06-07-2019 (Newspaper Clippings)

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       जुड़ने वाले हाथ क्यों उठने लगे

            डॉ डीवी शर्मा, पूर्व अध्यक्ष, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन

चिल्ला जाडे़ में कई दिनों तक सूरज के दर्शन नहीं हुए थे, उस दिन ऑपरेशन थिएटर में ड्यूटी थी। एक लकदक कपडे़ और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले शख्स ऑपरेशन थिएटर के बाहर गुमसुम खडे़ थे। ओटी से जो भी बाहर निकलता, उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो जाते। एक घंटे तक ऑपरेशन चला, डॉक्टर बाहर आए, उन्होंने हाथ जोड़े खड़े युवक के कंधे पर हाथ रखा, कहा भगवान की कृपा है, सब ठीक हुआ है। यह कहते हुए डॉक्टर चले गए, वह शख्स हाथ जोडे़ खड़ा रहा, आंखों में खुशी के आंसू थे। यह दिसंबर, 1977 का वाकया है। देश के पुराने मेडिकल कॉलेजों में से एक एसएन मेडिकल कॉलेज के अस्थि रोग विभाग में जूनियर रेजीडेंट, प्रथम वर्ष यह मेरा पहला दिन था। पीजी के तीन साल तक इस तरह के दृश्य सहज दिखाई देते थे। कई बार इलाज के दौरान मरीज की मौत भी हो जाती थी, डॉक्टर के चेहरे लटक जाते थे और आंखें झुकी होती थीं, तब भी परिजन आंखों में आंसू और हाथ जोड़कर कहते, डॉक्टर साहब आपने तो पूरी कोशिश की, पर होनी को कौन टाल सकता है।

अब हाल के मामले पर नजर डालते हैं, जिस घटना के बाद देश भर में डॉक्टरों ने हड़ताल कर दी और सामूहिक इस्तीफे दे दिए। यह चिलचिलाती धूप वाले जून महीने की घटना है। गरमी में दिमाग भी गरम हो जाता है, पर इतना, यह सोच से परे हैै। देश के पुराने मेडिकल कॉलेज एनआरएस मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल, कोलकाता में एक बुजुर्ग मरीज की रात में मौत हो गई। बड़ी संख्या में लोग पहुंचे और जूनियर डॉक्टरों की पिटाई कर दी। घायल जूनियर डॉक्टर को आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। हड़ताल हुई, इस्तीफे दिए गए। सरकार से वार्ताओं का दौर चला। कई दिनों तक पश्चिम बंगाल की ममता सरकार से लेकर केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा राजनीतिक शह और मात का खेल चला। खैर, मुद्दे पर आते हैं। बड़ा सवाल यह है कि पिछले 40-45 साल में ऐसा क्या हुआ, जिससे हाथ जोड़कर खडे़ रहने वालों के हाथ उठने लगे?

एक बुजुर्ग मरीज की मौत पर जूनियर डॉक्टर को पीटा गया, उस जूनियर डॉक्टर की मनोदशा क्या होगी, जिसे भविष्य में मरीजों का इलाज करना है? क्या वह किसी गंभीर मरीज का इलाज करने का साहस दिखा सकेगा या मरीज को देखते ही कह देगा कि कहीं और ले जाओ, हालत गंभीर है? ऐसा अब होने लगा है। अब मूल समस्या पर आते हैं। भारत की कुल आबादी 130 करोड़ है। जिस तरह से आबादी बढ़ रही है, बीमारियां भी बढ़ी हैं। डेंगू कहर बरपाने लगा है, तो जापानी इंसेफलाइटिस और चमकी जैसे नए नाम वाले बुखार से बच्चों की मौत हो रही है। ये आंकडे़ लगातार बढ़ रहे हैं। सरकारी और निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में मरीजों की लाइन लगी हुई है। एक डॉक्टर दिन में 80 से 100 मरीज देख रहा है, सर्जरी करने वाले कुछ देर के लिए ही ओटी से बाहर आ रहे हैं। विश्व स्वास्थ संगठन कहता है कि एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में डॉक्टर और जनसंख्या का अनुपात है 1,000 पर 0.62 डॉक्टर।

देश में जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) 1970-75 में 49.7 साल थी, यह बढ़कर 2019 में 69 साल हो चुकी है। महामारी को छोड़कर बीमारी लगने की उम्र जो पहले 55 से 60 साल पर शुरू होती थी, हार्ट अटैक से लेकर मधुमेह व ब्लड प्रेशर की समस्या 30 से 45 साल की उम्र में देखने को मिल रही है। अब तो 45 साल की उम्र में घुटने भी जवाब देने लगे हैं। जिसे आम लोग मरीज और डॉक्टर के बीच के रिश्ते की खाई समझ रहे हैं, वह लंबी होने के साथ गहरी होती जा रही है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्चा बहुत अधिक है, लेकिन क्रियान्वयन और रख-रखाव न होने से वे दम तोड़ रही हैं। मरीज पहले निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराते हैं, इसके बाद सरकारी अस्पताल पहुंचते हैं, जहां पहले से ही गंभीर मरीज बेड पर लेटे हुए हैं। जूनियर डॉक्टर जो खुद को डॉक्टर के रूप में देख रहा है, उसे नर्स से लेकर वार्ड ब्वॉय का काम करना पड़ रहा है। परिजनों को अपने मरीज की सांस टूटती दिखाई दे रही है, वे अंदर-बाहर भाग रहे हैं, फोन करा रहे हैं और गरम भी हो रहे हैं। डॉक्टर को भी इलाज छोड़कर विवाद में उलझना पड़ रहा है। इस सबके बीच मरीज की मौत हो रही है, इसके बाद जूनियर डॉक्टर पिट रहे हैं, तो कुछ जगह तीमारदारों की भी पिटाई हो रही है। निजी अस्पतालों में मौत के बाद हंगामा, तोड़फोड़ आम है, अब डॉक्टरों पर भी लोग हाथ उठाने का मौका तलाशने लगे हैं। इससे डॉक्टर के साथ ही मरीज भी परेशान हो रहा है, उसकी समस्या कम होने की बजाय बढ़ रही है। अब क्या किया जाए? हालात को बिगडने दें या कुछ कर सकते हैं? इस दिशा में किसी ने सोचने की कोशिश नहीं की है।

डॉक्टरों द्वारा केंद्रीय स्तर पर सुरक्षा की मांग की जा रही है। मरीज और तीमारदार इलाज में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। ये दोनों ही जरूरी हैं। मरीज और तीमारदार को पूरा हक है यह जानने का कि उसके मरीज को क्या बीमारी है? इलाज के विकल्प क्या हैं और किस तरह से इलाज आगे बढ़ रहा है? यह भी समझना जरूरी है कि मौत सत्य है, इसे कोई नहीं टाल सकता है, ऐसा संभव हो, तो डॉक्टर अमर हो जाएं। डॉक्टर को भी चाहिए कि वे बुद्धिजीवी हैं, दूसरों से अलग हैं, वे जिस प्रोफेशन में हैं, वहां हर रोज किसी की जान बचाते हैं। इसलिए अपने काम के साथ व्यवहार में भी अच्छा होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह पैरा मेडिकल स्टाफ, इन्फ्रास्ट्रक्चर सहित बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाए, स्वास्थ्य के लिए अतिरिक्त बजट दे और भ्रष्टाचार न होने दें। इस सबसे से तस्वीर बदल सकती है, क्योंकि डॉक्टर को मरीज चाहिए और मरीजों का काम डॉक्टर के बिना नहीं चल सकता।

    युवा नशे की चपेट में

देश को बर्बादी के रास्ते पर ले जाने वाले नशे की आमद रुकनी ही चाहिए। आज शायद ही देश का कोई हिस्सा हो जहां नशे की आमद और उसका इस्तेमाल बढ़ रहा हो।

अटारी सीमा पर पकड़ी गई 532 किलो हेरोइन के पीछे अगर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ का हाथ दिख रहा है तो इस पर हैरानी नहीं। आइएसआइ एक अर्से से भारत में पंजाब और जम्मू-कश्मीर के रास्ते हेरोइन और अन्य मादक पदार्थ भेजने में लगी हुई है। इसका मकसद युवा पीढ़ी को नशे की लत लगाकर बर्बादी के रास्ते पर धकेलने के साथ ही इस धंधे से हासिल पैसे के जरिये किस्म-किस्म के आतंकी संगठनों की मदद करना है।

अफगानिस्तान और साथ ही पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के वित्तीय स्रोत का एक बड़ा जरिया अफीम, चरस, हेरोइन आदि का धंधा ही है। हमारी विभन्न एजेंसियां इससे अच्छी तरह परिचित हैं कि इस धंधे की एक कड़ी भारत बना हुआ है, लेकिन इस कड़ी को तोड़ने के वैसे प्रयास नहीं हो रहे हैं जैसे आवश्यक है। यही कारण है कि जम्मू-कश्मीर और पंजाब में पाकिस्तान से आ रहे मादक पदार्थों की आमद रुकने का नाम नहीं ले रही है।

अटारी सीमा पर बड़ी मात्रा में हेरोइन की बरामदगी के बाद यह कहा जा रहा है कि यह अब तक की सबसे बड़ी खेप है, लेकिन आखिर इसकी क्या गारंटी कि इसके पहले इससे बड़ी खेप नहीं आई होगी? आशंका यही है कि पाकिस्तान से विभिन्न वस्तुओं की आड़ में पहले भी मादक पदार्थों की बड़ी खेप आई होगी। वैसे भी इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि बीते दो महीने में सेब की पेटियों के जरिये दिल्ली लाई गई करीब 60 किलो हेरोइन पकड़ी जा चुकी है।

चिंता की बात केवल यही नहीं कि जम्मू-कश्मीर और पंजाब के जरिये मादक पदार्थों की खेप आ रही है, बल्कि यह भी है कि यही काम पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती राज्यों के जरिये भी हो रहा है। वहां मादक पदार्थों की तस्करी से अर्जित पैसा अलगाववाद को हवा देने में खपाया जा रहा है तो कश्मीर और पंजाब में आतंकवाद की आग भड़काने में। सीमावर्ती इलाकों से नशे की आपूर्ति जारी रहना नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के साथ अन्य एजेंसियों की नाकामी को ही बयान करता है।

देश को बर्बादी के रास्ते पर ले जाने वाले नशे की आमद रुकनी ही चाहिए। आज शायद ही देश का कोई हिस्सा हो जहां नशे की आमद और उसका इस्तेमाल बढ़ न रहा हो। इसका एक कारण भारतीय समाज में पहले से तंबाकू, शराब आदि का चलन है। इस तरह के नशे के आदी लोग कहीं आसानी से अफीम, चरस, हेरोइन, कोकीन आदि घातक नशे की गिरफ्त में फंस जाते हैं। ऐसे लोग मुश्किल से ही इस गिरफ्त से निकल पाते हैं।

स्पष्ट है कि जितनी जरूरत नशे की तस्करी पर सख्ती से रोक लगाने की है उतनी ही इसकी भी कि देश के लोग और खासकर युवा पीढ़ी नशे की लत से बची रहे। इसके लिए समाज को भी सक्रियता और जागरूकता दिखानी होगी। यह कोई शुभ संकेत नहीं कि रेव पार्टियों के आयोजन की खबरें अब रह-रहकर आने लगी हैं। ऐसी पार्टियों का आयोजन एक तरह की पतनशीलता का ही परिचायक है। जिस देश का युवा वर्ग नशे की चपेट में आ जाए वह अपने उज्ज्वल भविष्य के प्रति सुनिश्चित नहीं हो सकता।

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