05-11-2019 (Newspaper Clippings)

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निर्यात योजना का अभाव

गत वर्ष केंद्रीय उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय ने एक उच्चस्तरीय सलाहकार समूह का गठन किया था। समूह को ऐसे तरीके सुझाने थे जिनकी सहायता से देश के निर्यात में सुधार किया जा सके। अब यह रिपोर्ट सार्वजनिक की जा चुकी है और यह व्यापार नीति को लेकर सरकारी हलकों की सोच का उपयोगी संकेतक है। उस नजरिये से देखें तो निकलने वाले संकेत चिंतित करते हैं। इसमें स्वीकार किया गया है कि निर्यात के क्षेत्र में देश का प्रदर्शन काफी गड़बड़ रहा है लेकिन इसकी अनुशंसाएं भी खरी नहीं उतरतीं। रिपोर्ट में बिल्कुल सही कहा गया है कि भारतीय निर्यात गहरे संकट में है। इसके लिए वैश्वीकरण के खात्मे या विश्व व्यापार की व्यापक समस्याओं को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है इसका कारण यह है कि जिस समय वैश्विक व्यापार वृद्धि का स्तर लगभग ढह गया है, उसी दौरान भारत का कारोबारी प्रदर्शन भी बिगड़ा है।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भारत के निर्यात प्रदर्शन में गिरावट की कुछ नितांत घरेलू वजह भी हैं। इन्हें हल करना आवश्यक है। खेद की बात है कि कुछ उपयोगी अनुशंसाओं वाली यह रिपोर्ट इस सवाल का जवाब नहीं देती कि निर्यात में कैसे इजाफा किया जाए। हकीकत यह है कि कुछ मायनों में यह पुराने रास्ते अपनाने की सलाह देती है। उदाहरण के लिए जब बात कपड़ा एवं वस्त्र क्षेत्र की आती है तो यह सुझाती है कि भारत को बांग्लादेश के साथ मुक्त व्यापार के खतरों का आकलन करना चाहिए। क्या वाकई यह हमारी समस्या है? मुद्दा यह है कि बांग्लादेश का कपड़ा एवं वस्त्र निर्यात वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी है जबकि हमारा नहीं। ऐसे में सवाल यह होना चाहिए कि आखिर भारतीय वस्त्र निर्यातक बांग्लादेश और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की वैश्विक हिस्सेदारी में अपना हिस्सा कैसे सुनिश्चित करें। यहां संरक्षणवादी उपायों का तो कोई प्रश्न ही नहीं है।

वृहद पक्ष देखें तो रिपोर्ट में दिए गए सुझाव बाधित निवेश, मौद्रिक नीति के कमजोर पारेषण आदि को लेकर अन्य स्थानों पर जताई जा रही चिंता के अनुरूप ही हैं। व्यापार संवद्र्धन नीति की बात करें तो रिपोर्ट की अनुशंसाएं अफसरशाही मानसिकता से ग्रस्त हैं और ये पर्याप्त महत्त्वाकांक्षी भी नहीं दिखतीं। उदाहरण के लिए इसमें सुझाव दिया गया है कि मौजूदा निवेश संवद्र्धन एजेंसी को प्रोत्साहन देने का अधिकार दिया जाना चाहिए और एक व्यापार संवद्र्धन एजेंसी अलग से गठित की जानी चाहिए। ये सारे उपाय मूल समस्या को हल नहीं करते। असल समस्या यह है कि देश में व्यापार वार्ता और प्रबंधन ध्वस्त हो चुके हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री के अधीन होने के बजाय ये विभिन्न मंत्रालयों के अधीन हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति अक्सर ऐसी वार्ताओं को विधायिका की निगरानी से मुक्त करने के लिए अनुमति देता है और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय सीधे राष्ट्रपति के अधीन होता है।

कम से कम एक मोर्चे पर रिपोर्ट अत्यधिक आशावाद की शिकार नजर आती है। रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है कि मंत्रालय के बाहर किसी प्रतिष्ठित संस्थान द्वारा बड़े आंकड़ों के विश्लेषण से निर्यात नीति तैयार की जा सकती है। यह थिंक टैंकों या आईटी सलाहकारों के लिए अच्छी खबर हो सकती है लेकिन इससे नीति निर्माण में सुधार होता नहीं दिखता। मूल समस्या है घरेलू उद्योग का प्रतिस्पर्धी न होना और यह समस्या आगे भी बनी रहेगी। जरूरत यह है कि घरेलू बाजार सस्ता और भरोसेमंद हो, कारक बाजार लचीले हों, कर दर कम हो और लालफीताशाही का प्रभाव भी कम हो। यह कोई रॉकेट विज्ञान नहीं है। इसके लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

स्रोत–  बिजनेस स्टैंडर्ड

कश्मीर घाटी : मीडिया, विपक्ष और विदेश

मोदी सरकार ने यूरोपीय संसद के 23 सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल को कश्मीर की स्थिति का जायजा लेने भेजा तो विपक्ष ने इसे इस आधार पर गलत बताया कि जब उसके कुछ नेता व सांसद वहां जाना चाहते थे तो इस सरकार ने मना कर दिया था। यह भी आरोप है कि यूरोपीय सांसदों की पूरी यात्रा परोक्ष रूप से सरकार-प्रायोजित है। प्रतिद्वंद्वात्मक प्रजातंत्र में सरकार के कार्यों की आलोचना मीडिया और विपक्ष का मूल कर्तव्य है, लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे होते हैं जिन पर सरकार के कदम की आलोचना के पहले यह देखना होता है कि उस कदम के न लेने पर क्या स्थितियां बेहतर थीं या रहेंगी। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर को लेकर सरकार की हर आलोचना का भारत-विरोधी तत्व या पड़ोसी पाकिस्तान फायदा उठाते हैं। फिर आलोचना करने वाले यह क्यों चाहते हैं कि 70 साल से पड़ोसी पाकिस्तान की शह पर अलगाववादी हिंसा का दंश झेलता कश्मीर रातोरात बदल जाएगा। खुद जब ये सरकार में रहे तो यही हिंसा वहां की निहत्थी जनता और अर्धसैनिक बलों के जवानों की लाश गिराती रही। इतने दबाव के बावजूद अगर आतंकवादियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि हर रोज सेब का ट्रक लाने वाले ड्राइवरों को गोली मारी जा रही है तो जवानों द्वारा हिंसा का दमन तब तक जारी रहना चाहिए जब तक आतंक का एक तत्व भी सांस ले रहा है। इस प्रक्रिया में संभव है कि कुछ मानवाधिकारों की अनदेखी हो पर लक्षित लाभ को देखते हुए देश के मानवाधिकार के स्व-नियुक्त अलमबरदारों और विपक्ष को यह संयम बरतना होगा। फिर अगर अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सांसद कश्मीर की हालत पर अंतरराष्ट्रीय मंचों से जार-जार रोते हैं, तो यह सरकार की रणनीति भी हो सकती है कि यूरोपीय यूनियन के तमाम सदस्य देशों के सांसदों का प्रतिनिधि मंडल सरकार के प्रयासों पर मुहर लगाए और तब भारत विश्व मंचों पर भी विरोधियों का मुंह बांध सके। यह भी सच हो सकता है कि इन 27 प्रतिनिधियों में 23 दक्षिणपंथी विचारधारा वाले हों। लेकिन क्या विपक्ष का इन प्रतिनिधियों की विश्वसनीयता कम करना देश के हित में होगा? पहले भी कांग्रेस नेतृत्व ने जाने-अनजाने में कश्मीर की हालत और मानवाधिकार के उल्लंघन की बात कर पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र संघ में एक हथियार पकड़ा दिया था। यह गलती दोबारा करना विपक्ष के लिए अनुचित ही नहीं राजनीतिकरूप से भी घाटे का सौदा होगा।

स्रोत–  दैनिक भास्कर

हम अपनी प्रतिभाओं को पहचान क्यों नहीं पाते ?

संदर्भ : खेल, सिनेमा, बिज़नेस अन्य क्षेत्रों में व्यक्ति जितना गुणी होगा, उसकी आलोचना का उतना ही जोखिम रहेगा

प्रीतीश नंदी , वरिष्ठ पत्रकार फिल्म निर्माता

विकास संबंधी अर्थशास्त्र पर क्रांतिकारी शोध के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अभिजीत बनर्जी की उपलब्धि का पूरी दुनिया ने जश्न मनाया, लेकिन हमारे एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री ‘पूरी तरह वामपंथी’ कहकर उन्हें नीचा दिखाने में लगे रहे। भाजपा में बौद्धिक खालीपन (इसे आप पूरे भारतीय दक्षिण पंथ में बौद्धिक खालीपन भी कह सकते हैं) को देखते हुए इसे इस तरह भी परिभाषित किया जा सकता है कि बनर्जी कम्युनिस्टों के सहयात्री हैं या वे अर्बन नक्सल हैं (कृपया पूरी आज़ादी से अपना चुनाव करें। आज की राजनीतिक शब्दावली ट्रोल से तय होती है, जो तर्क से पूरी तरह मुक्त है)। लेकिन, मंत्री महोदय एक कदम और आगे बढ़ गए और हम सबकी ओर से सार्वजनिक रूप से कह दिया कि भारत नए नोबेल विजेता के विचारों को खारिज करता है।

मैं जानता हूं कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा। अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार दिए जाने की खबर सुनकर राहुल गांधी ने दावा किया था कि गरीबी पर अपनी इस रिसर्च के लिए ख्यात इस बंगाली अर्थशास्त्री ने उनकी पार्टी को ‘न्याय’ योजना के लिए कुछ अमूल्य जानकारी मुहैया कराई थी। यह योजना पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के घोषणा-पत्र का हिस्सा थी। चूंकि कांग्रेस चुनाव हार गई, तो भाजपा नेता ने निष्कर्ष निकाल लिया कि बनर्जी के आर्थिक विचार भारत ने खारिज कर दिए हैं।

हालांकि, नोबेल विजेता ने तत्काल जवाब दिया कि उन्होंने न्याय योजना के लिए कुछ जानकारी जरूर मुहैया कराई थी पर उनसे विशुद्ध रूप से डेटा यानी तथ्य व आंकड़े मांगे गए थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका कांग्रेस और एक योजना के रूप में न्याय से कोई संबंध नहीं है। उनके मुताबिक इस योजना को और भी बेहतर स्वरूप दिया जा सकता था, लेकिन चूंकि किसी ने उस पर उनसे विचार नहीं मांगे थे, इसलिए उन्होंने वह मामला वहीं छोड़ दिया। हमारे मंत्री जो कहते हैं उस पर चकित होना तो हमने बहुत पहले ही छोड़ दिया है। लेकिन, हमारे नवीनतम नोबेल विजेता के बारे में की गई टिप्पणी का वक्त ठीक नहीं था, बल्कि इससे अपनी प्रतिभा को न पहचानने की हमारी अक्षमता जाहिर होती है, जबकि दुनिया उसे मान्यता दे चुकी होती है। हम यही बात खेलों, सिनेमा और व्यावसायिक उपक्रमों में देखते हैं। लेकिन, यह सबसे ज्यादा बौद्धिक विमर्श में दिखता है। कोई भारतीय जितना गुणी दिखता है, राज्य-व्यवस्था द्वारा उसकी निंदा करने का जोखिम उतना ही ज्यादा रहता है। केवल भोंदू और याचक किस्म के लोगों को ही तत्काल ख्याति मिलती है।

इसके पहले के नोबेल विजेता, जो वास्तव में बनर्जी के मेंटर रहे हैं, अमर्त्य सेन भी इसी कारण से निशाना बने थे। उन्हें कांग्रेस के निकटवर्ती के रूप में देखा गया था। यह व्यवहार फिर इस सनकभरी धारणा पर आधारित था कि चूंकि वे भाजपा की आर्थिक नीतियों से सहमत नहीं हैं तो आवश्यक रूप से कांग्रेस के साथ उनकी मिलीभगत है। कांग्रेस सरकार ने उनके महान काम को देखते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया पर इसे उनकी राजनीतिक निकटता का सबूत मान लिया गया। जिसने भी प्रोफेसर सेन के काम को पढ़ा-समझा होगा तो वह इस पर हंसेगा जरूर। उन्हें भारत रत्न से सम्मानित कर सरकार की ही विश्वसनीयता बढ़ी है।

हम यह समझने में नाकाम रहते हैं कि जब हम हमारे बीच के श्रेष्ठतम लोगों पर हमला करते हैं तो हम दुनिया के सामने हंसी के पात्र बन जाते हैं। गरीबी पर अमर्त्य सेन के काम को व्यापक रूप से सराहा गया है। और शायद दुनिया में सर्वाधिक गरीब आबादी वाले देश के रूप में हमें उनकी अंतर्दृष्टि से बहुत कुछ सीखना चाहिए। यही बात अभिजीत के बारे में सच है। बस फर्क इतना सा है कि चूंकि उनके पास वास्तविक जमीनी आंकड़े हैं, तो उसे आप शायद अंतर्दृष्टि की बजाय खोज कहना चाहें। वे सिद्धांत की बजाय तथ्यों व आंकड़ों यानी जमीनी आंकड़ों की बात ज्यादा करते हैं। ऐसे लोग ही तो भारत की बेशकीमती संपदा के हिस्से होते हैं। उनका राजनीतिकरण क्यों करें? उनकी सिर्फ इसलिए निंदा न करें कि उनका दृष्टिकोण मौजूदा सरकार से ठीक-ठीक नहीं मिलता? वैसे भी यही लोग तो देश को और उनका पालन-पोषण करने वाले शहर कोलकाता को गौरव प्रदान करते हैं, जिसे हर सरकार कांग्रेस हो या भाजपा, खारिज करने में लगी रहती है।

भारत के आठ नोबेल विजेताओं में से चार कोलकाता से हैं। बेशक, सूची की शुरुआत रवींद्रनाथ टैगोर से होती है, महान कवि, उपन्यासकार, चित्रकार, संगीतकार और हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के किंवदंती पुरुष। वे व्यक्ति जिन्होंने गांधीजी को सबसे पहले महात्मा कहा था। इनमें वे भी शामिल हैं, जो दुनिया के सर्वाधिक अविश्वसनीय लोगों में से एक हैं- मदर टेरेसा, जिन्हें गरीबों में भी गरीबतम लोगों के बीच काम करने के कारण नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया और कोलकाता को ‘सिटी ऑफ जॉय’ का तमगा मिला। कोलकाता से जुड़े दो और नोबेल विजेता हैं- भौतिकशास्त्री सीवी रमन और मेडिकल शोधकर्ता रोनाल्ड रॉस, जिन्होंने नोबेल दिलाने वाला ज्यादातर कार्य इसी महानगर में किया। रमन ने अद्भुत ‘रमन प्रभाव’ की खोज कोलकाता यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहते हुए की थी और भारतीय मेडिकल सर्विस में 25 साल तक काम करने वाले रॉस ने मलेरिया के प्रसार को लेकर अपना नई जमीन तोड़ने वाला काम तब किया, जब वे कोलकाता के प्रेसीडेंसी जनरल हॉस्पिटल में काम किया करते थे। रमन को भौतिकी का तो रॉस को मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार मिला था।

यदि दिल्ली को अपने भ्रष्ट राजनेताओं के लिए जाना जा सकता है, मुंबई अपने साहसी उद्योगपतियों और फिल्म सितारों के लिए जाना जा सकता है, आगरा पर्यटकों और बेंगलुरु अपने आईटी स्टार्टअप के लिए तो अब वक्त है कि हम नोबेल पुरस्कार विजेताओं के लिए कोलकाता को इसकी पहचान दें।

स्रोत–  दैनिक भास्कर

महज कारोबारी सुगमता का बढ़ना काफी नहीं

जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री

विश्व बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस 2020 में भारत 190 देशों की सूची में 63वें स्थान पर पहुंच गया है। भारत कारोबारी सुगमता की विश्व रैंकिंग में 14 स्थानों की छलांग के साथ 63वें स्थान पर पहुंचा है। पिछले वर्ष 2019 में इसी सूची में भारत 77वें स्थान पर था। कारोबारी सुगमता के मामले में भारत वर्ष 2018 में पहले शीर्ष 100 देशों की फेहरिस्त में शामिल हुआ था। तब वह 30 स्थानों की छलांग के साथ 130 से 100वें स्थान पर पहुंचा था। इस तरह, भारत कारोबार सुमगता में तो तेजी से आगे बढ़ा है, लेकिन कारोबार सुगमता की छलांग की तरह रोजगार के अवसरों में छलांग दिखाई नहीं दे रही है। विश्व बैंक ने भारत को उन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया है, जिन्होंने लगातार तीसरे साल अपनी रैंकिंग में सुधार किया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार को देखते हुए सुधार के ये प्रयास सराहनीय हैं। भारत ने जिन क्षेत्रों में बड़े सुधार किए हैं, वे हैं बिजेनस शुरू करना, दिवालिएपन का समाधान, सीमा पार व्यापार बढ़ाना, कंस्ट्रक्शन परमिट में तेजी लाना।

पिछले दिनों प्रकाशित बौद्धिक संपदा, नवाचार और कारोबार सुगमता से संबंधित विभिन्न वैश्विक रिपोर्टों में भी भारत की बेहतर प्रगति की बात कही जा रही है। प्रमुख कारोबार सूचकांकों के तहत कारोबार और निवेश में सुधार का परिदृश्य भी दिखाई दे रहा है। आईएमडी विश्व रैंकिंग 2019 के अनुसार, वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तेज वृद्धि, कंपनी कानून में सुधार और शिक्षा मद में खर्च बढ़ने के कारण भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा है। इस रैंकिंग में भारत 43वें स्थान पर आ गया है। पिछले साल वह 44वें स्थान पर था। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कारोबार में बढ़ती अनुकूलताओं के कारण भारत में ख्याति प्राप्त वैश्विक फाइनेंस और कॉमर्स कंपनियां अपने कदम तेजी से बढ़ा रही हैं। कई विकसित और विकासशील देशों के लिए कई काम बड़े पैमाने पर भारत से आउटसोर्स हो रहे हैं।

भारत में वैश्विक वित्तीय कंपनियों के दफ्तर ग्लोबल सुविधाओं से सज्जित हैं। इनमें बड़े पैमाने पर प्रतिभाशाली भारतीय युवाओं की नियुक्तियां हो रही हैं। यूबीएस बैंक के मुंबई व पुणे सेंटर में करीब 4,000 कर्मचारी हैं। यूबीएस का रिसर्च डिपार्टमेंट दुनिया के लिए नए कौशल विकास और नई तकनीकों से सुसज्जित आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) क्लाउड कंप्यूटिंग, स्टैटिस्टिक्स, मशीन लर्निंग और ऑटोमेशन में विशेषज्ञता रखने वाले युवाओं की बडे़ पैमाने पर भर्ती कर रहा है। बेंगलुरु में गोल्डमैन सॉक्स का नया कैंपस लगभग 1,800 करोड़ रुपये में बना है और यह कैंपस न्यूयॉर्क स्थित मुख्यालय जैसा है, यहां पर कर्मचारियों की संख्या 5,000 से अधिक है। दुनिया की दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन ने हैदराबाद में 30 लाख वर्गफुट क्षेत्र में जो इमारत बनाई है, वह हैदराबाद की सबसे बड़ी इमारत है। इसमें 15 हजार कर्मचारी हैं।

लेकिन हमें कारोबार सुगमता, नवाचार व प्रतिस्पद्र्धा के वर्तमान स्तर और विभिन्न वैश्विक रैंकिंग में आगे बढ़ते कदमों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। अभी इन क्षेत्रों में व्यापक सुधार की जरूरत है। खासतौर से भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्पद्र्धा में आगे बढ़ाना जरूरी है। विश्व आर्थिक मंच द्वारा 141 देशों के लिए जारी वैश्विक प्रतिस्पद्र्धा सूचकांक (ग्लोबल कंपीटेटिवनेस इंडेक्स) 2019 में भारत पिछले वर्ष 2018 की तुलना में 10 स्थान फिसलकर 68वें पायदान पर आ गया है। सूचना, संचार और प्रौद्योगिकी को अपनाने में सुस्ती, चिकित्सा व स्वास्थ्य की स्थिति ने भी भारत के प्रदर्शन पर प्रभाव डाला है। निश्चित रूप से देश में शोध व विकास पर खर्च बढ़ाना होगा। यहां इस पर जितनी राशि खर्च होती है, उसमें इंडस्ट्री का योगदान काफी कम है, जबकि अमेरिका तथा इजरायल जैसे विकसित देशों व पड़ोसी देश चीन में यह काफी अधिक है। इससे भारतीय प्रोडक्ट्स ग्लोबल ट्रेड में पहचान नहीं बना पा रहे हैं। उन सभी तरीकों को अपनाना अब जरूरी हो गया है, जो कारोबार को भी तेजी से बढ़ाएं और विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा करें। यही रास्ता हमें आर्थिक मंदी से मुक्ति भी दिलाएगा और दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बनने में भी मदद करेगा। मेक इन इंडिया जैसे अभियान भी इसके बिना अधूरे रहेंगे।

स्रोत–  हिंदुस्तान

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