09-11-2019 (Newspaper Clippings)

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अतार्किक बचाव से जासूसी मामले में घिरी सरकार

व्हाट्सअप जासूसी के मामले में सरकार जितना बचने का प्रयास कर रही है उतनी ही घिरती जा रही है। राज का खुलासा होने के बाद केंद्रीय दूरसंचार मंत्री का जवाब था ‘व्हाट्सअप से स्पष्टीकरण मांगा गया है’। कंपनी का फौरन प्रत्युत्तर आया ‘यह सब कुछ सरकार को मई में ही बताया जा चुका है’। सरकार ने इस पर कहा कि ‘वह जवाब बेहद टेक्निकल था, लिहाजा कुछ भी समझ में नहीं आया’।

इस पर कंपनी ने कहा कि ‘सितम्बर में दोबारा बताया गया था’। जैसे ही सरकार ने इस बार इसे ख़ारिज करना चाहा, व्हाट्सअप और मीडिया ने मंत्रालय की वेबसाइट को दिखाया जिस पर कंपनी का सरकार को और प्लेटफार्म यूजर्स को आगाह करने वाला पत्र स्वयं सरकारी एजेंसी ने अपलोड किया था। ध्यान रहे कि मई में ही आम -चुनाव हुए थे। उधर व्हाट्सअप के एन्क्रिप्टेड विषय-वस्तु में सेंध लगाकर देश के कुल 127 लोगों की जासूसी करने वाली इस्रायली कंपनी एनएसओ अपने बचाव में लगातार कह रही है कि वह अपने जासूसी सॉफ्टवेयर पेगासस का लाइसेंस केवल सरकार और उसकी वैध संस्थाओं को ही देती है।

इस पूरे प्रकरण में प्रदर्शित हो रहा है कि बचाव के लिए भी सामान्य बुद्धि का इस्तेमाल भी सरकारी अफसर नहीं कर रहे हैं। दुनिया के हर प्रजातंत्र में सरकारी खुफिया एजेंसियां इस तरह कानूनेतर काम करती हैं, क्योंकि आतंकियों या देश के खिलाफ साजिश करने वालों को पकड़ना है तो यह एक क्षम्य अपराध माना जाता है। लेकिन, जब यह हथियार राजनीतिक विरोधियों पर और ज्यादा तादाद में इसे लागू किया जाने लगता है तो सरकार जनता की नज़रों में गिरने लगती है। असली मामला कुछ और है।

दरअसल सरकार व्हाट्सअप पर लगातार दबाव डाल रही है कि वह उसे दुर्भावनापूर्ण कंटेंट भेजने के सोर्स तक पहुंचने के लिए एन्क्रिप्टेड को डिक्रिप्ट (खोलने) करने की सुविधा दे। व्हाट्सअप का कहना है कि उसने पूरी दुनिया में यह सुविधा किसी भी सरकार को नहीं दी है। आज जिस तरह से भारत में आतंकी गतिविधियों के लिए और नए आतंकी भर्ती करने में इस तरह के तमाम प्लेटफार्मों का इस्तेमाल हो रहा है, उससे सरकारी खुफिया एजेंसियों के पास दो ही विकल्प हैं। या तो वह सीधे कंपनी से यह सुविधा हासिल करे या बगैर बताए पेगासस जैसे सॉफ्टवेयरों का इस्तेमाल करे। सरकार गलत नहीं है, लेकिन अतार्किक बचाव से आरोप पुख्ता हो रहे हैं।

स्रोत–  दैनिक भास्कर

आपात स्थिति में पहुंच रही है वायु प्रदूषण की समस्या

सुनीता नारायण , (लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं)

दिल्ली में हम सांस भी नहीं ले सकते। शहर की हवा में प्रदूषक तत्त्वों की मात्रा हद से ज्यादा विषाक्तता तक पहुंच चुकी है और यह जन स्वास्थ्य के लिए आपात स्थिति की तरह है। आधिकारिक रूप से हवा की गुणवत्ता अत्यधिक खराब है। यह स्वस्थ लोगों के लिए भी नुकसानदेह है बच्चों, उम्रदराज लोगों और मरीजों आदि को तो भूल ही जाइए। मैं यहां यह चर्चा करना चाहती हूं कि हम बिना शोर-शराबे और राजनीति के ऐसा क्या कर सकते हैं जिससे हवा की गुणवत्ता नियंत्रित रखी जा सके। अक्टूबर के अंत और नवंबर के आरंभ में आखिर क्या हुआ? 27 अक्टूबर, 2019 यानी दीवाली की दोपहर तक दिल्ली में हवा की गुणवत्ता खराब थी लेकिन फिर भी वह सांस लेने लायक थी। मौसम में बदलाव आ रहा था, रातें ठंडी हो रही थीं और हवा का बहना कम हो रहा था, ऐसे में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा था। पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा में फसल अवशेष जलाने का सिलसिला शुरू हो रहा था, हालांकि दिल्ली के प्रदूषण में इनकी हिस्सेदारी नाम मात्र की थी। बहरहाल यह स्पष्टï था कि हालात आगे और बिगड़ेंगे। यही कारण है कि प्रदूषण के स्थानीय स्रोतों पर नजर रखना जरूरी था। हमें यह तय करना था कि पटाखे न फोड़े जाएं क्योंकि हवा पहले ही बहुत विषाक्त हो चुकी थी। ऐसा नहीं हो सका बल्कि जो हुआ, वह इस प्रकार है। 27 अक्टूबर, 2019 की शाम प्रदूषण के स्तर में नाटकीय इजाफा हुआ। मेरे सहयोगियों ने करीब 50 निगरानी केंद्रों से मिले आंकड़ों से अनुमान लगाया कि पटाखे चलाने के कारण शाम 5 बजे से रात एक बजे के बीच पीएम 2.5 में 10 गुना तक इजाफा हुआ। उनका कहना है कि इसने प्रदूषण नियंत्रण के तमाम जतन पर पानी फेर दिया। यह स्पष्टï है कि यह दीवाली साफ-स्वच्छ नहीं थी।

केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। दीवाली के बाद हवा की दिशा बदल गई और फसल अवशेष जलने के कारण ढेर सारा धुआं शहर के आसमान पर छा गया। कुल प्रदूषण में फसल अवशेष जलने से हुए प्रदूषण की हिस्सेदारी 30 फीसदी है। मानो इतना ही पर्याप्त नहीं था तो अरब सागर की चक्रवाती गतिविधि और मॉनसून की वापसी ने हवा की गति समाप्त कर दी। वह पूरा प्रदूषण अब हवा में ठहर गया है और लोगों का सांस लेना मुश्किल हो गया है। हम मौसम का तो कुछ नहीं कर सकते लेकिन हम प्रदूषण के जरियों को तो कम कर सकते हैं। स्वच्छ हवा हमारा अधिकार है। हम सांस ले सकते हैं। लेकिन इसके लिए हमें वायु प्रदूषण के विज्ञान को भली-भांति समझना होगा।

एक गलत धारणा यह है कि प्रदूषण केवल ठंड के दिनों में बढ़ता है क्योंकि उस समय फसल अवशेष जलाया जाता है। यह तथ्य है कि किसान 15 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच फसल अवशेष जलाते हैं। हमें यह भी बता है कि इससे उत्पन्न धुआं इस क्षेत्र के प्रदूषण में बढ़ोतरी योगदान करता है। परंतु यह ध्यान देने वाली बात है कि यह प्रदूषण की प्रमुख वजह नहीं है। प्रदूषण के वास्तविक कारक साल भर हवा में एकत्रित होते रहते हैं। आम दिनों में हमें स्वच्छता नजर आती है क्योंकि हवा प्रदूषकों को समान रूप से वितरित करती है और वातावरण में हवा बहती रहती है। यानी प्रदूषण का स्रोत कभी कम नहीं होता, बस वह नजर नहीं आता। ठंड के दिनों में यह माहौल बदल जाता है क्योंकि हवा का बहना धीमा हो जाता है। यही कारण है कि दिल्ली में ठंड में प्रदूषण की कई घटनाएं नजर आती हैं। दिसंबर और जनवरी में स्मॉग की समस्या ज्यादा आती है जबकि उस वक्त फसल नहीं जलाई जाती। इसकी वजह स्थानीय प्रदूषण और खराब मौसम हैं। यह अहम है कि हम इसे पहचानें क्योंकि इसके बिना पूरा ध्यान बाहरी कारकों पर ही केंद्रित रहेगा। दूसरे राज्यों को दोष देना राजनीतिक दृष्टिï से बेहतर हो सकता है लेकिन प्रदूषण प्रबंधन के लिहाज से यह अच्छा नहीं है। जैसा कि मैंने अपने स्तंभ में पिछले महीने भी कहा था, प्रदूषण से लडऩे के लिए काफी कुछ किया गया है। इससे प्रदूषण में न केवल स्थिरता आई है बल्कि कमी भी आई है। परंतु अब हमें इन कदमों की तीव्रता बढ़ानी होगी। उदाहरण के लिए फसल जलाना कम करना होगा, स्थानीय स्तर पर कचरा, प्लास्टिक जलाना रोकने के लिए कड़ाई करनी होगी और विनिर्माण तथा सड़क निर्माण आदि में धूल कम उत्पन्न हो तथा फैक्टरियों से प्रदूषण कम हो, ऐसे कदम उठाने होंगे।

परंतु इसका वास्तविक और दीर्घकालिक उत्तर तो यही होगा कि हम कोयले तथा अन्य खराब ईंधनों से अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन की दिशा में बढ़ें। कारों की जगह बेहतर सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना होगा। यह व्यवस्था सस्ती और सुलभ होने के साथ-साथ आधुनिक और सुरक्षित भी होनी चाहिए। परंतु इस दिशा में हम कुछ खास प्रगति नहीं कर रहे हैं। हमारी हर सांस विषाक्त है। हमारे बच्चों के अभी विकसित हो रहे फेफड़ों को देखते हुए हालात ऐसे ही नहीं रहने दिए जा सकते। जाहिर है हमें अब व्यापक पैमाने पर पेशकदमी करनी होगी। मैं पूरी दृढ़ता के साथ कहती हूं कि जुनून के साथ जरूरी कदम उठाने से बदलाव अवश्य आएगा।

स्रोत–  बिजनेस स्टैंडर्ड

निजता की रक्षा

इजरायल की कंपनी द्वारा कम से कम 121 भारतीयों के मोबाइल फोन पर अवैध तरीके से निगरानी सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करने की घटना ने देश के डेटा संरक्षण और निजता संबंधी कानूनों को लेकर लंबे समय से चली आ रही दिक्कतों को नए सिरे से सामने रख दिया है। फेसबुक के अनुषंगी इंस्टैंट मेसेंजर व्हाट्सऐप ने इजरायली कंपनी एनएसओ पर अमेरिका की एक अदालत में मुकदमा किया है। उसका कहना है कि कंपनी ने गुप्त रूप से पेगासस नामक निगरानी सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करके संक्रमित मोबाइल फोनों में से लगभग हर प्रकार की जानकारी को दूसरी जगहों पर भेजा। इस सॉफ्टवेयर को व्हाट्सऐप के माध्यम से केवल एक मिस्ड कॉल देकर किसी फोन पर इंस्टॉल किया जा सकता है। माना जा रहा है कि दुनिया भर में करीब 1,500 लोग पेगासस से संक्रमित हुए हैं। व्हाट्सऐप का दावा है कि यह संक्रमण अप्रैल-मई 2019 में हुआ और तब से अब तक उसने इस जोखिम को समाप्त कर दिया है।उधर एनएसओ का दावा है कि वह इस सॉफ्टवेयर को केवल सरकारी एजेंसियों को बेचती है। इसके बाद मामला और अधिक जटिल हो गया है। एनएसओ के उपभोक्ताओं की सूची देखकर भी यही लगता है कि उनमें से अधिकांश सरकारें हैं। पेगासस सॉफ्टवेयर और उससे जुड़ी निगरानी सेवाएं बहुत महंगी हैं और उन्हें अन्य देशों के साथ मैक्सिको और मिस्र की सरकार को बेचा गया है। जिन भारतीयों को इसका निशाना बनाया गया है उनमें से कई जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता, अधिवक्ता, पत्रकार और राजनेता हैं। चूंकि यही वह अवधि थी जब भारत में आम चुनाव हो रहे थे और जिनको निशाना बनाया गया उनमें से कई विपक्षी विचारों के या सरकार के खिलाफ खड़े होने वाले लोग हैं इसलिए इस विषय में अटकलों का दौर शुरू हो गया है।भारत सरकार का दावा है कि व्हाट्सऐप ने इस संवेदनशीलता को लेकर खुलकर बात नहीं की और गत मई में देश की कंप्यूटर आपात प्रतिक्रिया टीम तथा अन्य सरकारी एजेंसियों को इस सुरक्षा मसले की जानकारी देते हुए उसने तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की। अब सरकार ने इसकी जांच के लिए दो संसदीय समितियां गठित की हैं। अमेरिका में सुनवाई के दौरान इस विषय में और मालूमात सामने आएंगी। इन भारतीय नागरिकों को निशाना बनाने और चोरी छिपे पेगासस सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करने वाले ने यकीनन भारतीय कानून तोड़ा है। अब तक ऐसी किसी सरकारी एजेंसी का पता नहीं लगा है जिसके बारे में कहा जा सके कि यह उसने किया। यदि यह काम सरकारी एजेंसी ने नहीं किया तो कानून टूटा है। बल्कि सरकारी एजेंसियों के बारे में भी अपेक्षा तो यही रहती है कि वे उच्चस्तर पर ऐसी निगरानी के लिए समुचित इजाजत लेंगी। उन्हें निजता के ऐसे उल्लंघन के पहले पूरी जानकारी देनी होती।यह भी सही है कि सरकार ने निजता संरक्षण कानून बनाने में देरी की। अगर वह होता तो  इस अपराध को बेहतर परिभाषित किया जा सकता और उचित दंड की घोषणा की जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने अगस्त 2017 में कहा था कि निजता मूल अधिकार है। इसके बाद सेवानिवृत्त न्यायाधीश बीएन श्रीकृष्णा की अध्यक्षता वाले आयोग ने निजी डेटा संरक्षण निजता कानून का मसौदा बनाया जिसे जुलाई 2018 में जारी किया गया। इस पर अक्टूबर 2018 तक जनता की राय आमंत्रित की गई। तब से अब तक संसद ने अनेक कानून पारित किए लेकिन यह मसौदा पड़ा रहा। ऐसे कानून के अभाव में यह परिभाषित कर पाना मुश्किल है कि नागरिकों की ऐसी निगरानी कौन सी एजेंसी कब कर सकती है। यह घटना निजता को मूल अधिकार मानने वाले संविधान और संबंधित कानून को पास करने में देरी करने वाली विधायिका का विभाजन साफ नजर आता है।

स्रोत–  बिजनेस स्टैंडर्ड

साझेदारी पर सवाल

धानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने थाईलैंड की राजधानी में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (आरसीईपी) की बैठक में भारत का पक्ष यह कहकर रखा है कि हमारे कारोबार को भी लाभ चाहिए। दरअसल, इस समझौते को लेकर विवाद यही है कि इससे कौन लाभान्वित होगा। यकीनन इस ओर कदम पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उठाए थे। तब भी यह विवाद का विषय बना था। कहते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी तब इसके प्रति शंकाएं जाहिर की थीं। विरोध करने वालों की दलील है कि अब तक के विपक्षी या बहुपक्षी व्यापार समझौतों से देश को कम दूसरे देशों को ज्यादा लाभ हुआ है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो चीन ही है। चीन से हमारा व्यापार संतुलन काफी बेमेल है। हमारे यहां से व्यापार के मुकाबले चीन से आयात कई-कई गुना अधिक है। यह तो एक उदाहरण है। हाल में कृषि पैदावारों के आयात से भी संकट बढ़ा है और हमारे किसानों की आमदनी घटी है। सरकार कई बार महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए दलहन, तिलहन जैसे कृषि उपजों का आयात करती रही है और इससे हमारे यहां किसानों की उपज के दाम घटते रहे हैं। यह कृषि संकट आज इतने बड़े पैमाने पर हो गया है कि मांग की कमी से समूची अर्थव्यवस्था मंदी की गिरफ्त में चली गई है। इसीलिए द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यापार समझौते इस दौरान लाभ के बदले घाटा ही दे सकते हैं। हालांकि सरकार की दलील है कि हम सेवा क्षेत्र में काफी मजबूत हैं और इससे हमें लाभ होगा। लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था में संकट सेवा क्षेत्र का नहीं बल्कि कृषि और उत्पादन क्षेत्र से जुड़ा है। फिर गौरतलब यह भी है कि दस आसियान देशों के साथ जो 16 देश इस समझौते में शामिल हो रहे हैं, उनमें चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे कृषि और उत्पादन क्षेत्र के मजबूत देश हैं। ये देश सेवा क्षेत्र में भी पीछे नहीं हैं। इसलिए कितना फायदा होगा, यह कहा नहीं जा सकता। अगर यह संभवत: होता है तो दुनिया में शायद सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समझौता कहलाएगा। लेकिन संरक्षणवाद के इस दौर में हमें फिर से विचार करना चाहिए कि इससे हमारे किसानों, मजदूरों को क्या लाभ होने वाला है? एक तर्क यह भी है कि निवेश बढ़ेगा, लेकिन अभी तक का अनुभव यह है कि व्यापार समझौतों से निवेश ज्यादा नहीं बढ़ा है। इसलिए सोच-विचार की जरूरत है।

स्रोत–  राष्ट्रीय सहारा

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