05-08-2019 (Newspaper Clippings)

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कानून का शिकंजा

निवेशकों को कम समय में मोटा मुनाफा देकर अमीर बनाने का सपना दिखाने वाली पोंजी योजनाओं पर अब लगाम कसी जा सकेगी। संसद ने ‘अनियमित जमा योजनाएं विधेयक, 2019’ को मंजूरी दे दी है। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि नया कानून लागू होने के बाद लोगों को ठगने वाली ऐसी योजनाएं चलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकेगी। देश भर में हजारों छोटी-बड़ी चिटफंड कंपनियां और समूह इस तरह की योजनाएं चला रहे हैं और नए-नए घोटाले सामने आते रहे हैं। लेकिन ऐसी योजनाओं के घोटालेबाज इसलिए बच निकलते हैं कि पोंजी योजनाओं को लेकर अब तक कोई कड़ा कानून नहीं था। ऐसे में घोटालेबाजों को सजा नहीं मिल पाती थी। पिछले एक दशक में पश्चिम बंगाल, ओड़ीशा और असम में जिस तरह से बड़े पैमाने पर चल रही पोंजी योजनाओं का खुलासा हुआ और जो गिरफ्तारियां हुर्इं, उससे साफ है कि करोड़ों-अरबों की ऐसी ठगी बिना रसूखदारों और राजनीतिक संरक्षण के संभव नहीं होती। पश्चिम बंगाल में जो सारदा चिटफंड घोटाला, पर्ल समूह, रोजवैली घोटाला सामने आया, उसकी आंच राज्य सरकार के मंत्रियों, विधायकों तक पहुंची थी। जाहिर है, जहां-जहां भी ऐसी कंपनियां चल रही हैं उनके कर्ताधर्ताओं को बचाने वाले सत्ता में मौजूद हैं।

पोंजी योजनाओं के नाम पर फर्जीवाड़े के अब तक करीब एक हजार मामले सामने आ चुके हैं। चौंकाने वाली यह है कि इनमें लगभग एक तिहाई मामले सिर्फ पश्चिम बंगाल के हैं। यह कारोबार इसलिए फलता-फूलता रहा कि ज्यादातर योजनाओं के निवेशक जानकारी के अभाव में शिकायत ही नहीं कर पाए और कंपनियां पैसा लेकर चंपत होती रहीं। लेकिन जब पश्चिम बंगाल में सारदा, रोजवैली जैसे घोटालों का पर्दाफाश हुआ तब सरकारों की नींद खुली। पता चला कि पर्ल समूह की निवेश योजना में पांच लाख लोगों ने पैसे जमा कर रखे थे और यह रकम पचास हजार करोड़ के करीब थी। जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, रिजर्व बैंक और सेबी जैसे नियामक सक्रिय हुए और बड़े मामलों की जांच सीबीआइ के हवाले की गई, तब जाकर लगा कि लोगों के साथ धोखाधड़ी करने वाली कंपनियों के खिलाफ सख्त कानून की जरूरत है। पिछले पांच साल में सीबीआइ ने पोंजी योजनाओं में घोटालों से जुड़े दो सौ मामले दर्ज किए हैं। ये आंकड़े और हकीकत बताते हैं कि भारत के शासन तंत्र में भ्रष्टाचार की कितना घुसपैठ है, जिसमें गरीब लोगों का पैसा डकारने वाले लोग बिना किसी भय से कारोबार करते रहते हैं। हाल में कर्नाटक में एक पोंजी घोटाले की जांच करने वाले आइएएस अधिकारी को डेढ़ करोड़ रुपए की घूस के मामले में पकड़ा गया। इस कंपनी का मालिक चालीस हजार निवेशकों का पैसा लेकर विदेश भाग गया।

देश की सबसे बड़ी अदालत भी परेशान तो रास्ता क्या है?

देश की सबसे बड़ी अदालत और मुख्य न्यायाधीश समेत तमाम जज अपनी ही रजिस्ट्री को लेकर सकते में है। ताज़ा घटना में मुख्य न्यायाधीश को मीडिया से पता चला कि बहुचर्चित उन्नाव दुष्कर्म काण्ड की पीड़िता की एक चिट्ठी उन्हें आज तक नहीं दी गई। यह भी राज खुला कि इस पीड़िता की एक याचिका पर अदालत ने सीबीआई समेत 15 पक्षकारों को नोटिस जारी करने के आदेश दिए, लेकिन रजिस्ट्री में यह नोटिस लगभग ढाई महीने तक दबा रहा। रजिस्ट्री अदालत का वह सबसे महत्वपूर्ण कार्यालय है जो याचिकाएं व पत्र लेता है (उन्हें रूल्स एंड मेनुअल्स के रूल 25 के तहत ख़ारिज भी कर सकता है), उनकी लिस्टिंग करता है, अदालत के आदेश निर्गत करता है और नोटिस जारी करता है। मुख्य न्यायाधीश ने जवाब मांगा है। यह पहली घटना नहीं है। राहुल गांधी के खिलाफ अवमानना के एक मामले पर मुख्य न्यायाधीश ने राफेल केस के साथ ही सुनवाई के आदेश दिए थे, लेकिन जब पिछली 6 मई को मामला बेंच में आया तो उन्होंने पाया कि रजिस्ट्री ने तारीखें अलग-अलग कर दी थी। मुख्य न्यायाधीश ने भरी अदालत में आहत स्वर में कहा- ‘मेरा कार्यालय ही मेरे आदेश बदल रहा है’। तीन दिन बाद 9 मई को जस्टिस अरुण मिश्र ने सुनवाई के दौरान पाया कि बिल्डर आम्रपाली के मामले में उनके 2 मई के आदेश को बदल दिया गया था। उन्होंने अदालत में कहा- ‘कुछ दलाल और बिचौलिए इस अदालत के प्रासाद के भीतर घुसकर कोर्ट स्टाफ को ‘मैनिपुलेट’ (प्रभावित) कर रहे हैं’। उसी दिन तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने भी पुस्तक-विमोचन समारोह में कहा कि अदालत को डराने का कुचक्र चल रहा है। अगर देश की सबसे बड़ी पंचायत भी यही बात कहे और देश का शासक वर्ग भी, तो फिर इलाज़ क्या है? क्या न्याय के लिए माफियाओं की दहलीज़ पर जाना होगा? इन तीन घटनाओं ने पूरी दुनिया में भ्रष्टाचार पर शोध कर रहे विद्वानों के लिए एक नया सवाल खड़ा कर दिया है – क्या विकासशील देशों में (खासकर भारत सरीखे) प्रचलन में आए कोल्युसिव करप्शन (सहमति के आधार पर भ्रष्टाचार) से छुटकारा पाना असंभव है? जब न्याय की तराजू वाला भव्य और मकबूल प्रासाद भी भ्रष्टाचार के छींटों से अपवित्र होने लगे और स्वयं अदालत के व्यथित होकर और गुस्से में महीने-दर-महीने आरोप लगाने पर भी स्थिति न सुधरे तो समाज के पास क्या चारा है?


तीन तलाक की विदाई

राजनीति कई बार उपलब्धियों को पीछे धकेल देती है। तीन तलाक विधेयक के संसद से पारित हो जाने के बाद भी यही हो रहा है। विधेयक लोकसभा से आसानी से पास हो गया था, लेकिन राज्यसभा के गणित को देखते हुए यह आशंका अंतिम समय तक थी कि यह विधेयक पास हो पाएगा भी या नहीं। और अंतिम समय में सरकार ने किसी तरह इस गणित को साध लिया। कुछ ने पाला बदला, कुछ ने मतदान में भाग ही नहीं लिया और एकाध इस्तीफे हो गए, तो बात बन गई। और तो और विधेयक का हर तरह से और अंतिम समय तक विरोध कर रही महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने भी आखिर में मतदान से खुद को अलग करते हुए विधेयक के पास होने का रास्ता तैयार कर दिया। इसके बाद से अब हर तरफ सरकार के राजनीतिक कौशल के चर्चे हैं और इस विधेयक के पास होने से हमारे पूरे समाज, मुस्लिम समाज, खासकर मुस्लिम महिलाओं को क्या मिला, और कौन सी नई चुनौतियां खड़ी होती दिख रही हैं, ये सारे विमर्श पीछे चले गए हैं।

यह सच है कि इस विधेयक को लेकर या इससे बनने वाले कानून को लेकर कई आशंकाएं थीं। संसद की बहस और देश की बाकी चर्चाओं में इसके कई मुद्दे लगातार उठते भी रहे। खासकर विवाद इसे आपराधिक मामला बनाए जाने को लेकर था। इन तर्कों को पूरी तरह से शायद खारिज भी नहीं किया जा सकता, लेकिन सिर्फ इसी को आधार बनाकर एक महत्वपूर्ण कानून का रास्ता रोकना शायद सही नहीं कहा जा सकता। कानून बन जाने के बाद भी उसकी कमियों पर चर्चा का मौका हमेशा हमारे पास रहता है, ऐसी चर्चाओं के नतीजों से कई सकारात्मक बदलाव अतीत में भी निकलते रहे हैं। कानून बन जाने के बाद के नए अनुभव भी ऐसे मामलों में भूमिका निभाते रहे हैं। हालांकि ऐसे मामलों में आदर्श स्थिति यही होती है कि जिस समाज के लिए यह कानून बनाया जा रहा है, वह खुद आगे आए और वक्त-जरूरत के मुताबिक बदलाव का बीड़ा उठाए। पर ऐसा हमेशा हो नहीं पाता। सबसे अच्छी स्थिति तो यही होती है कि समाज ही कानून को बदले, लेकिन कई बार कानून के जरिए समाज को बदलने की चुनौती भी आती है। इस मामले में सबसे अच्छा उदाहरण सती प्रथा का दिया जाता है। या फिर पिछले दिनों केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्देश दिया, वह भी इसी तरह का मामला कहा जा सकता है।

यह चुनौती कितनी कठिन होती है, यह भी हमने सबरीमाला के मामले में देखा है। सामाजिक स्तर पर ऐसे बदलाव रातोंरात नहीं होते, इसके लिए लंबे धैर्य और निरंतर प्रयास की जरूरत होती है। सरकारें अक्सर कानून पास करके कर्तव्य पूरा मान लेती हैं, जबकि सामाजिक स्तर पर कानून का अमल ज्यादा दिखने में नहीं आता और न ही वह बदलाव आ पाता है, जिसकी कल्पना कानून बनाते समय की गई थी। उदाहरण के लिए, हम दो कानूनों को देख सकते हैं। दहेज प्रथा के खिलाफ देश में कडे़ कानून बनाए गए हैं। इसके कुछ तरह के असर भी देखने को मिले हैं, पर वह दहेज प्रथा नहीं खत्म हुई, जिसके लिए यह कानून बना था। यही हश्र बाल श्रम के खिलाफ बने कानूनों का हुआ है। अब जब यह विधेयक पास हो चुका है, राजनीतिक हार-जीत से अलग सामाजिक स्तर पर इसके बारे में सोचना शुरू करना होगा।


ऐसे तो अविरल नहीं बहेगी गंगा

नदियों का प्रवाह परियोजनाओं और मंत्रालयों का नाम बदलने से बढ़ेगा और ही काम पुराने ढर्रे पर चलाते रहने से

विजय कुमार चौधरी

पिछले दिनों ‘राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना’ के तहत केंद्र सरकार ने 16 राज्यों में 34 नदियों की सफाई के लिए 5,800 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी और अपने हिस्से की 2,500 करोड़ रुपये की धनराशि भी विभिन्न राज्यों को जारी कर दी। ऐसे में, इस योजना की उपलब्धियों को देखना इसलिए भी जरूरी है कि देश की नदियों की स्थिति चिंताजनक हो चुकी है। नदियों का जीवन इसका प्रवाह है, जल की कमी और बढ़ते प्रदूषण के कारण नदियां मृतप्राय होती जा रही हैं।

देश की नदियों में गंगा का एक अलग स्थान है। इसका जुड़ाव हमारी सभ्यता के विकास से लेकर धार्मिक मान्यताओं तक फैला हुआ है। इसे जीवनदायिनी, कष्टहारिणी, मोक्षदायिनी जैसे न जाने कितने विशेषणों से आभूषित किया जाता है। यह उत्तराखंड के गोमुख से निकलकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों से गुजरती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसके पूरे मार्ग में दर्जनों सहायक नदियां हिमालय, नेपाल, छोटानागपुर के पठारों, विंध्य आदि क्षेत्रों से आकर इसमें समाहित होती हैं और इसका संवद्र्धन करती हैं। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते पारिस्थितिकीय असंतुलन के चलते अन्य नदियों के साथ-साथ गंगा की स्थिति बेहद दर्दनाक हो चुकी है। यह प्रदूषित होने के अलावा जगह-जगह टूटती हुई दिखती है।

नदियों से जुड़ी समस्याओं को दो बिल्कुल अलग प्रकार में वर्गीकृत किया जा सकता है। पहली समस्या प्रदूषण की है। सभी शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में गंदगी बहाने की एकमात्र जगह हमारी नदियां हैं। हर तरह के दूषणकारी पदार्थों के साथ मलयुक्त गंदा पानी नदी में प्रवाहित किया जाता है। इसका कुप्रभाव न सिर्फ जलजीवों और वनस्पतियों पर पड़ता है, बल्कि इस क्षेत्र में रहने वाली मानव आबादी भी इसकी शिकार होती है। धर्मिक अवसरों पर बनाई गई देवी-देवताओं की मूर्तियां, जिनकी रंगाई-पुताई में कई प्रकार के जहरीले रासायनिक पदार्थों का उपयोग होता है, पूजा-अर्चना के बाद अंतिम रूप से किसी नदी या तालाब में विसर्जित होती हैं।

नदियों से जुड़ी दूसरी समस्या इसमें घटती जल-उपलब्धता और गाद की समस्या है। नदियों में जल की उपलब्धता पर अगर हम गौर करें, तो पिछले दो-तीन दशकों में यह लगातार गिरती जा रही है। गाद की समस्या तो और गंभीर होती जा रही है। नदी तल में गाद जमा होने के कारण इसका तल उथला होकर ऊपरी सतह को समतल कर देता है। नदी के पेट में गहराई न हो, तो उसका स्वरूप ही विकृत हो जाता है। अभी तक नदी प्रबंधन या गंगा संरक्षण के नाम पर जो कुछ हुआ है, वह इसके जल के प्रदूषण को कम करने के लिए हुआ, पर नदी तल पुनस्र्थापन और गाद प्रबंधन की दिशा में कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठाया जा सका है।
गंगा के प्रदूषण को कम करने की शुरुआत 1985 में ‘गंगा कार्ययोजना’ (गंगा एक्शन प्लान) के नाम से हुई थी। इसी के साथ शहरों और नालों की पहचान करके उस पर मल-जल उपचार संयंत्र लगाने की योजना की शुरुआत हुई। 451 करोड़ से अधिक खर्च होने के बाद इस फेज-1 योजना को मार्च, 2000 में पूर्ण घोषित कर दिया गया। ‘राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना’ की शुरुआत 1995 में की गई, जिसके तहत योजना का दायरा बढ़ाकर रिवर फ्रंट डेवलपमेंट, सैनिटेशन और वानिकीकरण को भी इसमें सम्मिलित किया गया।

गंगा कार्ययोजना फेज-2 की शुरुआत 1993 में की गई थी। दिसंबर, 1996 में इसे ‘राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना’ के साथ मिला दिया गया। गंगा सफाई योजना को वृहत्तर रूप देने का एक निर्णय 2009 में हुआ, जिसके तहत राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण की स्थापना की गई। इसमें प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गंगा नदी बेसिन से जुड़े पांचों प्रदेशों- उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों को भी अन्य विशेषज्ञों के साथ शामिल किया गया। गंगा एक्शन प्लान फेज-1 पूर्ण रूप से केंद्र द्वारा पोषित थी, जबकि फेज-2 और इसके आगे की योजनाओं में केंद्र और राज्यों का हिस्सा आधे-आधे का है। केंद्र में नई सरकार के गठन के बाद योजना का फिर नाम बदला और ‘नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा’ के तहत नमामि गंगे परियोजना शुरू हुई। 20 हजार करोड़ की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत 2020 तक गंगा को निर्मल बनाने का लक्ष्य रखा गया था। अब इस लक्ष्य को 2022 तक बढ़ा दिया गया है। अक्तूबर 2016 में इसके लिए बने प्राधिकरण का विघटन कर दिया गया और एक नए निकाय नेशनल काउंसिल फॉर रिवर गंगा (रिजूविनेशन, प्रोटेक्शन ऐंड मैनेजमेंट), जिसे नेश्नल गंगा काउंसिल भी कहते हैं, का गठन किया गया।

शुरू से गंगा परियोजना केंद्र के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अधीन चल रही थी, जिसे 2014 में जल संसाधन मंत्रालय के अधीन किया गया। इस मंत्रालय का नाम भी 2014-15 में जल संसाधन, नदी विकास व गंगा पुनर्जीवीकरण रखा गया। इसी के तहत नमामि गंगे परियोजना की शुरुआत हुई। पिछले दिनों इस मंत्रालय को दूसरे मंत्रालय ‘पेयजल एवं स्वच्छता’ के साथ मिलाकर ‘जल शक्ति’ के नाम से एक नया मंत्रालय बनाया गया है। गौरतलब है, बदलते नामकरण के बावजूद कार्यशैली में खास अंतर नहीं आया है। इस योजना की कठिन चुनौतियों और क्रियान्वयन की धीमी गति के कारण जमीनी तौर पर विशेष उपलब्धि नहीं हो पाई है।

यहां एक और पक्ष पर गौर करना होगा। गंगा योजना इसके जल को दूषणकारी तत्वों से बचाने अथवा मुक्त कराने तक सीमित रही है। इसकी अविरलता कैसे बनी रहे, इस पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता है। नदी का प्रवाह जितना सुगम और तेज होता है, इसके प्रदूषित होने की संभावना उतनी ही कम हो जाती है। ठहरा पानी अधिक तेजी से दूषित होता है। बाढ़ प्रबंधन के तहत गाद की समस्या के अध्ययन, निदान के कुछ प्रयास तो हुए हैं, परंतु न कोई ठोस निर्णय लिया जा सका, न ही कोई ठोस नीति बन सकी। कई देशों में गाद का प्रबंधन आज नदी प्रबंधन कार्यक्रम का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। दुनिया भर में नदियों को जीवंत रखने के लिए इसके तल से ड्रेजिंग व डेसिल्टिंग के माध्यम से गाद निकालने की निरंतर व्यवस्था की जाती है। यह बड़ी महत्वाकांक्षी और चुनौती भरी योजना हो सकती है, पर इसके बिना नदियों को मरने से हम बचा भी नहीं सकते।

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