्मीर में जमीन खरीदने का अधिकार मिल जाएगा। साथ ही नौकरी और अन्य सरकारी मदद के हकदार हो जाएंगे। समर्थन: सुप्रीम कोर्ट में 2014 से इस पर केस चल रहा है। मामले में दाखिल याचिका में तर्क दिया गया था कि ये भारत की भावना के खिलाफ और अलगाववाद को बढ़ावा देने वाले प्रावधान हैं। ये अनुच्छेद देश के नागरिकों के बीच ही भेद पैदा करते हैं। स्थायी नागरिक कौन: जम्मू – कश्मीर के मौजूदा संविधान के अनुसार, स्थायी नागरिक वही व्यति है जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा और कानूनी तरीके से संपत्ति का अधिग्रहण किया हो। इसके अलावा कोई शख्स 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो। अनुच्छेद 35ए: अनुच्छेद 35ए जम्मू -कश्मीर विधानसभा को राज्य के ‘स्थायी निवासीÓ की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है। अस्थायी नागरिक जम्मू -कश्मीर में न स्थायी रूप से ब सकते हैं और न ही वहां संपत्ति खरीद सकते हैं। उन्हें कश्मीर में सरकारी नौकरी और छात्रवृछात्रवृति भी नहीं मिल सकती। 1954 में इसे संविधान में जोड़ा गया था।


मंदी की मार

हाल ही में आई खबर के मुताबिक विश्व बैंक की 2018 की रैंकिंग में भारत की अर्थव्यवस्था पांचवें स्थान से फिसल कर सातवें नंबर पर आ गई। आर्थिक मोर्चे पर तेज रफ्तार विकास के दावों के बीच यह खबर निराश करने वाली है। लेकिन सवाल है कि अर्थव्यवस्था की मजबूती जिन कारकों पर टिकी होती है, उनमें कहां और कौन-सी कमजोरी आई जिससे आर्थिक विकास के बढ़ते कदम ठहर गए या फिर पीछे की ओर लौटे। गौरतलब है कि बाजार में वाहनों की बिक्री में भारी गिरावट के मद्देनजर इस उद्योग में उत्पादन से लेकर बिक्री तक के क्षेत्र में बड़ी तादाद में कर्मचारियों को नौकरियों से निकाला जा रहा है। उद्योग संगठन फाडा यानी फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन के मुताबिक सिर्फ पिछले तीन महीने के दौरान खुदरा विक्रेताओं ने बिक्री में भारी कमी की वजह से करीब दो लाख कर्मचारियों की छंटनी कर दी। यही नहीं, निकट भविष्य में हालात और बिगड़ने की आशंका जाहिर की जा रही है। इसके अलावा, खबर यह भी आई कि रेलवे ने अगले साल तक तीन लाख कर्मचारियों की छंटनी का इरादा जताया है।

सवाल है कि बाजार में सामान की खरीदारी जिस तरह रोजगार और आय पर निर्भर है, उसमें इतने पड़े पैमाने पर लोगों के रोजगार से वंचित होने का क्या असर पड़ेगा? हालत तो यह है कि नौकरियों से वंचित लोगों के सामने कई बार रोजमर्रा का सामान खरीदने से पहले सोचने की नौबत आ जाती है। इससे आगे जिस तरह बाजार में अलग-अलग वस्तुओं की खरीदारी और बिक्री में लगे सामाजिक वर्गों की कड़ियां एक दूसरे से जुड़ी रहती हैं, उसमें क्या वाहनों की बिक्री में पहले से छाई मंदी की सूरत और नहीं बिगड़ेगी? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि किसी एक क्षेत्र में नौकरियों में कटौती न केवल उस व्यवसाय को प्रभावित करती है, बल्कि उससे जुड़े दूसरे कारोबार और उसमें लगे लोगों के जीवन पर भी असर पड़ता है। यही वजह है कि वाहनों की बिक्री में भारी कमी के मद्देनजर इस उद्योग की कुछ बड़ी कंपनियों में उत्पादन में कटौती की गई तो उसके लिए तकनीकी कल-पुर्जे बनाने वाली दूसरी तमाम छोटी कंपनियों पर भी इसका काफी नकारात्मक असर पड़ा।

बाजार की ताकत इस बात से आंकी जाती है कि उसमें किसी वस्तु की मांग, खरीद और बिक्री की तस्वीर कैसी है। इस लिहाज से देखें तो कई मामलों में लोगों के सामने पैसे खर्च करने के हालात पहले की तरह नहीं रह गए हैं और अब कुछ जरूरी खरीदारी भी टालने की नौबत आ रही है। इसका सीधा असर पहले बिक्री और उसके बाद उत्पादन पर पड़ना तय है। उत्पादन में कटौती की स्थिति में औद्योगिक इकाइयां खर्च कम करने के विकल्प अपनाती है और उसमें सबसे बड़ी मार नौकरियों पर पड़ती है। वाहन उद्योग में रोजगार, आय, खरीदारी और बिक्री की एक दूसरे से जुड़ी शृंखला की वजह से यह स्थिति दूसरे क्षेत्रों में भी देखी जा सकती है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि अर्थव्यवस्था की बुनियाद पर इसका कैसा असर पड़ रहा होगा !

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